प्रकृति प्रेमी, खेती-किसानी के जानकार, पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील और स्वभाव से शांत चित्त जाय हुकिल मानते हैं कि बेशक जंगल की गहराइयों में चित्तीदार छाया को काया में घारण करने वाला, जल, जंगल और वृक्षों का बाशिंदा गुलदार प्रकृति की अनुपम कृति है। निसंदेह, गुलदार वन्य जीवन के संतुलन की मुख्य कड़ी है। गुलदार भी खाद्य शृंखला के संचालन का संवाहक है। गुलदार पारिस्थितिकीय संतुलन, उसके प्रभाव और दृष्टिकोण के लिहाज से भी ज़रूरी जीव है। लेकिन जंगल में उसके शिकार की कमी हो जाने, जंगल में मानव अतिक्रमण से या जंगल से मानव बस्ती में उसका आगमन बढ़ रहा है। जब यही आकर्षक जीव नरभक्षी बन जाता है और मानव जीवन खासकर निर्दोष बच्चे या घर की धुरी महिला को अपना निवाला बना लेता है तो दहशत की काली परछाई गाँव-शहर की दिनचर्या को जकड़ लेती है। स्कूल बंद हो जाते हैं। खेत-खलिहान सुनसान हो जाते हैं। आँगन, चौपाल और चबूतरे गोधूलि की बेला से पहले ही सुनसान हो जाते हैं। गुलदार की भोजन सूची में इंसानी रक्त भी शामिल हो जाता है। तब गुलदार के लिए इंसान एक सरल, आसानी से उपलब्ध शिकार में तब्दील हो जाता है। और तब उस नरभक्षी गुलदार को उसी पारिस्थितिकीय संतुलन साधने के लिए मारना एक बाध्यता हो जाती है।
अल्मोड़ा में जन्मे और अब अपने ननिहाल पौड़ी को ही अपना स्थाई बसेरा बना चुके जाय हुकिल दुनिया की नज़रों में जाने-माने शिकारी हैं। उनके आवास पर हुई लंबी बातचीत में जाय हुकिल के व्यक्तित्व की कई परतें देखने-समझने को मिली। जल्लाद भी कानून तोड़ने वाले दोषसिद्ध अपराधी को फांसी की सजा अपने हाथों से देता है। उसी प्रकार नरभक्षी घोषित हो चुके गुलदार और उसे मार देने के आदेश के बाद शिकारी द्वारा निशाना दागने वाले शिकारी एक नहीं हैं? इस सवाल के जवाब में जाय हुकिल विचलित नहीं होते। अपने अनुभवों के आलोक में तार्किक जवाब देते हुए बताते हैं,‘‘इंसान पर कानून का पालन करने की जिम्मेदारी है। गुलदार किसी कानून को मानने वाला जीव नहीं है। हमें प्रकृति के स्वचालित नियम पर चलने वाले गुलदारों से भला क्या दिक्कत हो सकती है? पहाड़ का जनमानस तो पीढ़ीयों से जंगलों के बीच का रहवासी है। गुलदार तो उनके अपने हैं। ऐसा यहाँ का जनमानस मानता भी है। लेकिन परेशानी का सबब वो गुलदार हो जाता है जो अपने प्राकृतिक भोजन के उलट इंसान को अपना निवाला बना डालता है। गुलदार तो किसी इंसान का शिकार करते समय एक पल की भी देरी नहीं करता। यहां तो कई बार नरभक्षी गुलदार को ढेर करने में महीनों लग जाते हैं। तब तक वही गुलदार कई निरपराध इंसानों की जीवन लीला समाप्त कर देता है।’’
उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी जीव की मौत प्राकृतिक होनी चाहिए। इंसान और जानवर में यही फर्क है। इंसान के पास भोजन के कई विकल्प हैं। लेकिन मांसाहारी गुलदार जैसे जानवरों को उन्हीं के नज़र से भी तो देखने की ज़रूरत है। वे ज़िन्दा तभी रहेंगे जब वह किसी जीव को अपना भोजन बनाएँगे। गुलदार जैसा जीव ज़िंदा तभी रहेगा जब वह किसी ज़िन्दा जीव का शिकार करेगा। यहाँ यह कहना बहुत ज़रूरी होगा कि इंसान उसकी भोजन सूची में नहीं है।
गुलदार को मारना उचित कैसे माना जा सकता है? इस सवाल के जवाब में जाय हुकिल ठहरते हैं। सोचते हैं। फिर बताते हैं। वह कहते हैं,‘‘जीवों के जीने योग्य यह ज्ञात अकेली धरती है। अंततः जीवों का संरक्षण और मानवीय सुरक्षा में से एक को चुनना पड़े तो कानून का पालन करने वाले मनुष्य के जीवन की रक्षा सर्वोपरि रखना आवश्यक है। मारना आखिरी, कष्टप्रद उपाय बन जाता है। यह क्रूरता नहीं, बल्कि जीवंत समुदाय की रक्षा के लिए उठाया जाने वाला आखि़री कदम है। मैं फिर कहूँगा कि हम किसी नरभक्षी गुलदार को मारने का निर्णय लेने में बहुत देर कर देते हैं। नरभक्षी हो चुके एक गुलदार की जान बचाने की वकालत करने से ज़्यादा बेहतर है उन इंसानों की जान बचाना जो निरपराध हैं और उसका भोजन हैं भी नहीं। मैं अक्सर कहता हूँ कि वन्यजीव प्रेमी और प्राकृतिक न्याय की बात करने वाले इस बात को भी अवश्य समझेंगे कि गुलदार का संरक्षण उसके प्राकृतिक आवास में ही होना चाहिए। जब वह अपने आवास से बाहर आकर मानव बस्तियों में मनुष्यों पर ही हमला करने लगे तो इसे कैसे न्यायसंगत माना जा सकता है? हमें यह समझना होगा कि हिंसक जानवर और आदमखोर जानवर में अन्तर है। आदमखोर हो चुका गुलदार अपराधी है। उसे दूसरा अपराध करने का अवसर देना भी उचित नहीं है।’’
वह बड़ी गंभीरता के साथ दोहराते हैं,‘‘हमें यह समझना होगा कि गुलदारों से इंसान को कभी समस्या नहीं रही है। बूढ़े गुलदार तक इंसानों को अपना निवाला नहीं बनाते। पहाड़ में बच्चे क्या और महिलाएँ क्या। जल स्रोत, जंगल, घास, खेत तक में गुलदार मानवीय हलचल देखते रहे हैं। वह चाहें तो आसानी से हर रोज़ इंसान को शिकार बना लें। लेकिन वे ऐसा नहीं करते। सारा मामला सोच का है। सैकड़ों में किसी एक गुलदार के मन में यह ख़याल आ गया कि चलो इस इंसान को भोजन के लिए आजमाया जाए। एक बात बता दूँ कि हम मनुष्य दोपाया हैं। चौपाया को मारना आसान नहीं होता। वह संतुलन बनाकर बच भी सकते हैं। लेकिन दोपाया तो लड़खड़ाया और चोटिल हो गया। बस, गुलदार के लिए वह आसान शिकार हो गया। ऐसा गुलदार जिसने इंसानी खून चख लिया तो वह उसकी भोजन सूची में नई खुराक शामिल हो गई। आसान भी और सहज उपलब्ध भी। लेकिन यह ख़याल किसी एक गुलदार के ज़ेहन में स्थाई हो गया। यह एक गुलदार अब समस्या है। और हाँ। उसे ज़िंदा पकड़ना आसान नहीं है। पकड़कर नये इलाके में अनुकूलन में वह सहज नहीं होता। गुलदार को पकड़ना फिर उसे छोड़ना और यह मान लेना कि अब वह इंसान पर हमला नहीं करेगा। इंसानी जीवन के साथ जानबूझकर लिया गया जोखि़म हो सकता है।’’
मारना सरल रास्ता है? इस सवाल पर जाय हुकिल अपने अनुभवों के आलोक में बताते हैं,‘‘मैं अड़तालीस आदमखोर गुलदार मार चुका हूँ। एक आदमखोर बाघ भी मार चुका हूँ। आदमखोर को मारना कोई शिकार करना नहीं है। यह कोई शगल नहीं है। खेल नहीं है। जब भी कोई गुलदार किसी इंसान को मारकर खा चुका होता है तब उसके परिजनों के चेहरे देखिए। पास-पड़ोस में रह रहे लोगों की आँखों में दहशत देखिए। नरभक्षी हो चुके गुलदार को प्राकृतिक रूप से रह रहे गुलदारों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह कहना बहुत आसान है कि इंसानों ने उसके इलाके खत्म कर दिए हैं। इंसान जंगल में जाता ही क्यों है? उसका भोजन कम हो गया है। वह घास तो नहीं खा सकता। आँकड़े कुछ भी कहें। लेकिन मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि अकेले उत्तराखण्ड में पाँच हजार से अधिक गुलदार हैं। आधी आबादी मादाओं की है। न्यूनतम प्रजनन क्षमता को लें। न्यूनतम शावक ही ज़िंदा रहते हैं। यह मान लें तो प्रतिवर्ष न्यूनतम दो हजार गुलदार बढ़ रहे हैं। एक मादा गुलदार अपने जीवनकाल में बारह से पन्द्रह शावक पैदा कर सकती है। फिर उसी के शावकों में पचास फीसदी मादाएं मान लें तो वे स्वयं तीन साल बाद शावक पैदा कर सकती हैं। सोचिए। कितनी बड़ी आबादी गुलदारों की बढ़ रही है। अब गुलदार और मानव संघर्ष के तथ्यों पर आते हैं। आंकड़ों को ही यदि आधार बना लें तो उत्तराखण्ड बन जाने के बाद यानि सन् 2000 से अब तक 534 इंसान गुलदारों का निवाला बन चुके हैं। इस आधार पर औसत निकालें तो लगभग 22 इंसानी मौते गुलदार के हमले से हुई हैं। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है कि मैं भी और जानकार भी मानते हैं कि उत्तराखण्ड में कम से कम 5000 गुलदार होंगे। इसमें मादाओं के शावकों को नहीं गिना जा रहा। सीधी सी गणित से यह किसी भी क्षेत्र में रह रहे 100 गुलदारों में से 1 गुलदार के नरभक्षी हो जाने का मामला है। अब आप ही सोचिए कि मानव जीवन को उस नरभक्षी से मुक्त क्यों नहीं कर देना चाहिए? मैं तो कहता हूँ कि एक पल की भी देरी नहीं करनी चाहिए।
जाय हुकिल पिछले बीस सालों से गुलदार के जीवन, उसके स्वभाव और मानव संघर्ष का अध्ययन कर रहे हैं। वह अपने अनुभव के आधार पर सुझाव भी देते हैं। वह कहते हैं,‘‘उत्तराखण्ड मे अभिलेखों में दर्ज 71 फीसदी वन भूमि है। लगभग 20 फीसदी भूमि नागरिकों के पास है। सरकारी, ग्राम समाज, सार्वजनिक भूमि यानी राजस्व भूमि 9 से 10 फीसदी है। इस भूमि का स्वामित्व राज्य सरकार या ग्राम सभा का होता है। इंसानों को गुलदार या अन्य वन्य जीव उन्हीं की नागरिक बस्ती या नागरिकों की निजी भूमि से उठा कर ले जाए तो इससे बुरा जीवन जीने का अधिकार क्या हो सकता है? अब आप कह सकते हैं कि इंसान सरहद समझता है गुलदार नहीं। तो इसका भी जवाब है। जवाब सीधा और सरल है। उसे वन संरक्षित क्षेत्र में पालिए। पोसिए। उत्तराखण्ड में जिम कार्बेट नेशनल पार्क, राजाजी नेशनल पार्क, नन्दा देवी नेशनल पार्क, वैली ऑफ फ्लावर्स नेशनल पार्क, गंगोत्री नेशनल पार्क, गोविन्द नेशनल पार्क हैं। इन छःह नेशनल पार्कों यानी राष्ट्रीय उद्यानों का क्षेत्र 5000 वर्ग किलोमीटर से अधिक का है। इसके अलावा सात वन्यजीव अभयारण्य भी हैं। केदारनाथ, अस्कोट, बिनसर, सोनानदी, मसूरी, गोविन्द और नन्धौर वन्यजीव अभ्यारण्य का एरिया भी 2600 वर्ग किलोमीटर से अधिक है। इस तरह राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभ्यारण्य, टाइगर रिज़र्व, बफर जोन के साथ भूमि संरक्षित क्षेत्र का सारा भूभाग जोड़ लें तो यह राज्य की दो-तिहाई भूमि हो जाती है। यानी राज्य की लगभग दो-तिहाई भूमि किसी न किसी रूप में वन कानूनों के अधीन है। इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि आम इंसान के उपयोग हेतु यह प्रतिबंधित है। तो इसके माने क्या? यहाँ ऐसी व्यवस्थाओं की दरकार है कि सभी तरह के वन्य जीवों का पालन-पोषण हो। यह सभी वन्य जीव अपनी इस हद में रहें। यह हद दो तिहाई है! मानव बस्तियाँ-गाँव की भूमि तो 6 फीसदी भी नहीं है! चलिए। थोड़ा उदार होकर सोचें कि खेती, बस्तियाँ, ग्राम-शहर की मानव बसावट को विस्तार देकर सोचें तो यह पन्द्रह फीसदी भी नहीं है। चलिए बीस फीसदी मान लेते हैं। तो अब वन्य जीव के विशेषज्ञ ही बता दें कि 80 फीसदी का भूभाग छोड़कर कोई गुलदार 20 फीसदी में आए और निरपराध को अपना भोजन बना ले तो यह किस सूरत में स्वीकार्य होगा? प्रबन्धन और नियोजन को ठोस बनाना होगा। नीतियाँ धरातल पर मानव कल्याण और उसके जीने के अधिकार का अतिक्रमण क्यों करे?’’
गुलदार को उसकी हद में रख देना काफी होगा? इस सवाल के जवाब में जाय हुकिल कहते हैं,‘‘यह तो फौरी कदम होगा। मांसाहारी और शाकाहारी जीवों की जो भोजन कड़ी है। उसका प्रबन्ध भी तो करना होगा? हमें यह समझना होगा कि वे मानव बस्तियों में आए ही नहीं। हम खतरा ही मोल क्यों लें? देखिए। जैसा पहले भी कहा और फिर कह रहा हूँ कि हर गुलदार इंसान को अपनी भोजन सूची में नहीं रखता। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब गुलदार आसानी से इंसान को अपना निवाला बना सकता था। लेकिन उसने नहीं बनाया। बूढ़ा, बीमार और भूखा गुलदार तक भी इंसान को देखता रहता है। इंसान उसकी पहुँच में था। बावजूद उसके उसने हमला नहीं किया। क्यों? क्योंकि इंसान को भोजन बनाने का विचार उसका था ही नहीं। पकड़े गए गुलदारों के अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि वह दस-बारह दिन पानी के बिना रह सकता है। कद-काठी के हिसाब से देखें तो सामान्यतः एक गुलदार एक भोजन करने के बाद दस-बारह दिन भूखा भी रह सकता है। यह सब बातें हैं जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि उन्हें उनकी हद में पर्याप्त भोजन की व्यवस्था भी करनी होगी। मनुष्य तो नियम-कानून से बंधा हुआ है। नियम तोड़ने पर दण्ड और सजा है। लेकिन वन्य जीवों के लिए ऐसा कुछ नियम तो नहीं है। लेकिन कुशल प्रबन्धन और नियोजन से हम मानव के साथ उनके संघर्ष न्यूनतम कर सकते हैं।’’
एक विचार यह भी तो है कि मानव को गुलदार के साथ जीना सीखना होगा। इस पर जाय हुकिल याद दिलाते हैं कि उत्तराखण्ड के साथ-साथ पर्वतीय भू-भाग के बाशिंदे तो गुलदार के साथ सदियों से रह रहे हैं। जी रहे हैं। उन्हें अपना मानते हैं। वे बताते हैं,‘‘पिछले बीस सालों के अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि इंसान के ज़ेहन में गुलदार जैसे प्राणी देवी-देवताओं की सवारी हैं। मैं एक वाकया बताता हूँ। हमने पिथौरागढ़ के एक गाँव में नरभक्षी गुलदार आने-जाने का मार्ग पहचान लिया। जंगल से मानव बस्ती में आने वाले उसी रास्ते में एक ग्रामीण का घर पड़ता था। मैंने उसे कहा कि तुम्हारे घर की छत से वह नरभक्षी मेरे निशाने पर आ जाएगा। पता है उस ग्रामीण ने हाथ जोड़ते हुए कहा कि नवरात्रे चल रहे हैं। गुलदार की हत्या का पाप मैं नहीं ले सकता। आप किसी पेड़ पर मचान बना लो। तो हम तो रह रहे हैं। मैं हमेशा इस बात को दोहराता हूँ कि पहाड़ के लोगों के लिए जंगली जानवर अनजान नहीं हैं। वे उनके साथ ही जीते हैं और उनके व्यवहार को भी जानते हैं। लेकिन मौजूदा परिस्थितियाँ बदल गई हैं। अब न संयुक्त परिवार रहे और न ही हर परिवार में दस-बारह बच्चे हैं। खेती-किसानी और पशुपालन तक सिमट गया है। गाँव के गाँव तेजी से खाली होते जा रहे हैं। पलायन है कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। सुन रहे हैं कि अन्तरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए नए गाँव बसाने की बात हो रही है। यह कैसे होगा? हम सदियों से रह रहे अपने पुश्तैनी गाँवों को छोड़ते जा रहे हैं। कहीं-कहीं तो गाँव पाँच-सात परिवारों में सिमट गया है।
गुलदारों का गाँवों में आना बढ़ गया है। इस सवाल के जवाब में जाय हुकिल बताते हैं,‘‘उत्तराखण्ड का कौन-सा ऐसा शहर है जहाँ गुलदार नहीं देखे जा रहे हैं। घरों के सीसी कैमरों में वह दिन क्या और रात क्या खू़ब चहलकदमी कर रहे हैं। लंगूर, बंदर, जंगली सूअर गाँव में खेती-किसानी चौपट कर चुके हैं। अब जो ग्रामीण किसी तरह गाँव में रहकर जीवन यापन कर रहे हैं उनकी गाय, बकरी और छोटे बच्चों को गुलदार अपना निवाला बना रहा है। पिछले पच्चीस सालों में उत्तराखण्ड में दो हजार से अधिक मामलों में गुलदार ने इंसानों को जख़्मी बना दिया है। गांँव हो या शहर गुलदारों से जान-माल का खतरा बढ़ता ही जा रहा है। आदमखोर गुलदारों द्वारा की गई वारदातो के बाद जब ग्रामीणों से मिलता हूँ तब पता चलता है कि पेट की आग से बड़ी तो जीने की इच्छा है। जीने की इच्छा है तो मौत दिन-रात साये की तरह पीछे पड़ी हो तो कोई क्या करे? गाँव में दहशत के माहौल में कोई कैसे और कब तक रहेगा?’’
नरभक्षी गुलदार घोषित करने और उसे मारने में होने वाली देरी के संबंध में जाय हुकिल कहते हैं,‘‘आज जब हम मार्च दो हजार छब्बीस के दूसरे सप्ताह के तीसरे दिन पौड़ी में बात कर रहे हैं तो यह भी याद रखना ज़रूरी होगा कि गढ़वा लवन प्रभाग की पौड़ी रेंज नागदेव के अंतर्गत पिछले पाँच महीनों में चार इंसान गुलदार का शिकार हो चुके हैं। यह चिंताजनक है। जैसा गुलदार के व्यवहार पर हम पहले भी बात कर चुके हैं तो यह ध्यान रखना भी ज़रूरी है कि जैसे ही कोई गुलदार इंसान की जान लेता है तो तत्काल उस गुलदार की पहचान कर उसे वहाँ से हटाना होगा। हटाना यानी उसे मार गिराना होगा। वह अपनी ही प्रजाति का दुश्मन हो जाता है। कैसे? यदि उसकी शीघ्र सटीक पहचान हीं हुई तो दूसरे गुलदार जो नरभक्षी नहीं हैं उनकी जान पर भी बन आ सकती है। गुस्साएं ग्रामीण कई बार खाद्य सामग्री में जहर मिला देते हैं। मांसाहारी जीव ही नहीं पक्षी भी उस जहरीले भोज्य पदार्थ को खाकर मर जाते हैं। बेकसूर जीव भी मारे जाते हैं। गुलदारों का व्यवहार भी बदल रहा है। अब वह सुबह, दोपहर, शाम और रात को भी आसानी से दिखाई दे रहे हैं। वह मानव हलचल का अभ्यस्त होता जा रहा है। गाड़ियों के हार्न, लाईट, स्ट्रीट लाईट, शादी-ब्याह, समारोह मे ंबज रहे म्यूज़िक सिस्टम से भी वह बौखलाता नहीं है। कबाड़, कूड़ा-करकट, मनुष्य के फेंके गए बासी नमकयुक्त भोजन में वह मुँह मारता हुआ देखा जा रहा है। उसकी फूड हैबिट बदल रही है। यह बेहद, बेहद चिंताजनक है।
जाय हुकिल कहते हैं कि जंगल, जंगल में पानी और पर्याप्त वन्य जीवों की खाद्य शंखला का प्रबंधन और नियोजन चुनौती है। इस पर गंभीरता से योजना बनानी होगी। योजना ही नहीं उस पर ठोस कार्य करने होंगे। हम इंसानों की कार्यशैली बदल रही है। उसी तरह वन्य जीवों की प्रकृति-व्यवहार बदल रहा है। जंगल में उनके खुद के संघर्ष भी बढ़ रहे हैं। उनका अपना क्षेत्र यानी दायरा भी बढ़ रहा है। अब समय आ गया है कि वन्य जीवों की सीमा रेखा भी तय हो। इंसानी जीवन की सीमा रेखा में उनका आना ही पूर्णतः प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। पशु प्रेम से ज़्यादा इंसानी जीवन है। फिर वही बात कि हम उस गुलदार की बात कर रहे हैं जो अपनी सीमा रेखा तोड़कर निरपराध इंसानों को अपना भोजन समझने लगा है। ऐसा विचार जिस गुलदार के जे़हन में कौंधा है उसे दूसरा मौका देने का प्रश्न ही नहीं उठता।

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परिचयः मनोहर चमोली ‘मनु’ जन्मः पलाम,टिहरी गढ़वाल,उत्तराखण्ड जन्म तिथिः 01-08-1973 प्रकाशित कृतियाँ ऐसे बदली नाक की नथः 2005, पृष्ठ संख्या-20, प्रकाशकः राष्ट्रीय पुस्तक न्यास,नई दिल्ली ऐसे बदला खानपुरः 2006, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः राज्य संसाधन केन्द्र (प्रौढ़ शिक्षा) 68/1,सूर्यलोक कॉलोनी,राजपुर रोड,देहरादून। सवाल दस रुपए का (4 कहानियाँ)ः 2007, पृष्ठ संख्या-40, प्रकाशकः भारत ज्ञान विज्ञान समिति,नई दिल्ली। उत्तराखण्ड की लोककथाएं (14 लोक कथाएँ)ः 2007, पृष्ठ संख्या-52, प्रकाशकः भारत ज्ञान विज्ञान समिति,नई दिल्ली। ख्खुशीः मार्च 2008, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः राज्य संसाधन केन्द्र (प्रौढ़ शिक्षा) 68/1,सूर्यलोक कॉलोनी,राजपुर रोड,देहरादून बदल गया मालवाः मार्च 2008, पृष्ठ संख्या-12, प्रकाशकः राज्य संसाधन केन्द्र (प्रौढ़ शिक्षा) 68/1,सूर्यलोक कॉलोनी,राजपुर रोड,देहरादून पूछेरीः 2009,पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः राष्ट्रीय पुस्तक न्यास,नई दिल्ली बिगड़ी बात बनीः मार्च 2008, पृष्ठ संख्या-12, प्रकाशकः राज्य संसाधन केन्द्र (प्रौढ़ शिक्षा) 68/1,सूर्यलोक कॉलोनी,राजपुर रोड,देहरादून अब बजाओ तालीः 2009, पृष्ठ संख्या-12, प्रकाशकः राज्य संसाधन केन्द्र (प्रौढ़ शिक्षा) 68/1,सूर्यलोक कॉलोनी,राजपुर रोड,देहरादून। व्यवहारज्ञानं (मराठी में 4 कहानियाँ अनुदित,प्रो.साईनाथ पाचारणे)ः 2012, पृष्ठ संख्या-40, प्रकाशकः निखिल प्रकाशन,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। अंतरिक्ष से आगे बचपनः (25 बाल कहानियाँ)ः 2013, पृष्ठ संख्या-104, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-81-86844-40-3 प्रकाशकः विनसर पब्लिशिंग कम्पनी,4 डिसपेंसरी रोड,देहरादून। कथाः ज्ञानाची चुणूक (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः उलटया हाताचा सलाम (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः पुस्तके परत आली (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः वाढदिवसाची भेट (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः सत्पात्री दान (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः मंगलावर होईल घर (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः सेवक तेनालीराम (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः असा जिंकला उंदीर (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः पिंपलांच झाड (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः खरं सौंदर्य (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः गुरुसेवा (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः खरी बचत (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः विहिरीत पडलेला मुकुट (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः शाही भोजनाचा आनंद (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः कामाची सवय (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः शेजायाशी संबंध (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः मास्क रोबोट (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः फेसबुकचा वापर (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः कलेचा सन्मान (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः सेवा हाच धर्म (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः खोटा सम्राट (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः ई साईबोर्ग दुनिया (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। कथाः पाहुण्यांचा सन्मान (मराठी में अनुदित)ः 2014, पृष्ठ संख्या-16, प्रकाशकः नारायणी प्रकाशन, कादंबरी,राजारामपुरी,8वीं गली,कोल्हापूर,महाराष्ट्र। जीवन में बचपनः ( 30 बाल कहानियाँ)ः 2015, पृष्ठ संख्या-120, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-81-86844-69-4 प्रकाशकः विनसर पब्लिशिंग कम्पनी,4 डिसपेंसरी रोड,देहरादून। उत्तराखण्ड की प्रतिनिधि लोककथाएं (समेकित 4 लोक कथाएँ)ः 2015, पृष्ठ संख्या-192, प्रकाशकः समय साक्ष्य,फालतू लाइन,देहरादून। रीडिंग कार्डः 2017, ऐसे चाटा दिमाग, किरमोला आसमान पर, सबसे बड़ा अण्डा, ( 3 कहानियाँ ) प्रकाशकः राज्य परियोजना कार्यालय,उत्तराखण्ड चित्र कथाः पढ़ें भारत के अन्तर्गत 13 कहानियाँ, वर्ष 2016, प्रकाशकः प्रथम बुक्स,भारत। चाँद का स्वेटरः 2012,पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-81038-40-6 प्रकाशकः रूम टू रीड, इंडिया। बादल क्यों बरसता है?ः 2013,पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-81038-79-6 प्रकाशकः रूम टू रीड, इंडिया। जूते और मोजेः 2016, पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-84697-97-6 प्रकाशकः रूम टू रीड, इंडिया। अब तुम गए काम सेः 2016,पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-84697-88-4 प्रकाशकः रूम टू रीड, इंडिया। चलता पहाड़ः 2016,पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-84697-91-4 प्रकाशकः रूम टू रीड, इंडिया। बिल में क्या है?ः 2017,पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-86808-20-2 प्रकाशकः रूम टू रीड, इंडिया। छस छस छसः 2019, पृष्ठ संख्या-24,पिक्चर बुक, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-89202-63-2 प्रकाशकः रूम टू रीड, इंडिया। कहानियाँ बाल मन कीः 2021, पृष्ठ संख्या-194, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-91081-23-2 प्रकाशकः श्वेतवर्णा प्रकाशन,दिल्ली पहली यात्रा: 2023 पृष्ठ संख्या-20 आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-5743-178-1 प्रकाशक: राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत कथा किलकारी: दिसम्बर 2024, पृष्ठ संख्या-60, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-92829-39-0 प्रकाशक: साहित्य विमर्श प्रकाशन कथा पोथी बच्चों की: फरवरी 2025, पृष्ठ संख्या-136, विनसर पब्लिकेशन,देहरादून, उत्तराखण्ड, आई॰एस॰बी॰एन॰ 978-93-93658-55-5 कहानी ‘फूलों वाले बाबा’ उत्तराखण्ड में कक्षा पाँच की पाठ्य पुस्तक ‘बुराँश’ में शामिल। सहायक पुस्तक माला भाग-5 में नाटक मस्ती की पाठशाला शामिल। मधुकिरण भाग पांच में कहानी शामिल। परिवेश हिंदी पाठमाला एवं अभ्यास पुस्तिका 2023 में संस्मरण खुशबू आज भी याद है प्रकाशित पावनी हिंदी पाठ्यपुस्तक भाग 6 में संस्मरण ‘अगर वे उस दिन स्कूल आते तो’ प्रकाशित। (नई शिक्षा नीति 2020 के आलोक में।) हिमाचल सरकार के प्रेरणा कार्यक्रम सहित पढ़ने की आदत विकसित करने संबंधी कार्यक्रम के तहत छह राज्यों के बुनियादी स्कूलों में 13 कहानियां शामिल। राजस्थान, एस.सी.ई.आर.टी द्वारा 2025 में विकसित हिंदी पाठ्यपुस्तक की कक्षा पहली में कहानी ‘चलता पहाड़’ सम्मिलित। राजस्थान, एस.सी.ई.आर.टी द्वारा 2025 में विकसित हिंदी पाठ्यपुस्तक की कक्षा चौथी में निबंध ‘इसलिए गिरती हैं पत्तियाँ’ सम्मिलित। बीस से अधिक बाल कहानियां असमियां और बंगला में अनुदित। गंग ज्योति पत्रिका के पूर्व सह संपादक। ज्ञान विज्ञान बुलेटिन के पूर्व संपादक। पुस्तकों में हास्य व्यंग्य कथाएं, किलकारी, यमलोक का यात्री प्रकाशित। ईबुक ‘जीवन में बचपन प्रकाशित। पंचायत प्रशिक्षण संदर्शिका, अचल ज्योति, प्रवेशिका भाग 1, अचल ज्योति भाग 2, स्वेटर निर्माण प्रवेशिका लेखकीय सहयोग। उत्तराखण्ड की पाठ्य पुस्तक भाषा किरण, हँसी-खुशी एवं बुराँश में लेखन एवं संपादन। विविध शिक्षक संदर्शिकाओं में सह लेखन एवं संपादन। अमोली पाठ्य पुस्तक 8 में संस्मरण-खुशबू याद है प्रकाशित। उत्तराखण्ड के शिक्षा विभाग में भाषा के शिक्षक हैं। वर्तमान में: रा.इं.कॉ.कालेश्वर,पौड़ी गढ़वाल में नियुक्त हैं। सम्पर्कः गुरु भवन, पोस्ट बॉक्स-23 पौड़ी, पौड़ी गढ़वाल.उत्तराखण्ड 246001.उत्तराखण्ड. मोबाइल एवं व्हाट्सएप-7579111144 #manoharchamolimanu #मनोहर चमोली ‘मनु’

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