ऐसे लगाया ध्यान


बयार पढ़ाई कर रही थी। लेकिन अंतरिक्ष की खटर-पटर में उसका ध्यान हट रहा था। तंग आकर उसने कह ही दिया,‘‘भैया। पढ़ ले। एग्जाम नजदीक आ रहे हैं। मैं हर बार तेरे आगे की सीट पर नहीं बैठने वाली हूं। पता है, आज मैडम क्या कह रही थी? मैं बताती हूं। अब एग्जाम में हर दिन सीट बदल जाया करेगी।’’ बयार ने अंतरिक्ष से कहा।
अंतरिक्ष ने गरदन झटकते हुए कहा-‘‘स्कूल वालों ने कह दिया और तूने मान लिया। तू मुझसे छोटी है। मुझे समझाया न कर। बड़ों से ऐसे बात करते हैं?’’


‘‘ओ तेरे की। मतलब कि तू चार मिनट बड़ा है तो हमेशा रौब मारेगा? हैं? मम्मी कह रही थी कि अंतरिक्ष को हवा लग रही है। पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे रहा है।’’ बयार ने अंतरिक्ष को अंगुली दिखाते हुए कहा।


तभी कमला अंदर आ गई। बोली,‘‘तुम दोनों से कितनी बार कहा है कि दूर-दूर बैठा करो। जब देखो, बहस करते रहते हो। आने दो अपने पापा को। आज तुम्हारी क्लास न लगवाई तो कहना।’’ अपनी मम्मी को गुस्से में देखकर दोनों चुपचाप किताब के पन्ने उलटने लगे।


यह रोज की बात थी। दोनों बात-बे-बात पर उलझने लगते। आखिरकार एग्जाम आ ही गए। कक्षा में हलचल मच गई। हर कोई एग्जाम का टाइम-टेबिल देखकर चिंता में दिखाई दे रहे था। छुट्टी हुई और सब अपने-अपने घर आ गए। अंतरिक्ष कुछ परेशान लग रहा था। बयार ने आंखें मटकाते हुए कहा-‘‘मैं कहती थी न कि पढ़ ले। लेकिन मस्ती कौन करता? अब सर पकड़ कर बैठने से कुछ नहीं होने वाला है। मैंने हर सब्जेक्ट के नोट्स बनाये हैं। सुबह तू देख लिया करना। मैं फिर शाम को देख लिया करूंगी। एग्जाम डेट आ गई है। हर सब्जेक्ट के लिए थोड़ा-थोड़ा समय निकाल। अब भी वक्त है। सुन रहा है न तू?’’

अंतरिक्ष ने चेहरे पर बनावटी गंभीरता लाते हुए कहा-‘‘थैंक्स बयार। लेकिन पता है, मेरी प्राब्लम क्या है? यार, ये इतिहास। मैं चाह कर भी सन् और डेट याद नहीं रख पाता। ओह शट्। आज तारीख क्या है? मुझे आज का दिन तक याद नहीं है। तेरा रोल नंबर मेरे रोल नंबर से पहले आता है। देखना। हमारी सीट आगे-पीछे ही रहेगी। बस तू मेरे को हिस्ट्री के पेपर में हेल्प कर देना। बाकी तो मैं संभाल लूंगा। वैसे भी हमारी क्लास का रिजल्ट हमारे ड्राइंग टीचर फाइनल करते हैं। वो मेरे कहने पर दो-चार नंबर तो बढ़ा ही देंगे। ’’


बयार ने अंतरिक्ष को फिर से अंगुली दिखाई। फिर आँखों को गोल-गोल घुमाते हुए कहा-‘‘ओ सयाने। रहने दे। नंबर कोई आसमान से नहीं टपकते। वैसे भी इस बार नकल कानून लगा है। नकल करना भी और कराना भी अपराध है। समझे? मैं इस बार चाहकर भी तेरी मदद नहीं करने वाली हूं। आज प्रिंसिपल सर ने क्या कहा था! सुना नहीं तूने? नकल करने वाला और नकल कराने वाला जेल की हवा खाएगा। चल पढ़ ले और मुझे भी पढ़ने दे।’’ यह सुनकर पहले तो अंतरिक्ष ने बयार को घूरा। फिर चिढ़ाते हुए मुंह से फूंक मारी और बैग पटक कर खेलने चला गया।


बयार ने माथा पकड़ लिया। वह अंतरिक्ष को जाते हुए देखती रही। उसने अपना बैग खोला और स्कूल से मिला हुआ होमवर्क देखने लगी। अंतरिक्ष खेलकर लौटा तो बयार किताबें उलट रही थी। अंतरिक्ष ने बोला,‘‘कल तो पढ़ाई नहीं होगी। कक्षाओं में रोल नंबर के हिसाब से सीटें लगेंगी। मैं तो कल से पढ़ाई करूंगा।’’
सुबह से ही बच्चे परीक्षा की बातें कर रही थे। नोटिस बोर्ड पर कक्षावार सीट प्लान चिपका हुआ था। बयार का कहा हुआ सही साबित हुआ। बयार की सीट अंतरिक्ष से बहुत दूर लगी थी। अंतरिक्ष का चेहरा बुझ गया था। अगले दिन पहला पेपर हिंदी का था।
पेपर के दिन परीक्षा कक्ष में एक-दो मौके आए जब अंतरिक्ष ने पीछे मुड़कर देखा।
‘‘अंतरिक्ष। क्या हो रहा है। काॅपी ले लूं क्या?’’ ड्यूटी दे रही मैडम ने चेतावनी दी। अंतरिक्ष ने जैसे-तैसे पेपर दिया। घर आया तो झल्लाते हुए बोला-‘‘बयार। आज के पेपर का तो कबाड़ा हो गया है। मैं ही जानता हूं कि मैंने तीन घंटे कैसे बिताये। लेकिन मुझे लगता है कि पास होने लायक नंबर तो आ ही जाएंगे। कल क्या होगा? कल तो इतिहास का पेपर है।’’
बयार ने कंधे उचकाते हुए जवाब दिया-‘‘होना क्या है? कल तू किसी ओर कमरे में एग्जाम देगा। मेरी सीट किसी ओर कमरे में लगेगी। देख लेना।’’ यह कहकर बयार काॅपी के पन्ने उलटने लगी।
वही हुआ। नोटिस बोर्ड पर सीट प्लान बदला हुआ था। बयार का रोल नंबर दूसरे कमरे में था। अंतरिक्ष ने सिर पकड़ लिया। अपना रोल नंबर देखकर वह दूसरे कमरे में चला गया। वह चुपचाप अपनी सीट पर बैठ गया।
‘आज क्या होगा? आज तो मेरी ही हिस्ट्री बनने वाली है।’ अंतरिक्ष यही सोच रहा था। पेपर बंटने लगा। अंतरिक्ष ने एक नज़र पेपर पर डाली। पेपर के सवाल देखकर अंतरिक्ष का सिर घूमने लगा। अंतरिक्ष इधर-उधर देखने लगा। टीचर ने पूछा-‘‘अंतरिक्ष। कोई प्राॅब्लम? क्या चाहिए?’’ अंतरिक्ष ने न में सिर हिलाया। उसने अपनी कमर सीधी की और पेपर पढ़ने लगा।

‘‘अब क्या होगा? कुछ खास समझ में क्यों नहीं आ रहा है? क्या पेपर छोड़ दूं? एक साल ही तो खराब होगा न?’’ अंतरिक्ष अपने आप से सवाल पर सवाल करने लगा। तभी उसे बयार का ख्याल आया। बयार तो एक क्लास आगे हो जाएगी। अंतरिक्ष ने सोचा। तभी टीचर काॅपी पर साइन करने आए। अंतरिक्ष से कहा-‘‘क्या सोच रहे हो? काॅपी पर फारमल्टीज़ तो पूरी कर लेते। क्या हुआ?’’
यह सुनकर अंतरिक्ष सीट पर खड़ा हो गया। वह बुरी तरह से घबराया हुआ था। टीचर ने मुस्कराते हुए उसे बैठने को कहा। वह अंतरिक्ष की काॅपी पर साइन कर के आगे बढ़ गए। अंतरिक्ष पेपर को कई बार पढ़ चुका था। अब उसके पास अनाप-शनाप लिखने के अलावा कोई चारा नहीं था। घड़ी देखी तो अभी चालीस मिनट ही बीते थे।


‘‘उफ! तीन घण्टे कैसे बीतेंगे। अब तो अनुमान से ही लिखना होगा।’’ अंतरिक्ष ने सोचा। अंतरिक्ष ने बांयी तरफ बैठे स्टूडेंट की कापी पर नज़र डाली। लेकिन उसने दांये हाथ से अपनी काॅपी को ढक लिया। अंतरिक्ष ने मुंह बिचकाया और अपनी काॅपी को घूरने लगा।


परीक्षा का एक घंटा बीत चुका था। अंतरिक्ष जितनी गप लिख सकता था, वह लिख चुका था। ‘एक बार बाहर का चक्कर लगाकर आता हूं। क्या पता कुछ याद आ जाए।’ अंतरिक्ष यही सोच रहा था। ‘‘सर! मैं पानी पीने बाहर जा सकता हूं?’’ अंतरिक्ष ने ड्यूटी दे रहे टीचर से पूछा।


‘‘जाओ। लेकिन रजिस्टर पर बाहर जाने का टाइम लिखो और साइन भी करो। जल्दी वापिस आना। और हाँ! फिर एक घंटे तक दोबारा अपनी सीट से नहीं हिलोगे।’’ टीचर ने कई सारी हिदायतें दे डालीं।


अंतरिक्ष परीक्षा कक्ष छोड़कर बाहर आ गया। इधर-उधर घूमने लगा। सोचने लगा-‘‘टहलने से भी कुछ याद नहीं आ रहा है। अब बाहर आ गया हूं तो थोड़ा ठंडा पानी पी ही लूं।’’

अंतरिक्ष स्कूल की टंकी के पास जा पहुंचा। उसने दो घूंट पानी पिया। हाथ पोंछने के लिए जेब से रूमाल निकाला। नल के पास पड़ी एक पर्ची पर उसकी नजर पड़ी। उसने पर्ची उठाई। मुड़ी-तुड़ी पर्ची खोली तो वह दंग रह गया।
‘‘ओ तेरे की। कमाल है! ये डेट्स और सन् तो पेपर में आ रखे हैं। दिल्ली की हिस्ट्री भी इस पर्ची में है। क्या करूं ? यहां पर खड़े होकर पढ़ना ठीक नहीं। जेब में रख लूं? फेल होने से बचने का मौका मिल रहा है। लेकिन पकड़ा गया तो? जेल जाना है क्या?’’ अंतरिक्ष के मन में कई सारे सवाल उठ रहे थे।
‘‘कभी नहीं से देर भली। ठीक इसी तरह फेल होने से अच्छा जेल भली। नहीं पकड़ा गया तो पास भी हो सकता हूं।’’ अंतरिक्ष बुदबुदाया। उसने दूसरे ही क्षण पर्ची जेब में रख ली। वह तेज कदमों से चलने लगा।


अंतरिक्ष सीधे अपनी सीट पर जाकर बैठ गया। उसने झट से पर्ची को उत्तर पुस्तिका के बीचों-बीच रख दिया। काॅपी के पन्ने पलट कर वह पेपर पढ़ने लगा। तभी अंतरिक्ष की नजर अपनी ओर आ रहे टीचर पर पड़ी।


अंतरिक्ष बुदबुदाया-‘‘अरे यह क्या। ये टीचर मेरे पास ही क्यों चले आ रहे हैं? बच्चू। अब तू तो गया।’’
टीचर ने अंगुली से इशारा करते हुए अंतरिक्ष से कहा-‘‘खड़े हो जाओ।’’
‘‘क्यों? क्या हुआ?’’ अंतरिक्ष ने थूक घूंटते हुए टीचर से पूछा।
‘‘अच्छा। अब ये भी बताना पड़ेगा। रजिस्टर में आने का टाइम कौन लिखेगा? मैं या तुम?’’ टीचर ने कमर पर हाथ रखते हुए पूछा।
अंतरिक्ष दौड़कर गया। उसने कांपते हाथों से रजिस्टर उठाया। परीक्षा कक्ष में आने का टाइम लिखा और दौड़ कर फिर अपनी सीट पर आकर बैठ गया। तब तक टीचर दूसरी कक्षा के दूसरे कौने में चहलकदमी कर रहे थे। उसने देखा कि दूसरी मैडम फिर उसकी ओर चली आ रही है। वह बोलीं,‘‘उठो।’’ अंतरिक्ष डर गया। मैडम कहीं काॅपी के पन्ने न उलटने लगे। वह यही सोच रहा था।


मैडम बोलीं,‘‘अरे। अपना एडमिट काॅर्ड तो उठा लो। टेबिल के नीचे पड़ा है।’’
अंतरिक्ष उठा और झुक कर अपना एडमिट काॅर्ड उठाकर जेब में रख लिया। माथे पर आया पसीना पोंछते हुए वह सोचने लगा,‘‘ओह! बच गया। अच्छा हुआ मैडम ने मेरी काॅपी उलट-पलट कर नहीं देखी। नकल की पर्ची तो बाहर निकल ही जाती।’’ अंतरिक्ष की सांस फूल रही थी।


‘‘ये परीक्षा में दो टीचर क्यों ड्यूटी देते हैं? एक तो बैठे रहते हैं और दूसरे यहां-वहां घूमते रहते हंै।’’ अंतरिक्ष सोच रहा था।
तभी कक्ष में उड़नदस्ता आ गया। एक साथ सात-आठ टीचर एक-एक बच्चे की तलाशी लेने लगे। काॅपिया उलट-पलट कर देखने लगे। शांत कमरा काॅपियों के पन्नों की फड़फड़ाहट से गूंज उठा।
‘‘उफ! अब तो मैं गया। अब मैं नहीं बच सकता। मेरी ही गलती है। मैं बाहर गया ही क्यों था? बाहर गया तो मेरी नजर पर्ची पर क्यों पड़ी? मैंने पर्ची उठाई ही क्यों?’’ अंतरिक्ष डर के मारे कांपने लगा।
उड़नदस्ते में ड्राइंग वाले टीचर भी थे। वह अंतरिक्ष को देखते ही उसके पास आ धमके। कहने लगे-‘‘अंतरिक्ष बेटा। कोई प्राॅब्लम? पेपर तो आसान है न?’’ यह कहते हुए उन्होंने अंतरिक्ष की काॅपी उठा ली। काॅपी उनके हाथ में नाचने लगी। काॅपी के पन्नों से फड-़फड़ की आवाज आ रही थी।

‘‘ओह शिट। मैंने तो पर्ची से एक अक्षर की नकल तक नहीं की। अब मुझे कोई नहीं बचा सकता। अब क्या होगा?’’ अंतरिक्ष ने घबराते हुए मन ही मन सोचा।
अंतरिक्ष की काॅपी के पन्ने हवा में हिल रहे थे। अंतरिक्ष ने थूक घूंटते हुए कहा-‘‘सर पेपर बहुत आसान है। सब बड़े आराम से जवाब लिख रहे हैं। कोई प्राॅब्लम नहीं है।’’ अंतरिक्ष ने दोनों हाथ ऐसे फैला दिये, जैसे उसे कोई गेंद पकड़नी हो।
‘‘अगर आज बच गया तो फिर कभी लापरवाही नहीं करूंगा। पढ़ाई पर ध्यान दूंगा। नकल करना तो दूर, स्कूल से बंक मारने की भी नहीं सोचूंगा। कसम खाता हूं। सच कह रहा हूं।’’ अंतरिक्ष ने छत की ओर देखते हुए अपनी आंखे बंद कर ली।
‘छट’ की आवाज आई। अंतरिक्ष की काॅपी उसकी टेबिल पर रखकर ड्राइंग के टीचर दूसरे स्टूडेंट की काॅपी उठा चुके थे। अंतरिक्ष भी धम्म से अपनी सीट पर बैठ तो गया। लेकिन उसके हाथ-पांव अब भी थरथरा रहे थे।


ड्राइंग के टीचर ने अंतरिक्ष की काॅपी दांये किनारे से उठाई थी। यह संयोग ही था कि पर्ची पन्नों के बीच में उनके अंगूठे ओर तर्जनी के बीच में ही दबी रही। काॅपी का बाकि हिस्सा फड़फड़ाता रहा लेकिन पर्ची टस से मस तक नहीं हुई।
अंतरिक्ष ने जेब से रूमाल निकाला और माथे पर आया पसीना पोंछा। मौका देखते ही उसने पर्ची मुंह में डाल ली। चबा-चबा कर वह पर्ची को घूंट चुका था। उसने काॅपी जमा करवा दी। तेज कदमों से अंतरिक्ष सीधे मुंह घर चला आया।
‘‘जो हुआ सो हुआ। कल इंग्लिश का पेपर है। अच्छे से तैयारी करता हूं।’’ अंतरिक्ष ने कहा और तैयारी करने लगा। अब उसका सारा ध्यान किताब पर था। वह ध्यान लगाकर, समझ कर पढ़ रहा था।


तभी बयार आ गई। बोली,‘‘सोच रही हूँ मिलकर पढ़ाई करते हैं। एक-दूसरे की मदद भी हो जाएगी और मन भी लगा रहेगा।’’
अंतरिक्ष ने कुछ देर सोचा फिर कहा,‘‘चल तू भी क्या याद करेगी। मुझे कोई परेशानी नहीं है।’’ बयार हंस रही थी तो अंतरिक्ष को भी हंसी आ गई।

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