मीड डे मील पर आधारित नाटक : भोजन वाला स्कूल


पात्र
सूत्रधार एक- गुरू
सूत्रधार दो- चेला

(पहला दृश्य)
{चेले का प्रवेश, गुरू पान चबाने के भाव में संवाद करेगा। गुरू-चेला संवाद भाव-अभिनय में शिक्षक-शिष्य से इतर चलेंगे।}
चेला: गुरू प्रणाम।
गुरू: जीता रे चेले, जीता रे। आज गुरू की चैखट पे? क्या लफड़ा है?
चेला: लफड़ा! क्या गुरू आप भी। और लफड़ा होगा भी तो ये चेला गुरू के पास आएगा? छिः! तब तो डूब मरने वाली बात है, ऐसे गुरू के लिए। ओह नहीं ऐसे चेले के लिए।
गुरू: ठीक है, ठीक है, चल। अब मुद्दे की बात पे आ जा। बोल। क्या बात है?
चेला: वो गुरू जी, क्या है न, आपके इस चेले का पूत न, बड़ा हो गया है। सोचता हूँ कि उसे स्कूल भेज दूँ।
गुरू: भेज दूँ! क्या मतलब है, चेले, अगर तू पढ़ा-लिखा होता, तो मेरे अंडर में रहकर भी मेरे इर्द-गिर्द नहीं रहता। तेरे अलावा मेरा एक भी चेला नहीं है, जो मेरी आँखों के सामने ही भटकता रहता है। तूझे छोड़कर एक भी चेला मेरा ऐसा नहीं है, जो गुरू की चैखट पे ऐसे खाली हाथ आता है, बेशरम।
चेला: क्या गुरू। फिर घुमा-फिरा कर आपकी सारी बाते नज़राने पे आ जाती है। आपकी नेथ कभी नहीं भरती।
गुरू: नेथ नहीं रे, नियत। नियत। खैर, छोड़। न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। तूने हमेशा मेरे दरवज्जे पे खाली हाथ ही आना है। तो क्या कह रिया था तू।
चेला: गुरू, आपको तो पता ही है कि गाँव में एक ही सरकारी स्कूल है। सुना है कि पल्ले गाँव में टाई-बेल्ट वाला प्राइवेट स्कूल खुल गया है। मैं तो गुरू बन नहीं सका, सोच रहा हूँ कि मेरा पूत तो गुरू बन जाए। अब आप ही बताओ कि क्या करूं?
गुरू: बेवकूफ। जब गाँव में स्कूल है तो, सात समन्दर पार जाने की क्यों सोच रिया है?
चेला: गुरू, आप तो घरघुस्सू हो, आपको क्या पता कि सरकारी स्कूलों में क्या हो रहा है। घर में घुसे रहते हो आप तो। गुरू। इन स्कूलों में लंगर खुल गया है, लंगर। पढ़ाई की जगह इन स्कूलों में दाल-भात पक रहा है। बच्चे, लकड़ी-पानी ढोने में लगे रहते हैं। थाली बजाते रहते हैं। पढ़ाने की जगह मास्टर और मास्टरनियों का ध्यान खाना पकाने में ही रहता है। वो बाबू और मुंशियों की तरह रजिस्टर काले करने में लगे रहते हैं। आंकड़ों की बाजीगिरी मंे उलझे रहते हैं। पढ़ायेंगे कब? मैंने इन स्कूलोें में अपना बच्चा कैसे पढ़ाना है? अब आपका चेला इतना नालायक भी नहीं है कि अपने बच्चे को भूखा स्कूल भेजे। हां।
गुरू: (चिढ़कर) खड़ा हो जा। एकदम खड़ा हो जा। (गुरू चेले का कान उमेठ देता है, चेला दर्द के मारे चीखता है)
चेला: अरे,गुरू। पहले मेरा कान तो छोड़ो। गलती हो गई। छोड़ो तो गुरू।
गुरू: चल, अभी चल। सीधे स्कूल चल। अपनी आँख से देख। देख कि स्कूलों में क्या हो रहा है।
चेला: (कराहते हुए) गुरू। मैं क्या, मेरे पिताजी ने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा, आपको तो पता ही है।
गुरू: तभी तो। यही दिक्कत है, तेरे जैसे ही लोग बिना देखे, बिना सोचे, बकवास करने लगते हैं। स्कूल का मुंह नहीं देखा और कह रिया है कि स्कूल में पढ़ाई नहीं हो रही है। चल। आज तूझे स्कूल दिखाता हूँ। (दोनों जाते हैं)
(दूसरा दृश्य)
{स्कूल का दृश्य, स्कूल की घंटी बजती है। आंशिक रूप में प्रार्थना होती है। फिर मैडम बच्चों को पढ़ाकर पहाड़े याद करने का निर्देश देती है।}
गुरू: चेले। स्कूल के अंदर चलें?
चेला: नहीं गुरू। यहां बाहर से सब कुछ तो दिखाई दे रहा है। आप जो कुछ दिखाना चाहते हैं, वो यहां से दीख जाएगा। और देखो, ये मेरे पास दूरबीन भी है। हाई पावर की है।
गुरू: अरे वाह! पहली बार तूने कोई धासू काम किया है। (पाश्र्व में बच्चों के सस्वर वाचन की मंद आवाजें आ रही है।) अब बता। बच्चे क्या कर रहे हैं?
चेला: (दूरबीन से देखकर) बच्चों ने किताबें निकाली हुई है। ज़्यादातर बच्चे मन लगाकर पढ़ाई कर रहे हैं। शायद किसी पाठ को पढ़ रहे हैं।
गुरू: अरे वाह! चेले। तू तो कह रहा था कि तूने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा। फिर तूझे कैसे पता कि बच्चे किताब पढ़ रहे हैं?
चेला: (बच्चों की तरह नाराज होकर) क्या गुरू। मुझे पढ़ना-लिखना ही तो नहीं आता। इसका मतलब ये थोड़े है कि मैं गंवार हूँ। मुझे नहीं देखना कुछ भी। मैं चला। ये लो दूरबीन। आप ही देखो।
गुरू: ओए। एक दूंगा कान के नीचे। बड़ा आया, नहीं देखने वाला। आज तू वो सब देखेगा, जो मैं दिखाना चाहूंगा। लेकिन तू देखेगा, अपनी आँखों से। अच्छा। अब ये बता कि मैडम क्या कर रही है? उसके हाथ में क्या है? मेज पे क्या रखा है?
चेला: एक मिनट, एक मिनट। एक बार में एक सवाल का ही तो जवाब दूंगा मैं। (देखकर समझते हुए फिर कहता है ) अ ़ ़। मैडम बच्चों की काॅपियाँ चैक कर रही है। और .. .अ ़़ ़। मैडम के हाथ में लाल पैन है, और वो शायद बच्चों की गलतियां निकाल-निकालकर उसमें गोल घेरा खींच रही है। और . . गुरू. .अ ़ ़ मेज पे बच्चों की काॅपियोें का ढेर जमा है। एक बात और। काॅपियों में ज़िल्द तक लगी हुई दिखाई दे रही हैं।
गुरू: अच्छा। ज़रा देख के बता कि भोजन माता क्या कर रही है?
चेला: भोजन माता! ये कौन सी देवी है? और स्कूल में क्या कर रही है?
गुरू: पता था, मुझे पता था, कि तूझे पता ही नहीं होगा कि स्कूल में भोजन पकाने की जिम्मेदारी किसकी है। अक्ल के दुश्मन। खाना पकाने वाली ही भोजन माता है।
चेला: हैं? वो . . .तो कहीं नहीं दिखाई दे रही है।
गुरू: ओए। वो उधर घुमा दूरबीन, जहां वो कोने में छोटा सा कमरा बना है, छप्पर वाला। वो देख . . .जहां से थोड़ा सा ध्ुाआँ उठता हुआ दिखाई दे रहा है।
चेला: थोड़ा सब्र तो करो गुरू। ज़रा मेरी आँखों को भी तो कसरत करने दो। अ . . ़ ़। अरे बाप रे। वहां तो भात पक चुका है, वो भी बड़े पतीले में। और . ़ ़। (जी ललचाने के भाव से) गुरू । वहां तो जीरे, धनिए, प्याज और टमाटर का तड़का लग रहा है दाल में। गुरू। कोई जुगाड़ करो न। मेरे तो पेट में चूहे कूद रहे हैं। काश! ऐसी दूरबीन बनी होती जिससे खुशबू भी नाक के नीचे आ जाती।
गुरू: बस। टपक गई न लार। अब बोल। अगर तेरा पूत। ऐसे स्कूल में पढ़े, जहां पढ़ाई के साथ-साथ भोजन भी मिलता हो, तो क्या बुरा है। बोल। चुप क्यों हो गया है।
चेला: (जैसे सुना ही न हो, गुरू को चुप कराने की आवाज निकालता है) श . . .। गुरू। वो देखो। सब बच्चे गोल घेरे में बैठ रहे हैं। सबके हाथ में थाली है। और वो देखो, जो बड़े बच्चे हैं वो सब बच्चों की थाली के आगे गिलास में पानी दे रहे हैं। अरे। मैडम खुद भी भोजन माता के साथ बच्चों को भोजन बाँट रही है। गुरू मैं मैडम से रिक्वेस्ट करके अपने लिए एक थाली भोजन नहीं मांग सकता क्या?
गुरू: भूक्खे। चल अब घर चल। आज तूझे मैं अपने घर में खाना खिलाऊँगा। भुक्कखड़ कहीं का।
चेला: (आश्चर्य से) क्या बात कर रहे हो गुरू। आप और अपने घर में किसी को खाना खिला दो। जरूर मेरे कानों ने गलत सुना होगा। क्या आप अपनी बात पर कायम हैं? क्या आज में वाकई आपके घर में खाना खाने वाला हूँ?
गुरू: हां भई हां। आज मेरी गुरू भी घर में नहीं है रे। वो मायके गई है। खाना पकाने से लेकर बरतन धोने तक के सारे काम कौन करेगा। चल अब, चलते हैं। ये पकड़ अपनी दूरबीन।
चेला: गुरू मुझे एक ज़रूरी काम याद आ गया है। मैं ़ ़ ़(गुरू चेले की गरदन दबोच लेता है, चेला गरगराते हुए कहता है) अरे। ये क्या कर रहे हो गुरू। मैं तो मजाक कर रहा था। भला मेरी मजाल कि मैं आपका कहा टाल दूँ। चलो। अब मेरी गरदन तो छोड़ो। (दोनों जाते हैं)
तीसरा दृश्य
{गुरू के घर का दृश्य,दोनों खाना खा रहे हैं,खाना खाते-खाते बात हो रही है}
चेला: गुरू। मज़ा आ गया। बड़ी जोर की भूख लगी थी। ये और बात है कि खाना मैंने ही पकाया और बरतन भी मैंने ही धोने हंै। पर खाने से ज्यादा मुझे इस बात की भी खुशी हो रही है कि मैं आपको पकाकर भोजन खिला रहा हूं।
गुरू: चेले। मैंने तुझसे जानबूझकर खाना बनवाया।
चेला: हैं? वो . . .भला क्यों?
गुरू: ओए। वो इसलिए कि तुझे भूख का अहसास हो और खिलाने के आनंद का भी तूझे पता चले। जैसा कि तूने अभी-अभी कहा है।
चेला: पर गुरू . . . पहेलियां न बुझाओ। और अब सीधे-सीधे कहो कि आप कहना क्या चाह रहे हो?
गुरू: मूर्ख। मैं तूझे यही बताना चाहता हूं कि स्कूल जाने और आने पर ही तूझे भूख लग गई। फिर तूने खुद मेरे सहयोग से भोजन पकाया। अब तूझे खाने में आनंद भी आ रहा है। ठीक इसी प्रकार घर से स्कूल जाने वाले बच्चों को भी तो भूख लगती है। यदि उन्हें ताजा, पका पकाया भोजन मिल जाए तो बुरा क्या है। वो भी आपसी सहयोग और सहभागिता के। मिल-जुल कर एक साथ पंक्ति में बैठकर खाने का आनंद ही कुछ ओर है। क्यों?
चेला: वाह! गुरू! क्या समझाया आपने। ये तो मेरे भेजे में पहले आया ही नहीं। एक अकेला बच्चा इतना नहीं सीखता जीतना वो टीम में सीखता है। ग्रुप में सीखता है। वो क्या कहते हैं समूह में शक्ति है। एकता है।
गुरू: ओए। बस। बंद कर ये लच्छेदारी। अब बोल कहां भेजेगा अपने बच्चे को?
चेला: जी इसमें सोचना कैसा। मैं सरकारी स्कूल में ही भेजूंगा। टाई-बेल्ट पहनने से ही बच्चा बड़ा थोड़ा न हो जावेगा। गुरू। ये बची दाल मैं पी लूं?
गुरू: हां। हां। पी ले। पर बरतन चमका कर चैकी पे रख जाना। मैं जरा पड़ के सो जाता हूं। मेरी गुरू के आने से पहले चैका-रसोई चमका दे। नहीं तो रात का खाना नहीं मिलने वाला मुझे। (डकार लेता है, वहीं चेला बरतन मांझने का अभिनय करता है। परदा गिरता है।)

समाप्त।
-मनोहर चमोली ‘मनु’. पोस्ट बाॅ0-23. पौड़ी गढ़वाल. 246001. उत्तराखण्ड.
ई मेल[email protected]

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