महात्मा गांधी

2 अक्तूबर ! जी हाँ। इस दिन का सम्बन्ध कई दृष्टिकोणों से अहम् होता है। लेकिन महात्मा गांधी को उनके जन्म दिवस के अवसर पर भी याद किया जाता है।


महात्मा गांधी के जन्म को 152 वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं। इस अवसर पर आज विद्यालय में गांधी जी को याद किया गया। महात्मा गांधी राष्ट्रीय संग्रहालय ने 150वीं जयंती के अवसर पर 100 पोस्टर की एक श्रृंखला का प्रकाशन किया गया था।

हालांकि गांधी जी स्वयं में एक युग को समेटे हुए हैं। लेकिन विद्यालयी बच्चों के लिए यह एक अनूठी प्रदर्शनी थी। कमोबेश आज उपस्थित सभी बच्चों ने बढ़-चढ़ कर प्रदर्शनी में हिस्सा लिया।

अब लिखते समय सोच रहा हूँ कि यदि सौ पोस्टरों में दस पँक्तियों के हिसाब से भी बच्चों ने सरसरी तौर पर ही सही कुछ पढ़ा होगा,समझा होगा। मनन किया होगा तो 1000 वाक्य उनके मन-मस्तिष्क से गुजरे होंगे।


समापन सत्र का संचालन कर रहे शिक्षक किशोर रौतेला ने कहा कि गांधी जी के व्यक्तित्व को 100 पोस्टरों या एक दिन के आयोजन से समझना बेहद मुश्किल है। गांधी जी चाहते तो उच्च शिक्षा के बाद सम्पन्नता का जीवन जी सकते थे लेकिन उन्होंने भारत के अन्तिम गरीब व्यक्ति के लिए अपने शौक,शान और दिखावा जैसे भावों को दरकिनार कर खादी को अपनाया। आज के आयोजन से हम उनके बाल्यकाल,युवावस्था और आमरण जीवन की झलक पा सकते हैं। वे यूँ ही नहीं राष्ट्रपिता कहलाए।


अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन से आए और प्रदर्शनी के संयोजक रविन्द्र भण्डारी ने कहा कि आज जब गांधी जी के दर्शन और योगदान को भूलाने जैसी कोशिश हो रही है वहीं गांधीजी के जीवन दर्शन और व्यक्तित्व को समझने की और भी आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि वे इतने असाधारण काम और आन्दोलनों की पहल करते-करते असाधारण एक दिन में नहीं हो गए।


एपीएफ की पूजा ने कहा कि आज अवसर इस बात का है कि हम गांधी जी की जीवनी को रटे नहीं बल्कि उनकी जीवन यात्रा को उस दौर के हिसाब से समझने का प्रयास भी करें। इन पोस्टरों को देखकर सिर्फ गांधी जी के बारे में ही नहीं पता चलता बल्कि उस दौर के परिवेश, वातावरण, जन-जीवन को समझने का भी मौका मिलता है।


प्रधानाचार्य विनय मोहन डबराल ने कहा कि गांधी जी को हम उनके जन्म के 152 साल बीत जाने के बाद भी याद क्यों कर रहे हैं। उनके सिद्वान्त सत्य,अहिंसा और प्रेम के साथ-साथ उनका जीवन दर्शन क्या कभी अप्रासंगिक हो सकता है?

प्रधानाचार्य विनय मोहन डबराल ने कहा कि विनय मोहन डबराल ने कहा कि पोस्टरों के आलोक में गांधी जी के जीवन से जुड़ी घटनाओं की ओर भी इशारा किया। उन्होंने छात्रों को बताया कि कैसे एक व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों और कृतियों के प्रभाव से प्रभावित होकर उच्च विचारों के साथ आम आदमी होते हुए भी खास हो जाता है। उन्होंने इस अवसर पर गांधी जी से जुड़े कई प्रसंग भी सुनाए।


आज के इस पोस्टर प्रदर्शनी में 100 ऐतिहासिक पोस्टरों को देख-पढ़कर छात्रों के चेहरे देखने लायक थे। अध्यापक वर्ग ने भी माना कि कई चित्र और वर्णन अद्भुत रहा और उनके लिए यह अनुभव एकदम नया और लीक से हटकर था।

कुछ छात्रों ने दीर्घा का कई चक्रों में बारम्बार घूमकर पोस्टरों का अवलोकन किया। यह नज़ारा देखते ही बनता था। समापन अवसर पर कुछ छात्रों ने अपने संक्षिप्त विचार भी प्रकट किए। अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन,पौड़ी का आभार प्रकट करते हुए साथी पूजा और रविन्द्र का बहुत धन्यवाद कि वे इन पोस्टरों के प्रदर्शन के लिए जुटे रहे।

छात्रों में सृष्टि, हिमानी,मानसी,सुमित,वंशदीप,अंजलि,रेखा ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

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