• यूँ ही कोई पहाड़ नहीं हो जाता : पुस्तक ‘चले साथ पहाड़’ के बहाने़

    चले साथ पहाड़ या चलें साथ पहाड़। एक ज़रा-सी बिन्दी मान लें या एक-अदद मात्रा। सारा मंतव्य बदल जाता है। जी हाँ। मैं सुप्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी, साहित्यकार, यायावर और सामाजिक एक्टीविस्ट अरुण कुकसाल की…

  • उत्तराखण्ड का पर्वतीय समाज और बदलता आर्थिक परिदृश्य

    किताब का आवरण और किताब का शीर्षक भले ही एक नज़र में पाठकों को यह दृष्टि दे जाए कि यह किताब शोधपरक रिपोर्ट का दस्तावेज है। इस किताब में आंकड़े हैं। कुछ गाँव…

  • मंतुरिया

    साहित्य में हिन्दी बाल साहित्य को अभी लोक जीवन में झांकने की नितांत आवश्यकता है। अमूमन बच्चों के लिए उपलब्ध साहित्य में कमोबेश नसीहतों,उपदेशों और आदर्श की तीव्र आग्रह दिखाई देता है। इससे…

  • कविता: आम की टोकरी के बहाने बड़ों से कुछ बातें

    भाषाओं की पाठ्य पुस्तक में शामिल साहित्य बच्चों को आनंदित करे। इस बात का ख्याल रखा ही जाना चाहिए। पहली कक्षा में शामिल साहित्य को दूसरी, तीसरी….ही नहीं बारहवीं कक्षा तक की किताबों…

  • आम की टोकरी

    छह साल की छोकरी,भरकर लाई टोकरी। टोकरी में आम हैं,नहीं बताती दाम है। दिखा-दिखाकर टोकरी,हमें बुलाती छोकरी। हम को देती आम है,नहीं बुलाती नाम है। नाम नहीं अब पूछना,हमें आम है चूसना।***  यह…

  • बाल कविताओं में स्कूली जीवन

    -मनोहर चमोली ‘मनु’शैक्षिक दख़ल का यह अंक आज हमारे हाथ में हैं। बात जनवरी 2020 की है। हम सब कोविड 19 की ख़बरों को देख-सुनकर परेशान हुए थे। फिर फरवरी के अंत तक…

  • कविता एक: स्वाद अनेक

    -मनोहर चमोली ‘मनु’शैक्षिक दख़ल के इस अंक के लिए बाल- साहित्य का चयन चुनौतीपूर्ण रहा। तीव्रता के साथ समाज ऐसा बन रहा है जहाँ शारीरिक श्रम के प्रति संकीर्ण नज़रिया बढ़ रहा है।…

  • कक्षा में बातचीत की खिड़कियाँ हैं साहित्य

    कन्हैया लाल मत्त की एक कविता सिर्फ चार पँक्तियों की है। चरखा बोला चर्रक चूँ/बुढ़िया के सिर पर है जूँ/आ बुढ़िया साबुन मल दूँ/जूँ की कर दूँ धम्मक धूँ। यह शानदार कविता है।…

  • वर्णमाला : मंगलेश डबराल की कविता

    एक भाषा में अ लिखना चाहता हूँअ से अनार अ से अमरूदलेकिन लिखने लगता हूँ अ से अनर्थ अ से अत्याचारकोशिश करता हूँ कि क से क़लम या करुणा लिखूँलेकिन मैं लिखने लगता…

  • उठो लाल अब आँखें खोलो

    स्कूली किताब : कविता के मायने

    आज के सन्दर्भ में ऐसी कविताएँ नहीं लिखी जानी चाहिए !अच्छा हुआ कम से कम भाषा की पाठ्य पुस्तकों में अब ये नहीं हैं ! उठो लाल अब आँखें खोलो पानी लायी हूँ…

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