हमारे विद्यालयों के विद्यार्थियों के ज्ञान का पुख्ता, बड़ा स्रोत शिक्षक ही हैं: आकाश सारस्वत

स्कूलों में छात्रों और शिक्षकों में दूरी है। बच्चे अपनी बात कहने में संकोच करते हैं। शिक्षकों के सामने कुर्सी पर बैठना तो उनके लिए स्वप्न है। कुछ विद्यालयों में प्रधानाचार्य कक्ष में विद्यार्थियों की हिचकिचाहट साफ दिखाई देती है। इस बाबत जब विद्यार्थियों को कुर्सियों पर बिठाया गया तो शानदार बात हुई। उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है। वे सीखे-समझे और जाने गए मुद्दों पर खुलकर बात करते हैं।


आकाश सारस्वत समग्र शिक्षा,राज्य परियोजना, उत्तराखण्ड में उप निदेशक हैं। वे जनपदों के स्कूलों के परियोजना संबंधी कार्यो,प्रगति को देखने आते रहते हैं। वे बागेश्वर सहित कुमाऊँ के कई विकास खण्डों, जनपदों में विभागीय अधिकारी रहे हैं सो उनके शैक्षिक भ्रमण आदि अक्सर कुमाऊँ मंडल में अधिक रहे हैं। हाल ही में वे पौड़ी गढ़वाल के शैक्षिक दौरे पर आए थे। इससे पूर्व भी वे एक बार पौड़ी विभागीय कार्य से आए थे। 11 अप्रैल को राज्य स्तर पर सार्वजनिक स्कूलों में प्रवेशोत्सव धूम-धाम से मनाया गया।

इस सिलसिले में दो दिवसीय दौरे पर वे पौड़ी और पौड़ी जनपद के कई विद्यालयों में गए। वे कड़क स्वभाव और सीधे-सीधे प्रत्यक्ष अपनी बात रखने के लिए जाने जाते हैं। वे स्वामी विवेकानन्द के विचारों से बेहद प्रभावित हैं। दूसरा नशा मुक्ति आंदोलन से भी वे जुड़े हैं। तीसरी बात वे हर नवाचारी शिक्षक का हौसला भी बढ़ाते हैं।

विभिन्न स्कूलों के प्रत्यक्ष दौरे के अलावा वह किसी के प्रति कोई धारणा नहीं बनाते। इसके साथ-साथ वे जन सम्पर्क के मामले में भी बेहद सक्रिय हैं। साहबगिरी से इतर वे दोबारा पश्चपोषण भी करते हैं और तीन-पांच साल पूर्व किए गए दौरे की याद ऐसे रखते हैं जैसे कल आए हों। वे स्वयं कहते हैं कि वर्तमान में शीर्षस्थ पदों पर बैठे वे दूसरे अधिकारी हैं जिनका पिछला कार्यकाल विभागीय नहीं है। वह सीधे एक राजकीय इण्टर कॉलेज के प्रधानाचार्य नियुक्त हुए थे। अनुभवों से और शिक्षकों के सहयोग से विभाग की खूबियां-खामियां सीखीं-समझी और जानीं।

वे बताते हैं कि कोशिश हमेशा की है कि अध्यापकों को लिखित में प्रतिकूल प्रविष्टि देने से बचता रहा। जन प्रतिनिधियों के साथ तीख बहसें भी हुई हैं लेकिन कालान्तर में स्पष्ट समझ होने के बाद उन्हीं जन प्रतिनिधियों ने विभाग को प्रणम्य संसाधन मुहैया कराए। विद्यालयी समय में भ्रमण-निरीक्षण के बाद सांय वे टीचर लर्निंग सेन्टर, पौड़ी में शिक्षकों से भी मिले। अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, पौड़ी के साथियों सहित तात्कालिक सूचना मिलने पर आए शिक्षकों से उन्होंने बात की।

आकाश सारस्वत ने कहा कि अभी भी स्कूलों में छात्रों और शिक्षकों में दूरी है। बच्चे अपनी बात कहने में संकोच करते हैं। शिक्षकों के सामने कुर्सी पर बैठना तो उनके लिए स्वप्न है। कुछ विद्यालयों में प्रधानाचार्य कक्ष में विद्यार्थियों की हिचकिचाहट साफ दिखाई देती है। इस बाबत जब विद्यार्थियों को कुर्सियों पर बिठाया गया तो शानदार बात हुई। उनका आत्मविश्वास देखते ही बनता है। वे सीखे-समझे और जाने गए मुद्दों पर खुलकर बात करते हैं।

आकाश सारस्वत बताते हैं कि विभाग में हजारों कर्मठ शिक्षक हैं। विद्यार्थियों को मनहूस कहने वाले, गीली मिट्टी का लौंदा कहने वाले और कच्चा घड़ा कहने की सोच रखने वाले शिक्षकों की संख्या घटी है। यह अच्छी बात है। उन्होंने कहा कि हम शिक्षकों को विद्यार्थियों के प्रति और संवेदनशील होना होगा। उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक ज्ञान-समझ को स्वीकारना चाहिए। विद्यार्थियों को सुनना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुझे भी अब लगता है कि हम किसी को सुधार नहीं सकते। अलबत्ता खुद पर नियंत्रण रख सकते हैं। अपने व्यक्तित्व से ही हम प्रेरित कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि सिर्फ अभावों का रोना रोने से काम नहीं चलने वाला। कुछ व्यवस्थागत-प्रशासनिक सवाल हैं। समस्याएं हैं। मुद्दे हैं। उन पर केन्द्रित होकर पठन-पाठन नहीं हो सकता। विपरीत परिस्थितियों में ही हमारे शैक्षणिक अनुभवों की परीक्षा है।

आकाश सारस्वत ने कहा कि उच्च और निम्न टीचर-छात्र रेशा दोनों ही घातक हैं। समूह में सीखना और बढ़े समूह में सीखना के साथ अकेले में सीखना की गति देखें तो अन्तर साफ समझ में आता है। उन्होंने यह भी कहा कि सूबे की साक्षरता दर भले ही बेहतर है लेकिन शिक्षक समाज पढ़ता-लिखता कम ही दिखाई देता है। स्कूलों में पुस्तकालय का उपयोग प्रायः उदासीन-सा दिखाई देता है। लेकिन तमाम शिक्षक हैं जो पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया में सक्रिय हैं। उनके काम दिखाई भी देते हैं। इसी तरह डॉक्टर, वकील और इंजीनियर भी इसी धारा में जुड़ने चाहिए। लेकिन समाज का सच सबको पता है।

शिक्षा अधिकारी ने कहा कि हम अपने स्तर पर बहुत से वर्गों की सहायता कर सकते हैं। हम जनता से कट गए हैं। हमारे सम्पर्क टूट गए हैं। हम विद्यार्थियों को भी ठीक से नहीं जानते। जो शिक्षक विद्यार्थियों के परिवार से जुड़े हैं वहां सकारात्मक परिणाम स्वतः ही दिखाई देते हैं। व्यवस्थागत प्रश्नों पर बात करना इसलिए भी बेमानी है। सो हम और आप कहीं न कहीं विद्यार्थियों के हितसाधक हैं तो उन्हीं पर केन्द्रित बात की जानी चाहिए।


आकाश सारस्वत दूसरे दिन दोपहर में रा॰इं॰कॉलेज, केवर्स पहुँच गए। पहले प्राथमिक विद्यालय केवर्स में उन्होंने बच्चों से बात की। फिर वे इण्टर कॉलेज आ गए। बिना सूचना के अपने साथ साथी शिक्षक नवीन डोभाल उनके साथ थे। उन्होंने जरूरी दस्तावेजों की जांच की। एक-एक कक्षा में जाकर जायज़ा लिया। जर्जर और पुराने भवन पर चिंता व्यक्त की। नव निर्मित दो कक्षा कक्षा-कक्षों का मुआयना किया। शिक्षकों के साथ बैठक की।

बैठक में उन्होंने कहा कि पौड़ी से मात्र दस-ग्यारह किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस गांव की पहुँच की सड़कें बेहद जर्जर हैं। इससे पता चलता है कि हमारी प्राथमिकता में कैसा विकास है। उन्होंने कहा कि सीमित संसाधनों और बेहद कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों में शिक्षकों के पास अवसर है कि वे अपना सर्वाेत्तम दें। दे भी सकते हैं। मध्याह्न भोजन की समीक्षा करते हुए उन्होंने कहा कि अब पौष्टिक चावल आने वाला है जिसमें 100 किलों में 1 किलो चावल पौष्टिक है। वह हलका लाल-भूरा है। भोजनमाताओं को इस बात की जानकारी दें कि चावल के उन दानों को कबाड़ या पुराना या खराब न समझें। उन्होंने खेल,कला, साहित्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बच्चों की प्रगति की सराहना भी की। उन्होंने कहा कि इसे ओर बढ़ाए जाने की जरूरत हमेशा बनी रहे।

विद्यालय प्रशासन ने उन्हें विद्यालय में दोबारा आने का निमंत्रण दिया। व्यसनमुक्त और नित नई बुरी लतों पर आधारित उनकी विशेषज्ञता का समाज लाभ उठाए। इस अवसर पर विद्यालय की ओर से उन्हें एक प्रतीक चिह्न भेंट किया गया। उन्होंने अमृत सरोवर का दूर से मुआयना किया। खेती बाहुल्य केवर्स क्षेत्र में बंजर खेतों और पानी की अनुपलब्धता पर उन्होंने हैरानी जताई। विद्यालय की बड़ी समस्या की जानकारी लेना और उन्हें अपनी डायरी में अंकित करना उनकी खूबी है।

वे फोलोअप भी लेते हैं और अपने स्तर पर व्यवस्थागत खामियों का ध्यान रखते हैं और अपने निजी संबंधों के चलते हर संभव जन प्रतिनिधियों से उसे पूरा भी करने का प्रयास करते हैं। विद्यालय में सौहार्दपूर्ण वातावरण में स्वस्थ चर्चा के साथ उनके साथ बिताया आधा-पौन घण्टा बेहतरीन रहा। उन्होंने कहा कि जिस तरह की पृष्ठभूमि पौड़ी के आस-पास की है वह अब तक भ्रमण किए गए विद्यालयों में अधिक शैक्षणिक प्रगति की उम्मीद कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारे सार्वजनिक विद्यालयों में पढ़ने वाली नई पौध के लिए ज्ञान का सबसे बड़ा और पुख्ता स्रोत शिक्षक ही हैं। उन्हें शिक्षकों से हमेशा उम्मीद रहती है।
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-मनोहर चमोली ‘मनु’
मेल: chamoli123456789@gmail.com
सम्पर्क: 7579111144

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By manohar

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