‘पिता के बहाने’

आज पिताजी नहीं हैं। 15 नवम्बर 2019…! आज ही के दिन पिताजी रात दस बजे इस दुनिया को अलविदा कह चुके थे। पिताजी तीन बार श्वास का सदमा झेल चुके थे। हर बार वह ठीक होकर घर लौटे थे। इंटेंसिव केयर यूनिट जिसे हम गहन देखभाल प्रभाग भी कहते हैं। वहां से बार-बार लौटना बताते हैं कि जीवटता का प्रमाण है।

80 वसन्त जीने वाले पिता अपनी सबसे छोटी बेटी सहित तीन पुत्रों की दो-दो सन्तानों को बड़ा होता देख चुके थे। उनका सबसे छोटा नाती भी अब आठ बरस का हो चुका है। वे सेवानिवृति के बाद भी खूब शान से जिए। परिवार को मुखिया का संरक्षण देते रहे। कालान्तर में पिता अपनी सेहत के प्रति बेहद सजग हो गए थे। लेकिन, यह सब बीते समय की बात है। आज ! आज का सच यह है कि उन्हें सशरीर हमसे अलग हुए पूरा एक साल हुआ जाता है।इस दिन, मैं और मुझसे जुड़ा परिवार पौड़ी में था। पिताजी-माँजी देहरादून थे। दो बड़े भाईयों का परिवार उनके साथ था।

मुझे इस बात का दुःख तो है ही कि हम अंतिम क्षणों में उनके साथ न थे। लेकिन जब-जब वे गंभीर बीमार हुए तो मैं बराबर उनके साथ था। 15 नवम्बर को तबियत ढीली थी। दिन में मेरी बात हुई थी। देर शाम लगभग साढ़े सात बजे फिर मेरी बात हुई थी। अब वे अस्पताल जाने को तैयार न थे।

अक्सर कहते कि अस्पताल वाले पूरे शरीर में सुंईयां घोप देते हैं। खून चूसते हैं। दवाईयों के नाम पर पानी भरते हैं। आदि-आदि। हम सुबह के लिए सब्जी आदि काट कर तैयारी कर चुके थे। हम दोनों सात दिवसीय सेवारत प्रशिक्षण का पहला दिन बिताकर श्रीनगर से पौड़ी लौटे थे। अनुभव और मृगाँक को भी शेष छःह दिन अपने साथ ले जाना तय कर ही रहे थे कि यह दुःखद खबर मोबाइल पर आ गई। रात 11 बजे बाद बड़ी भाभी का फोन आ गया। कुछ समझ नहीं आया। क्या करें! किसे फोन करें! गाड़ी वाले जितने भी सम्पर्क में थे। उन्हें फोन किया। रात साढ़े ग्यारह-बारह बजे कौन फोन उठाता! कहीं फोन बज रहे थे तो कहीं स्विच ऑफ। कहीं कोई रिस्पॉस नहीं। तब कालेश्वर के नवीन भाई को फोन लगाया। वे भी पौड़ी से 30 किलोमीटर दूर रहते हैं। तीन-चार घंटे ऊहापोह में बीत गए।

खैर… सुबह चार बजे चलना तय हुआ। अनुभव और मृगांक तो सो चुके थे। उन्हें तीन बजे उठाकर तैयार किया। खैर…हम देहरादून सुबह साढ़े नौ बजे के आस-पास ही पहुँच पाए। छोटी बहिन सरोज, मित्रवर जी और भांजा चंद्रमोहन चंडीगढ़ से पहुंच चुके थे। आने वाले आ चुके थे। बस मेरा, अनीता, अनुभव और मृगांक का ही इंतजार हो रहा था। अंत्येष्टि की सारी तैयारी अग्रज ललित मोहन व मनमोहन सहित परिजन कर चुके थे। शोक-संतप्तता, विलाप और रुदन एक बार फिर शुरू हुआ। अनुभव और मृगाँक तो समझ ही नहीं पाए कि ये क्या हो गया! अपने माता-पिता को रोता देख बालमन क्या कर सकता है? मैंने पिताजी का ढका चेहरा हटाया। शरीर ठंडा था। आँखें चिर निद्रा में लीन थीं। चेहरा शांत था। कोई पीड़ा, निराशा या असहजता मुझे नहीं दिखाई दी। बीती रात खाना खाया था। दो बार कॉफी भी पी थी। दो-तीन दिनों से घरों की कुर्सी-दरवाजों पर रंग-रोगन में लीन थे। सब कुछ पन्द्रह मिनट में हो गया।

परिजनों को एक-डेढ़ घण्टा लग गया यह समझने में कि पिताजी नहीं रहे। बीमार रहने लगे थे लेकिन एक दिन भी ऐसा नहीं आया कि उन्हें पकड़कर इधर-ऊधर ले जाना पड़ा। यह बड़ी बात रही कि वे अपनी पत्नी सुन्दा सहित बहूओं-बेटों के आस-पास ही रहे। बाद-बाद में माँजी तनिक देर के लिए भी इधर-ऊधर हो जाती तो आवाज़ देते-‘‘हला…! कख गएनि?’’ कितनी अजीब बात है न ! बतौर पुत्र मैं पिछले तीन सौ पैंसठ दिन में एक हरफ़ पिता पर न लिख सका। आज मेरा पिता प्रेम जाग उठा! वैसे, ऐसा नहीं है कि कुछ लिखने का मन ही नहीं हुआ। कई बार अंगुलियाँ की-बोर्ड तक गईं। फिर? फिर, किस्से-दर-किस्से याद आए। फिर? फिर, न जाने क्यों मन नहीं हुआ! ऐसा नहीं है कि पिता के लिए लिखने को मेरे पास शब्द नहीं हैं! भावनाएँ नहीं हैं! बहुत कुछ है। पर पिता के जाने का मलाल ही रहा कि ठीक से कभी यह सूझा नहीं कि कहाँ से शुरू करूँ? बार-बार ज़ेहन में आता रहा कि क्या लिखूँ? अब क्यों लिखूँ? अब लिखने से वे लौट तो नहीं पाएँगे..! 15 नवम्बर को न रहने की सूचना के बाद कई अवसरों पर लिख सकता था। लेकिन, नहीं लिख पाया। कई बार तो पिता सपने में आए। कल रात भी आए। अलग-अलग तरीके से आए। जीवंत। वैसे ही, एकदम ऊर्जा से भरपूर। कई बार यूँ ही याद आए।

चारों ओर उनकी यादें, बातें और बनाई हुई वस्तुएं हैं। सारा परिवेश गाहे-बगाहे उनकी उपस्थिति की याद दिलाता है। घर में सब उन्हें याद करते हैं। उनकी चर्चा होती है। अनुभव और मृगाँक भी खू़ब याद करते हैं। अब सोच रहा हूँ कि कई यादें,किस्से,अनुभव और घटनाएँ हैं, जिन्हें लिखा जाना चाहिए।पिता आम दिनों में कई बार चिन्तातुर रहते थे। लेकिन, मैंने उन्हें थका हुआ कभी नहीं देखा। उदास भी कभी नहीं देखा। वे बाहरी तौर पर ठेठ पारम्परिक पिता ही थे। लेकिन, भीतर से वे ख़ालिस जज़्बाती इंसान थे। उन्हें सबकी फि़क्र रहती थी। लेकिन, वह फि़क्र को ओढ़कर नहीं रखते थे। मुझे याद नहीं आता कि उन्होंने कभी मुझे गले लगाया हो। गोद में बिठाया हो। या हमारे साथ मस्ती,खेल-खिलौने जैसा कोई उपक्रम किया हो। अलबत्ता, वे सदा सकारात्मक रहते। वे भीड़ का हिस्सा कभी नहीं रहे। कुछ न कुछ रचनात्मक कार्य में लीन रहते। जड़ों को आकृतियां देने में वे माहिर थे। सर्दी-खांसी, जुकाम, बुखार आदि में लिप्त उन्हें कभी नहीं देखा।

कभी निमोनिया बिगड़ा था। कालान्तर में हर्निया का आपरेशन हुआ था। बस, इसके अलावा वे सदा निरोगी ही रहे। हम चार भाई-बहिन हैं। उन्हें कभी ठीक से याद नहीं रहता कि हम कौन-कौन, किस-किस कक्षा में पढ़ते हैं। लेकिन उन्होंने हमारी ज़रूरतों को जैसे-तैसे भी पूरा किया। बस कहते थे,‘‘पढ़ने में कमी नहीं होनी चाहिए।’’ वे केन्द्र सरकार के कर्मचारी रहे तो मुझे याद है कि उन्होंने सेवारत् रहते हाई स्कूल की परीक्षा दी थी। वे पास हुए थे। हमें बहुत अच्छा लगा था। मजबूत व्यक्ति के तौर पर हमने उन्हें देखा है। लेकिन उन्हें गुस्सा भी खूब आता था। फिर उफनते दूध की तरह तत्काल शान्त भी हो जाते थे। वे कभी खिन्न हुए हों। यह नहीं हुआ। हमने उनके हाथ की बुनी स्वेटरें पहनी हैं। सालों-साल उनके सिले हुए खाकी की पैण्ट,कमीजें और पायजामे पहने। ऊषा मशीन आज भी घर में है। उनकी बनाई हुई बाल्टियाँ अभी उपयोग में है। हाथ से किए जाने वाले कई कामों का हुनर उनके भीतर रहा। बिजली के कैसे भी उपकरण हों, वे ठीक कर लेते थे। वे कारपेन्टर का काम जानते थे। उसे किया। वे दर्जी भी रहे। वे मैकेनिक भी रहे। तकली पर सूत कातना और स्वेटर बुनना उनके लिए सरल था। बढ़ई होने के साथ-साथ वे हमारे लिए एक सधे हुए सैलून भी रहे।

अब अवस्था हो गई थी। हाथ कांपने लगे थे। अन्यथा, घर में ही हमारे सिर पर उनकी कैंची चलती। कई चूड़ाकर्म संस्कार में उन्हें याद किया जाता। वे खुद कहते,‘‘चूड़ाकर्म संस्कार में दो-दो पण्डित कभी देखे हैं?’’ हमें याद है कि हर साल दीवाली के अवसर पर हम भाई-बहिनों के लिए जूते-कपड़े और बहुत ज़रूरत की चीज़ें आतीं। वेतन का बोनस जूते-चप्पलों की खरीददारी में हवा हो जाता। तब वेतन क्या होता होगा? बोनस पर हमारी खास ज़रूरतें पूरी होती थीं। जब हाई स्कूल कर लिया तब पता चला कि पिताजी हमारी खातिर नए मकानों पर सेनेट्री का तकनीकी काम किया करते थे। हमें धीरे-धीरे गुमान होने लगा था कि ऐसे पिता की संतान होने का गौरव शायद हजारों में एक-दो को ही रहता होगा।

जब से होश सँभाला तभी से उन्हें हर वक़्त चीज़ों-वस्तुओं और काम में व्यस्त पाया। यही कारण था कि बिस्तर पर लेटते ही उन्हें नींद आ जाती थी। हमने तो वह समय भी जिया है जब,दूसरों के घरों में ब्लैक एण्ड व्हाइट टीवी देखने जाया करते थे। हमारे घर में जब लकड़ी के फ्रेम में जड़ा टेलीविस्टा टीवी आया था,तो आस-पड़ोस के परिचितों का तांता लग गया था। उनकी तकनीकी जानकारी की हाम थी। पिताजी ने बाटा शुरू किया तो बाटा ही चल पड़ा। ऊषा मशीन आई तो घरों में ऊषा मशीन ही लाई जाने लगी। फिलिप्स रेडियो लाए तो घर-घर फिलिप्स। सोनी का टेपरिकॉडर आया तो उसकी चल पड़ी। कैसेट एचएमवी लाते तो एचएमवी मुहल्ले की पसंदीदा कैसेट हो जाती। एचएमटी घड़ी खरीदी तो सबके हाथों में वही घड़ी। तब स्टील के बरतन दीनदयाल कंपनी के आते थे। उसे सबसे पहले पिताजी ने ही खरीदा था। वे ऊनी कम्बलों,कपड़ों के अच्छे जानकार भी थे। कहते हैं कि यदि माता-पिता और शिक्षक बेहतर हों तो संतान बेहतरीन बन जाती है।

हालांकि मैं सोचता हूँ कि पिता एक अदृश्य सीढ़ी होता है। उस सीढ़ी के पायदानों पर चढ़ते-चढ़ते संतानें अर्श पर पहुँच जाती हैं। पिताजी ने कर्म को पहला धर्म माना। पिताजी मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस में पाइप फीटर थे। फिर फीटर हुए। फिर फोरमैन हुए। लेकिन सिविल कोर में रहते हुए भी उन्हें विभाग की आर्मी कोर के अधिकारी भी बुलाते थे। अक्सर रविवार को क्या और शाम-अंधेरे भी बुलावा आ जाता था। कॉलोनी कार्यालय से बहुत दूर थी। बुलावा भेजने वाले कार्मिक भी परेशान होते थे।

हम अक्सर सुनते-‘‘पण्डितजी को फलाँ साहब ने बुलाया है।’’ यह सुनते तो हम अक्सर चिढ जा़ते थे। आप ही को क्यों बुलाया जाता है? यह सवाल अक्सर हमारे घर में टंगा रहता। हमें याद है कि पिताजी को एक बार कार्यनिष्ठा के लिए सुनहरे लिफाफे में एक रुपया सम्मान में मिला था। एक टाइपराइटर में टंकित चिट्ठी भी थी। तब टाइपराइटर के अक्षर काग़ज़ में छपे देखकर हम हैरान हुए थे। पिता खाने-पीने के शौकीन थे। हर संभव उन्होंने परिवार के लिए खाने-पीने की कमी नहीं होने दी। अक्सर कहते थे-‘‘खाने पर खर्च करो। पहनने पर दो पैसे कम खर्च करो। हां कपड़े साफ-सुथरे हों।’’बहुत सारे मामलों में मेरी उनसे अपार असहमतियां थीं। असहमतियां थीं तो बहसें होती थीं।

हमारे पास स्कूली पढ़ाई-लिखाई का अनुभव था। उनके पास जीवन की पढ़ाई का अनुभव था। मैं कह सकता हूँ कि अक्सर जीवन की पढ़ाई के सामने स्कूली पढ़ाई-लिखाई उन्नीस रह जाती है। वे अपनी बात पर अडिग रहते। अन्ततः अक्सर उन्हीं की बात सही होती थी। वह बाहर से कड़क रहते। लेकिन भीतर से हमारी खूब चिंता करते थे। अन्तिम समय तक उन्होंने देने का भाव ही रखा। वे चिट्ठियां लिखते। कड़कमिजाज़ और साफगोई पत्रों में लिख देते। परिजन कई बार नाराज़ भी हो जाते। पर पिताजी अपनी आदत नहीं बदल पाए। वे किसी का अहसान नहीं चाहते थे। उधार से कोसों दूर रहते थे। वक्त-ज़रूरत पर कभी किसी से यदि लिया तो उसे अविलम्ब लौटा भी दिया करते थे। साइकिल के शौकीन रहे। फिर अपने लिए विद्युतचालित स्कूटी भी ली।

कालान्तर में श्वास रोग की चपेट में आने से वह सब भी छूटा। देहरादून से सेवानिवृति के बाद हम बच्चों की खातिर वे माँजी सहित पहले चमोली जनपद में हमारे साथ रहे। फिर हमारे लिए ही पौड़ी भी रहे। पिछले साल दिवाली पहले आ गई थी। हम लौट रहे थे तो बोले-‘‘दो महीने की बात है। जनवरी तक हम दोनों तुम्हारे साथ पौड़ी आ जाएंगे।’’ वक्त की बात है। दो महीने नहीं, पूरे बारह महीने हो गए। आप नहीं लौटे। इस साल की दीवाली सूनी रही। दूसरी नज़र से देखूं तो आप गए ही कहां थे? आप यहीं हैं। यहीं-कहीं। हमारे पास। अपनों के साथ। बातों में, घटनाओं में और हमारे भीतर जमाई गई आदतों में भी आप ही तो हैं।

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मनोहर चमोली ‘मनु’

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