जितना भी सीखा कम लगता है

कभी तीन साल एक बुनियादी स्कूल से जुड़ने का मौका मिला था। तब मैं स्नातक में था। प्रधानाध्यापिका अकेली थीं। गांधी जयंती, स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस में जाना होता था। संभवतः इसी कारण मुझे यह अवसर मिला। प्रधानाध्यापिका ने निजी तौर पर तीन सौ रुपया महीना देना तय किया था। मुझे एक-दो घण्टा पढ़ाना होता था।’’ तीन सौ रुपए कम ने थे। इसी के चलते मुझे पचास रुपए महीना कुछ बच्चे ट्यूशन के लिए मिल गए थे।

तब सोच सतही थी। अब बदल रही है। शिक्षा के असल मक़सद पता न थे। गृहकार्य देना और विद्यार्थियों के लिखे हुए को लाल कलम से घेरना ज़रूरी काम समझता था। विद्यार्थियों को खड़ा करना, डंडा मारना और मुर्गा बनाना गलत है। इस पर कभी सोचा ही नहीं था। प्रधानाध्यापिका बेहद सख़्त थीं। वह खुश थीं कि मैं नियमित पढ़ाने आता हूँ। जब वहाँ दूसरी अध्यापिका आईं तो मेरा काम खत्म हो गया था।


मैं बहुत गलत था ! बी॰एड॰ के दौरान शिक्षा के दस्तावेज़ों को पढ़ा। भारत ज्ञान विज्ञान समिति से जुड़ा। यशपाल समिति की सिफारिशों को पढ़ा। एक नई दृष्टि मिली। पारम्परिक शिक्षण के दोष समझ आने लगे। ढर्रेदार तरीकों के संवाहक शिक्षकों से मोह छूटा। पत्रकारिता ने रही-सही कसर पूरी कर दी। दस साल ज़ीरों ग्राउण्ड पर काम किया था। शिक्षा विभाग के कई आयोजनों में सहभागिता दी। तब ‘भाषा रश्मि’ की पाठ्य पुस्तक हुआ करती थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेशोपरांत किताबों में पर्यावरणीय दृष्टिकोण जोड़े जाने थे। उसमें सहभागिता का अवसर मिला। यह कार्यशाला नैनीताल स्थित डायट भीमताल में हुई थी। शिक्षा जगत को जानने-समझने का मौका मिलता रहा। फिर मैं 2005 को उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में एल.टी. भाषा का अध्यापक बन गया।


राजकीय सेवा में बतौर शिक्षक पहला दिन याद आता है। प्रधानाध्यापक सभी कक्षाओं में ले गए थे। मेरा परिचय उन्होंने ही दिया था। फिर कहा था,‘‘इसी साल स्कूल हाईस्कूल हुआ है। सबसे बड़ी कक्षा नौ ही है। चाहो तो किसी एक कक्षा में जाकर बातचीत कर सकते हो।’’ कई सारी आँखें मुझे देख रही थीं। बालिकाओं के सिर पर दो-दो फूल सफेद रंग के खिले थे। रिबन से बँधी चुटिया अच्छी लग रही थीं। मैंने कहा था,‘‘जब मन नहीं करेगा तो पढाई नहीं करेंगे।’’

खैर ……यह साल राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 का था। अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क ने सेवा में आने से पहले ही इस महत्वपूर्ण पाठ्यचर्या में शरीक होने का मौका दे दिया था। इसी क्रम में नई किताबों की निर्माण कार्यशाला में सहभागिता करने का अवसर भी मिला। लगभग तीन से चार महीने की कई महत्वपूर्ण कार्यशालाओं में जुड़ाव रहा। फिर हँसी-खुशी भाग एक से लेकर पाँच और बुराँश भाग एक से तीन हिन्दी की किताबें प्रकाशित हुईं। शिक्षा विभाग में मुझे कई अवसर मिले। सेवारत् प्रशिक्षणों में बतौर संदर्भ व्यक्ति, प्रशिक्षण साहित्य में लेखन के कई अवसरों ने नई रोशनी दी। विमर्श के अवसर मिले। पत्रकारिता राजकीय सेवा में आते ही छूट गई थी। लेखन की आदत ने बाल साहित्य की ओर मोड़ दिया।


इन सब स्थितियों ने सोच-समझ का स्तर बदला। अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन के साथियों के साथ शिक्षा के विमर्श ने और समझ दी। इतना सब कुछ होने के बाद भी सत्र समाप्त होते-होते हर साल मन बैठ जाता है। मुझे पता रहता ही है कि सीखने-सिखाने में क्या-क्या और कितना रहा-बचा! फिर ठान लेता हूँ कि आगामी अप्रैल से ‘ये-ये’ करूँगा। करते-करते फिर मार्च आ जाता है।

फिर बहुत कुछ छूट जाता है। कभी ये भी लगता है कि रणनीति के स्तर पर नए सिरे से सोचने की ज़रूरत है। इस सीखने के सफ़र में सिखाने वाला भाव भी कई बार हावी होने लगता है। कक्षा में साझा करने वाली स्थिति रखता हूँ। नीरसता न रहे। ऐसी कोशिश करता हूँ। मैं अपने विद्यार्थियों पर ज़रूरत से ज़्यादा उम्मीदें करता हूँ। कई बार वे उम्मीदें खरी उतरती हैं। अब ये खरा उतरने का साँचा क्या हो? बच्चों के साथ मैं अकेला तो नहीं हूँ। साथी अध्यापक भी होते हैं। माता-पिता, परिवार के सदस्य, सहपाठी और समुदाय भी तो होता है। फिर मैं कैसे कह दूँ कि बच्चे जिस मुकाम पर पहुँचते हैं वह मेरी ही देन हैं? मैं हर साल खासकर परिषदीय परीक्षाओं के परिणाम पर चिन्तित होता हूँ। सैकड़ों परिचित अध्यापकों को उच्च स्कोर पाने वाले छात्रों का स्वयंभू गुरु घोषित करता हुआ पाता हूँ।


विद्यार्थियों को होेशियार-कमज़ोर की श्रेणी में रखना मुझे कभी रास नहीं आया। कक्षा में भाँति-भाँति के बच्चों को एक-सा बनाने की कोशिश मुझे कभी अच्छी नहीं लगी। जब बच्चे ऐसी स्थिति में दिखाई देते हैं तो मैं उनमें आशा,उम्मीद और हौसले के बीज बोने की कोशिश करता हूँ। यह हर बार नहीं बार-बार कहता हूँ कि स्कूलों की परीक्षाओं के बाद समाज कई परीक्षाएं लेने को तैयार बैठा है। स्थिति-परिस्थितियों के बीच अपनी जगह बनानी है। निराश न हों। प्रयास की पकड़ ढीली मत करो। बच्चे कई बार समझते हैं, कई बार नहीं भी समझते। मुझे परीक्षा के नाम पर बच्चों को बार-बार हिदायत देना कभी अच्छा नहीं लगा। उनकी परीक्षा लेना आज तक हज़म नहीं हुआ। किताब पढ़ाना, कॉपी पर अद्यतन काम कराने का नियम मुझे कभी नहीं भाया। प्रातःकालीन सभा का औचित्य मुझे कभी समझ नहीं आया। बच्चों को प्रतियोगिता के नाम पर पहला, दूसरा और तीसरा नंबर लाने की होड़ में झोंकना कभी ठीक नहीं लगा। कला और खेल को महत्व देने के हर संभव प्रयास अच्छे लगते हैं। लेकिन इन्हें पीछे रखने पर उदासी बढ़ती ही जाती है। रटने पर जोर देने के विद्यालयी प्रयासों का मैं खुलकर विरोध नहीं कर पाया। स्कूल में इनाम देने की प्रवृत्ति फलती-फूलती जा रही है। इसे मैं ठीक नहीं समझता।


पहाड़ में बच्चों के पास केवल पढ़ाई करना एक काम नहीं है। स्कूल आने से पहले और स्कूल से जाने के बाद कई काम उनकी राह देख रहे होते हैं। मैंने देखा है, बरसात में या किसी मृत्यु के कारण समय से पहले छुट्टी होती है तो कई बच्चे घर नहीं जाना चाहते। छुट्टी होने पर वे खुश नहीं होते। उन्हें पता है कि घर जाएंगे तो रोजमर्रा के कामों के अलावा कई घरेलू काम उनका बस्ता रखते ही कांधे पर चढ़ जाएंगे। बच्चों में निजी सफलता की बजाय सामूहिकता की गतिविधियों को बढ़ाने के प्रयास अक्सर परवान नहीं चढ़ पाते। विद्यार्थियों में सवाल करने की आदत विकसित नहीं कर पाया। व्यवस्थाओं के प्रति आवाज़ उठाने का भाव बच्चों में नहीं दिखाई देता तो दुःख होता है। स्कूल ऐसी संस्था नहीं बन पा रही है जहां बच्चे संवैधानिक मूल्यों के प्रति सजग हों। वे जीवन की पढ़ाई में आगे बढ़ते हुए पीछे रह गए संगी -साथियों की मदद कर सकें। जहाँ से निकल कर वह समाज की बेहतरी के लिए संघर्ष करते हुए दिखाई दें।


जिन विद्यार्थियों में तार्किकता दिखाई दी, वे आगे चलकर प्रखर हुए हों, ऐसे उदाहरण कम हैं। कक्षाओं में धर्म निरपेक्षता बनाए और बचाए रखने के प्रयास भी कमोबेश कोरे साबित हुए,लगता है। प्रेम, भाईचारा, सहयोग और सद्भाव पर जितना ज़ोर दिया, वे बहुत ही हलके साबित हुए। मैं कभी पढ़ाकू विद्यार्थियों को अधिकाधिक अवसर देने के पक्ष में नहीं रहा। लेकिन उन्हें हतोत्साहित नहीं किया। खोए हुए बच्चों को चुप्पी तोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। बार-बार प्रेरित किया। सहपाठियों की मदद करें। इसके ख़ूब प्रयास किए। लेकिन अपेक्षा से कम ही परिणाम सामने आए हैं। पढ़ाकू और न ही वे जो खेल, कला और शिल्प में शानदार थे,कहीं नहीं पहुँचे। ‘कहीं पहुँचने’ से मेरा आशय दूसरा है। जिन कक्षाओं में सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में भाग लिया उन कक्षाओं के पचास से साठ फीसदी बच्चे बाल-बच्चे वाले हो गए हैं। वे घर-गृहस्थी में रमे हुए हैं। लेकिन उन आँखों में तैरते हुए सपने आज भी अधूरे पाता हूँ। वे आजीविका के तमाम तरीकों में जीवन बसर कर रहे हैं। लेकिन मैं और मेरी कक्षा उन्हें तनावमुक्त रहना नहीं सीखा सकी। जीवनपर्यन्त वे शिक्षार्थी रहें।

यह न हो सका। विवेचनात्मक चिंतन के साथ जीवन जी सकें। ऐसा न हो सका। वे वैज्ञानिक नज़रिए के साथ जीवन जी रहे हैं! यह नहीं हो सका। इस अपहुँच में मेरी भी तो भूमिका है ! मैं जब ऐसे समूह की कल्पना करता हूँ जिसमें एक हजार लोग हों। उनकी आँखें मुझे देख रही हों। तो मैं सोचता हूँ कि इन एक हजार लोगों में सौ-डेढ़ सौ वे तो हैं ही, जिन्होंने मेरे साथ स्कूल में पाँच-छःह साल बिताए हैं। मैं उन्हें पहचानने की कोशिश करता हूँ। मैं उन्हें नहीं पहचान पाता। जिस दिन समाज के नागरिक हो चुके अपनी कक्षा-कक्ष के पचास फीसदी छात्रों को मैं पहचानने लगूँगा तब मान लूँगा कि मैंने कुछ सीखा और सिखाया। बस ! यही कह सकता हूँ कि सफ़र में हूँ।
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मनोहर चमोली ‘मनु’,भाषा अध्यापक,रा॰इ॰कॉ॰केवर्स,पौड़ी गढ़वाल।

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