प्रख्यात भरतनाट्यम कलाकार एवं प्रशिक्षक वैष्णवी धोरे
प्रख्यात भरतनाट्यम कलाकार एवं प्रशिक्षक वैष्णवी धोरे ने आज राजकीय इण्टर कॉलेज में भरतनाट्यम नृत्य की एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियाँ देकर विद्यार्थियों का मन मोह लिया। नृत्यागंना वैष्णवी ने भरतनाट्यम की मुख्य बारीकियों से भी विद्यार्थियों को अवगत कराया। साथ ही गढ़वाली वन्दना दैणी ह्वे जावो माँ सरस्वती, हिंग्वाली अन्वार तेरि, हंस की सवारी मैया, हंस की सवारी. . . में भी नृत्य किया और विद्यार्थियों को सुर,ताल, लय और भाव-भंगिमाओं की खू़बियों पर व्याख्यान सहित प्रयोगात्मक न्त्य भी किया।

सुप्रसिद्ध संस्था स्पिक मैके के तत्वाधान में आयोजित नृत्य प्रस्तुति एवं कार्यशाला के तहत भरतनाट्यम नृत्यांगना और प्रशिक्षक वैष्णवी धोरे का विद्यालयी परिवार में स्वागत किया गया। नृत्यांगना वैष्णवी पुणे और नई दिल्ली में नृत्य के क्षेत्र में कार्यरत हैं। वह संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त प्रख्यात रमा वैद्यनाथन की शिष्या हैं। उन्होंने नृत्य की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा पुणे में रहकर डॉ. स्वाति दैठंकर से प्राप्त की है। वैष्णवी दिल्ली से नृत्य विशारद एवं भरतनाट्यम में परास्नातक की उपाधि प्राप्त हैं। वे दिल्ली दूरदर्शन की ग्रेडेड कलाकार हैं।

जानी-मानी नृत्यांगना वैष्णवी ने भारत और विदेश में अनेक प्रतिष्ठित मंचों पर, एकल नृत्यांगना के रूप में तथा अपनी गुरु रमा वैद्यनाथन के साथ मिलकर प्रस्तुतियाँ दी हैं। कोणार्क उत्सव, पटियाला हेरिटेज फेस्टिवल, कुंभ मेला, ब्रह्मा गाना सभा (चेन्नई) जैसे प्रमुख भारतीय समारोहों के साथ-साथ वह सिंगापुर, कंबोडिया, दक्षिण कोरिया, कनाडा तथा अमेरिका में भी भरतनाट्यम नृत्य के प्रचार-प्रसार हेतु प्रस्तुतियां दे चुकी हैं। भरतनाट्यम के प्रति उनका समर्पण भाव देखते ही बनता है। वैष्णवी पुणे के स्लम क्षेत्रों के बच्चों के लिए भरतनाट्यम की जागरूकता कार्यशालाएँ आयोजित करती रहती हैं। इसके साथ-साथ अरविंदम इंडिया गुरुकुल्स, गुरुग्राम में भारतीय सांस्कृतिक धरोहर और प्रदर्शन कलाओं की प्रशिक्षक के रूप में कार्यरत हैं।

जी॰आई॰सी॰ कालेश्वर में उनके साथ पौड़ी के अभिनेता, कलाकार सोनू जी भी साथ थे। सोनू रंगमंच और फिल्मी दुनिया में युवा कलाकार हैं।

कार्यक्रम के आरम्भ में विद्यालय की ओर से कलाकारों को अंगवस्त्र भेंट किया गया। इसके साथ-साथ उन्हें स्मृति चिन्ह और प्रतीक चिन्ह भी प्रदान किया गया। शिक्षकों ने पुष्प् गुच्छ और मालाएं पहनाकर कलाकारों का स्वागत किया। अपनी प्रस्तुति के दौरान वैष्णवी जी ने शिव-पार्वती, कृष्ण-राधा की भरतनाट्यम प्रस्तुतियां भी दीं।

वैष्णवी ने विद्यार्थियों को बताया कि भरतनाट्यम भारत की सबसे लोकप्रिय शास्त्रीय नृत्य विधाओं में एक है। भरतनाट्यम दक्षिण भारतीय राज्यों जैसे तमिलनाडु और कर्नाटक में अत्यधिक लोकप्रिय है। उन्होंने बताया कि भरतनाट्यम नृत्य लगभग दो हजार साल पुराना नृत्य माना जाता है। बताते हैं कि भरतनाट्यम की शिक्षा ब्रह्मा जी ने प्रसिद्ध ऋषि भरत को दी थी। उन्होंने ही इस नृत्य को नाट्य शास्त्र नामक संस्कृत ग्रंथ में संकलित किया। नाट्य शास्त्र भारतीय नाट्य और सौंदर्यशास्त्र पर आधारित मौलिक ग्रंथों में से एक है।

वैष्णवी ने विद्यार्थियों को बताया कि नाट्य शास्त्र नृत्य को दो अलग-अलग रूपों में विभाजित करता है – नृत्त और नृत्य। नृत्त में, अमूर्त हस्त मुद्राओं और गतियों में निपुणता पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। वहीं नृत्य में न्त्यांगना या नर्तक भावनात्मक अभिव्यक्तियों को दर्शाने के लिए हस्त संकेतों और शारीरिक मुद्राओं की अभिनीति प्रणाली का उपयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि नृत्य, संगीत, वाद्ययंत्रों के साथ पोशाक भी भरतनाट्यम को विशेष बनाती है। उन्होंने बताया कि तमीलनाडू के मंदिरों से आरम्भ यह नृत्य शैली आज विश्व में प्रसिद्ध हो चुकी है। भरतनाट्यम में कॅरियर की भी अपार संभावनाएं हैं। वैष्णवी ने प्रयोग के साथ सैद्वान्तिक जानकारी देते हुए बताया कि नृत्य, भाव, ताल के साथ नाट्य रूप भरतनाटयम को और भी लोकप्रिय बनाता है।

इस अवसर पर उन्होंने विद्यार्थियों को नृत्य, कला और साहित्य की भी जानकारी दी। विद्यालयी प्रागंण में पूर्व विद्यार्थी भी उपस्थित रहे। स्थानीय अभिभावकों ने भी कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दी। विद्यालयी परिवार में पंकज, रेखा भट्ट, कामिनी नेगी, अमित बिष्ट, अनुज नेगी, दिव्या नेगी, अनिल कुमार सैनी, उमेश जुयाल, विवेक चन्द्र, अनुमेहा, रविन्द्र डोभाल, सुबोध कुकरेती का सहयोग सराहनीय रहा। व्यवस्थाओं में भोजन माता सुमित्रा एवं मोनी का सहयोग प्रशंसनीय रहा। अंत में विद्यालय के प्रधानाचार्य उत्तम कुमार सिंह ने उनका आभार जताया। संचालन मनोहर चमोली ने किया।
स्पिक मैके यानी SPIC MACAY. . . Society for the Promotion of Indian Classical Music and Culture Amongst Youth के नाम से भी जाना जाता है। यह संस्था 1977 से कार्य कर रही है। यह भारतीय शास्त्रीय संगीत और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में कार्य कर रही है। भारतीय शास्त्रीय संगीत, नृत्य, कला, योग, पारंपरिक शिल्प और संस्कृति को युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाने में जुटी इस संस्था ने सैकड़ों कलाकारों और दर्शकों के मध्य एक सेतु का कार्य किया है।















फोटो सहयोग: उमेश चन्द्र जुयाल, रविन्द्र डोभाल, अनिल कुमार सैनी, विवेक चन्द्र

