सहज बनाता साहित्य


दुनिया को पाठकों के सामने रखने की ताकत साहित्य में है। अनुमान और कल्पना के सहारे भी संवेदना को बचाए और बनाए रखने का अनूठा काम साहित्य ही करता है। जीव,जीवन और इस दुनिया के प्रति सौन्दर्यबोध को समृद्ध भी साहित्य ही करता है। संसार के क्रियाकलापों को महसूस कराने का काम स्कूल से बेहतर कोई और नहीं कर सकता। अध्यापक इस दिशा में एक कड़ी हैं। वे ही हैं जो छात्रों और अभिभावकों के साथ समुदाय के मध्य महत्पपूर्ण हिस्सा बन जाते हैं। भाषा की कक्षा और भाषा के अध्यापक में यह स्वतंत्रता संभवतः सबसे अधिक होती है कि छात्रों में सौन्दर्यबोध और अनुभव को विस्तार दिया जा सके। पाठ्य पुस्तक के पाठों को समझने और अभ्यास प्रश्नों को हल करने के बहाने भी साहित्य को सन्दर्भ के तौर पर स्थान आसानी से दिया जाता है। यह जरूरी भी है। छात्रों की सहज भाषायी क्षमताओं को पहचानने और बढ़ाने के लिए भी साहित्य बेजोड़ सन्दर्भ है।


सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता ‘घोड़ा’ मात्र अनुमान और कल्पना की उड़ान नहीं भरती। छात्रों के साथ साझा करने पर यह बात और भी पुष्ट हो जाती है। भाषाई कौशल के विकास के लिए इस तरह की कविताओं की ताकत शिक्षा के दस्तावेज भी स्वीकारते हैं। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना बच्चे की अस्मिता और उसकी दुनिया को इस कविता में प्रतिबिम्बित करते हैं। एक पालतू जानवर और बच्चे के रिश्ते को यह कविता अलग ढंग से परिभाषित करती है। छात्र ही क्यों किसी भी तरह का पाठक ऐसी कविताओं को पढ़ते हुए अपनी कल्पनाशीलता को समृद्ध ही करता है। अध्यापक चाहें तो इस कविता के माध्यम से पर्यावरण, सामाजिक विज्ञान, विज्ञान, कला के कई प्रकरणों पर सार्थक चर्चा करा सकते हैं। इस लिहाज़ से शैक्षिक दख़ल के पाठकों को यह कविता और भी आनन्द देगी। राजेश उत्साही की कविता ‘आलू, मिर्ची चाय जी’ तो कई गतिविधियों के आयोजन का न्यौता देती है। बुनियादी स्कूलों के छात्रों के साथ-साथ स्नातक के छात्रों के साथ भी यह कविता कई विषयों का समन्वय कराने की ताकत रखती है। खान-पान की बदलती तस्वीर के साथ-साथ रसोई से आयात-निर्यात तक की चर्चा करा पाने में सक्षम यह कविता सामूहिकता में एकता को विस्तार देती है। स्थानीय से वैश्विक इतिहास-भूगोल और भाषाई दक्षताओं पर घण्टों चर्चा कराने वाली नायाब कविताओं में यह एक है।
जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘छोटा जादूगर’ भाषा, साहित्य और सौंदर्यशास्त्र का बेहतर समन्वय कराती है। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के अंतिम सोपान के बुनियादी पाठक महसूस कर सकते हैं कि एक कहानी कैसे देशकाल, परिस्थितियों की विषम स्थितियों में भी ख़ास तरह का जुड़ाव देती है। यह कहानी पढ़ने का आनंद मात्र नहीं देती बल्कि यह पाठक के ज़हन में संस्कृति,समतामूलक समाज, लोकतांत्रिक मूल्यों की वकालत भी करती है। यह कहानी हाशिए के समाज का चित्रण तो करती है उसके साथ जुड़ाव रखने की असरदार पैरवी अनायास ही करती है। हरिशंकर परसाई का कहानीनुमा लेख ‘चूहा और मैं’ राष्ट्र के जीवन में भागीदारी की ओर उन्मुख कराता है। वह चुटीले अंदाज में सहभागिता के साथ-साथ सच के साथ खड़े होने की ओर इशारा भी करता है। खुद की अभिव्यक्ति के अधिकार की याद दिलाता है। यह और भी प्रासंगिक है। बाल साहित्य के लिए यह सीमित सामग्री एक बार फिर हमारा ध्यान इस ओर दिलाती है कि भाषिक क्षमता के विस्तार के लिए छात्रों को सन्दर्भ सामग्री दी जानी चाहिए। कौन-सी बात कब और कैसे रखनी है-लिखनी है, यह छात्र सीख ही लेते हैं। भाषा का विकास कक्षा-कक्ष में ही नहीं होता, बाहर भी होता है। छायावादी युग, स्वतंत्र भारत और समकालीन साहित्य से चुनी रचनाओं में जो विविधता पढ़ते सम महसूस होगी वहीं इस बहाने इस बार हम इन रचनाओं को विद्यालयी संदर्भ सामग्री के तौर पर भी लेंगे तो शैक्षिक दखल को प्रसन्नता होगी। -शैक्षिक दख़ल

घोड़ा
-सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
अगर कहीं मैं घोड़ा होता,
वह भी लंबा चैड़ा होता।
तुम्हें पीठ पर बैठा कर के,
बहुत तेज मैं दौड़ा होता।

पलक झपकते ही ले जाता,
दूर पहाड़ों की वादी में।
बातें करता हुआ हवा से,
बियाबान में आबादी में।

किसी झोंपड़े के आगे रुक,
तुम्हें छाछ और दूध पिलाता।
तरह-तरह के भोले-भाले,
इनसानों से तुम्हें मिलाता।

उनके संग जंगलों में जाकर,
मीठे-मीठे फल खाते।
रंग-बिरंगी चिड़ियों से,
अपनी अच्छी पहचान बनाते।

झाड़ी में दुबके तुमको,
प्यारे-प्यारे खरगोष दिखाता।
और उछलते हुए मेमनों के संग,
तुमको खेल खिलाता।

रात ढमाढम ढोल झमाझम,
झाँझ नाच-गाने में कटती।
हरे-भरे जंगल में तुम्हें,
दिखाता कैसे मस्ती बँटती।

सुबह नदी में नहा दिखाता,
तुमको कैसे सूरज उगता।
कैसे तीतर दौड़ लगाता,
कैसे पिंडुक दाना चुगता।

बगुले कैसे ध्यान लगाते,
मछली षांत डोलती कैसे।
और टिटहरी आसमान मे,ं
चक्कर काट बोलती कैसे।

कैसे आते हिरन झुंड के झुंड,
नदी में पानी पीते।
कैसे छोड़ निषान पैर के,
जाते हैं जंगल में चीते।
हम भी वहाँ निषान छोड़कर,
अपन फिर वापस आ जाते।
षायद कभी खोजते उसको,
और बहुत से बच्चे आते।

तब मैं अपने पैर पटक,
हिन-हिन करता तुम भी खुष होते।
कितनी नकली दुनिया यह अपनी,
तुम सोते में भी कहते।

लेकिन अपने मुँह में नहीं,
लगाम डालने देता तुमको।
प्यार उमड़ने पर वैसे छू ,
लेने देता अपनी दुम को।

नहीं दुलत्ती तुम्हें झाड़ता,
क्योंकि उसे खाकर तुम रोते।
लेकिन सच तो यह है बच्चों
तब तुम ही मेरी दुम होते।
॰॰॰
आलू मिर्ची चाय जी
राजेश उत्साही
आलू ,मिर्ची, चाय जी
कौन कहाँ से आए जी।
सात समुंदर पार से
दुनिया के बाज़ार से
व्यापार से, उपहार से
जंग लड़ाई मार से
हर रस्ते से आए जी
आलू ,मिर्ची, चाय जी!

मेक्सिकन है अमरूद
मिर्ची ने जहाँ पाया रूप
दक्षिण अमेरिका में पली
आलू के साथ मूँगफली
साथ टमाटर भाए जी
आलू, मिर्ची चाय जी!

नक्षे में यूरोप है जो भी
जन्मे हैं वहाँ मूली,गोभी
भिंडी हरी अफ्रीका की
भूरी-भूरी काॅफी भी
दुनिया भर में छाए जी
आलू ,मिर्ची, चाय जी!

चीन से सोयाबीन चली
अमेरिकन को लगी भली
धूम मचा कर लौटी देष
उसमें हैं गुण कई विषेश
चाय चीन की ताई जी
आलू ,मिर्ची, चाय जी!

बेंगन,सेम,करेला,कटहल
गिल्की,अदरक,टिंडा,परवल
आम,संतरा,काली मिर्ची
भाई-बहन हैं सब देषी
भारत की पैदाइष जी
कौन-कहाँ से आए जी।
॰॰॰
छोटा जादूगर
जयशंकर प्रसाद
कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हँसी और विनोद का कलनाद गूँज रहा था। मैं खड़ा था उस छोटे फुहारे के पास जहाँ एक लड़का चुपचाप षराब पीनेवालों को देख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से एक मोटी-सी सूत की रस्सती पड़ी थी और जेब में कुछ ताष के पत्ते थे। उसके मुँह पर गंभीर विशाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी ओर न जाने क्यों आकर्शित हुआ। उसके अभाव में भी संपन्नता थी। मैंने पूछा,‘‘क्यों जी। तुमने इसमें क्या देखा?’’
‘‘मैंने सब देखा है। यहाँ चूड़ी फेंकते हैं। खिलौनों पर निषाना लगाते हैं। तीर से नंबर छेदते हैं। मुझे तो खिलौनों पर निषाना लगाना अच्छा मालूम हुआ। जादूगर तो बिलकुल निकम्मा है। उससे अच्छा तो ताषा का खेल मैं ही दिखा सकता हूँ।’’ उसने बड़ी प्रगल्भता से कहा। उसकी वाणी में कहीं रूकावटन थी। मैंने पूछा,‘‘और उस परदे में क्या है? वहाँ तुम गए थे?’’
‘‘नहीं वहाँ मैं नहीं जा सका। टिकट लगता है।’’
मैंने कहा,‘‘चलो,‘‘चलोे, मैं वहाँ पर तुमको लिवा चलूँ।’’
मैंने मन-ही-मन कहा,‘भाई,आज के तुम्हीं मित्र रहे।’
उसने कहा,‘‘वहाँ जाकर क्या कीजिएगा? चलिए निषाना लगाया जाए।’’ मैंने उससे सहमत होकर कहा,‘‘तो फिर चलो। पहले षरबत पी लिया जाए।’’ उसने स्वीकार-सूचक सिर हिला दिया।
मनुश्यों की भीड़ से जाड़े की संध्या भी वहाँ गरम हो रही थी। हम दोनों षरबत पीकर निषाना लगाने चले। राह में ही उसे पूछा,‘‘तुम्हारे घर में और कौन हैं?’’
‘‘माँ और बाबूजी।’’
‘‘उन्होंने तुमको यहाँ आने के लिए मना नहीं किया?’’
‘‘बाबूजी जेल में हैं।’’
‘‘क्यों?’’
‘‘देष के लिए।’’ वह गर्व से बोला।
‘‘और तुम्हारी माँ?’’
‘‘वह बीमार है।’’
‘‘और तुम तमाषा देख रहे हो?’’
उसके मुँह पर तिरस्कार की हँसी फूट पड़ी।
उसने कहा,‘‘तमाषा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा तो माँ को पथ्य दूँगा। मुझे षरबत न पिलाकर अपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती।’’
मैं आष्चर्य से उस तेरह-चैदह वर्श के लड़के को देखने लगा।
‘‘हाँ, मैं सच कहता हूँ बाबूजी। माँजी बीमार हैं इसीलिए मैं नहीं गया।’’
‘‘कहाँ।’’
‘‘जेल में। जब कुछ लोग खेल-तमाषा देखते ही हैं तो मैं क्यों न दिखाकर माँ की दवा करूँ और अपना पेट भरूँ।’’
मैंने दीर्घ निरूष्वास लिया। चारों ओर बिजली के लट्टू नाच रहे थे। मन व्यग्र हो उठा। मैंने उससे कहा,‘‘अच्छा चलो, निषाना लगाया जाए।’’ हम दोनों उस जगह पर पहुँचे जहाँ खिलौने को गेंद से गिराया जाता था। मैंने बारह टिकट खरीदकर उस लड़के को दिए। वह निकला पक्का निषानेबाज। उसकी कोई गेंद खाली नहीं गई। देखनेवाले दंग रह गए। उसने बारह खिलौनोंक को बटोर लिया। लेकिन उठाता कैसे? कुछ मेरी रूमाल में बँधे। कुछ जेब में रख लिए गए। लड़के ने कहा,‘‘बाबूजी आपको तमाषा दिखाऊँगा। बाहर आइए। मैं चलता हूँ।’’
वह नौ-दो ग्यारह हो गया। मैंने मन-ही-मन कहा,‘इतनी जल्दी आँख बदल गई!‘
मैं घूमकर पान की दुकान पर आ गया। पान खाकर बड़ी देर तक इधर-उधर टहलता-देखता रहा। झूले के पास लोगों का ऊपर-नीचे आना देखने लगा। अकस्मात् किसी ने ऊपर के हिंडोले से पुकारा,‘‘बाबूजी।’’
मैंने पूछा,‘‘कौन?’’ ‘‘मैं हूँ छोटा जादूगर।’’ कलकत्ते के सुरम्य बोटैनिकल उद्यान में लाल कमलिनी से भरी हुई एक छोटी-सी झील के किनारे घने वृक्षों की छाया में अपनी मंडली के साथ बैठा हुआ मैं जलपान कर रहा था। बातें हो रही थीं। इतने में वहीं छोटा जादूगर दिखाई पड़ा। हाथ में चारखाने का खादी का झोला साफ जाँघिया और आधी बाँहों का कुरता। सिर पर मेरी रूमाल सूत की रस्सती से बँधी हुई थी। मस्तानी चाल में झूमता हुआ आकर वह कहने लगा,‘‘बाबूजी नमस्ते। आज कहिए तो खेल दिखाऊँ?’’
‘‘नहीं जी। अभी हम लोग जलपान कर रहे हैं।’’
‘‘फिर इसके बाद क्या गाना बजाना होगा बाबूजी।’’
‘‘नहीं जी।’’ तुमको क्रोध से मैं कुछ और कहने जा रहा था। श्रीमतीजी ने कहा,‘‘दिखलाओ जी। तुम तो अच्छे आए। भला कुछ मन तो बहले।’’ मैं चुप हो गया क्योंकि श्रीमतीजी की वाणी में वह माँ की-सी मिठास थी। जिसके सामने किसी भी लड़के को रोका नहीं जा सकता। उसने खेल आरंभ किया।
उस दिन कार्निवल के सब खिलौने उसके खेल में अपना अभिनय करने लगे। भालू मनाने लगा। बिल्ली रूठने लगी। बंदर घुड़कने लगा। गुड़िया का ब्याह हुआ। गुड्डा वर काना निकला। लड़के की वाचालता से ही अभिनय हो रहा था। सब हँसते लोट-पोट हो गए। मैं सोच रहा था। बालक को आवष्यकता ने कितना षीध्र चतुर बना दिया। यही तो संसार है। ताष के सब पत्ते लाल हो गए। फिर सब काले हो गए। गले की सूत की डोरी टुकड़े-टुकड़े होकर जुड़ गई। लट्टू अपने से नाच रहे थे। मैंने कहा,‘‘अब हो चुका। अपना खेल बटोर लो। हम लोग अब जाएँगे।’’
श्रीमतीजी ने धीरे से उसे एक रुपया दे दिया। वह उछल उठा। मैंने कहा,‘‘लड़के।’’
‘‘छोटा जादूगर कहिए। यही मेरा नाम है। इसी से मेरी जीविका है।’’
मैं कुछ बोलना ही चाहता था कि श्रीमतीजी ने कहा,‘‘अच्छा! तुम इस रुपए से क्या करोगे?’’
‘‘पहले भरपेट पकौड़ी खाऊँगा। फिर एक सूती कंबल लूंगा।’’
मेरा क्रोध अब लौट आया। मैं अपने पर बहुत क्रुद्ध होकर सोचने लगा,‘ओह! कितना स्वार्थी हूँ मैं। उसके एक रुपएया पाने पर मैं ईश्र्या करने लगा था न।’
वह नमस्कार करके चला गया। हम लोग लता-कुंज देखने के लिए चले। उस छोटे से बनावटी जंगल में संध्या साँय-साँय करने लगी थी। अस्ताचलगामी सूर्य की अंतिम किरण वृक्षों की पत्तियों से विदाई ले रही थी। एक षांत वातावरण थां हम लोग धीरे-धीेरे मोटर से हावड़ा की ओर आ रहे थे। रह-रहकर छोटा जादूगर स्मरण हो आता था। तभी सचमुच वह एक झोंपड़ी के पास कंबल कंधे पर डाले मिल गया। मैंने मोटर रोककर उससे पूछा-‘‘तुम यहाँ?’’
‘‘मेरी माँ यहीं है न! अब उसे अस्पताल वालों ने निकाल दिया है।’’
मैं उतर गया। उस झोंपड़ी में देखा तो एक स्त्री चिथड़ों सेलदी हुई काँप रही थी। छोटे जादूगर ने कंबल ऊपर से डालकर उसके षरीर से चिमटते हुए कहा,‘‘माँ।’’
मेरी आँखों से आँसू निकल पड़े।
बड़े दिन की छुट्टी बीत चली थी। मुझे अपने आॅफिस में समय से पहुँचना था। कलकत्ते से मन ऊब गया था। फिर भी चलते-चलते एक बार उस उद्यान को देखने की इच्छा हुई। साथ-ही-साथ जादूगर भी दिखाई पड़ जाता तो और भी……। मैं उस दिन अकेले ही चल पड़ा। जल्द लौट आना थां दस बज चुके थे। मैंने देखा कि उस निर्मल धूप में सड़क के किनारे एक कपड़े पर छोटे जादूगर का रंगमंच सजा था। मैं मोटर रोककर उतर पड़ा। वहाँ बिल्ली रूठ रही थी। भालू मनाने चला था। ब्याह की तैयारी थी। यह सब होते हुए जादूगर की वाणी में वह प्रसन्नता की तरी नहीं थी। जब वह औरों को हँसाने की चेश्टास कर रहा था। तब जैसे स्वयं काँप जाता था। मानो उसके रोएँ रो रहे थे। मैं आष्चर्य से देख रहा था। खेल हो जाने पर पैसा बटोरकर उसने भीड़ में मुझे देखा।वह जैसे क्षण भर के लिए स्फूर्तिमान हो गया। मैंने उसकी पीठ थपथपाते हुए पूछा,‘‘आज तुम्हारा खेल जमा क्यों नहीं?’’
‘‘माँ ने कहा है कि आज तुरंत चले आना। मेरी अंतिम घड़ी समीप है।’’ उसने अविचल भाव से कहा।
‘‘तब भी तुम खेल दिखलाने चले आए?’’ मैंने क्रोध से कहा। मनुश्य के सुख-दुख का माप अपना ही साधन तो है। उसके अनुपात से वह तुलना करता है। उसके मुँह पर वहीं परिचित तिरस्कार की रेखा फूट पड़ी। उसने कहा,‘‘क्यों न आता?’’ और कुछ अधिक कहने में जैसे वह अपमान का अनुभव कर रहा था। क्षण भर में मुझे अपनी भूल मालूम हो गई। उसके झोले को गाड़ी में फेंककर उसे भी बैठाते हुए मैंने कहा,‘‘जल्दी चलो।’’
मोटरवाला मेरे बताए हुए पथ पर चल पड़ा। कुछ ही मिनटों में मैं झोंपड़े के पास पहुँचै जादूगर दौड़कर झोंपड़े में माँ-माँ पुकारते हुए घुसा। मैं भी पीछे था। किंतु स्त्री के मुँह से ‘बे ़ ़ ़ ’ निकलकर रह गया। उसके दुर्बल हाथ उठकर गिर गए। जादूगर उससे लिपटा रो रहा था। मैं स्तब्ध था। उस उज्ज्वल धूप में समग्र संसार जैसे जादू-सा मेरे चारों ओर नृत्य करने लगा।
॰॰॰
चूहा और मैं
हरिशंकर परसाई
चाहता तो लेख का षीर्शक ‘मैं और चूहा’ रख सकता था। पर मेरा अहंकार इस चूहे ने नीचे कर दिया। जो मैं नहीं कर सकता। वह मेरे घर का यह चूहा कर लेता है। जो इस देश का सामान्य आदमी नहीं कर पाता। वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया।
इस घर में एक मोटा चूहा है। जब छोटे भाई की पत्नी थी। तब घर में खाना बनताथा। इस बीच पारिवारिक दुर्घटनाओं,बहनोई की मृत्यु के आदि के कारण हम लोग बाहर रहे।
इस चूहे ने अपना अधिकार मान लिया था कि मुझे खाने को इसी घर में मिलेगा। ऐसा अधिकार आदमी भी अभी तक नहीं मान पाया। चूहे ने मान लिया है।
लगभग पैंतालीस दिन घर बन्द रहा। मैं तब अकेला लौटा। घर खोला तो देखा कि चूहे ने काफी क्राॅकरी फर्ष पर गिराकर फोड़ डाली है। वह खाने की तलाष में भड़भड़ाता होगा। क्राॅकरी और डिब्बों में खाना तलाषता होगा। उसे खाना नहीं मिलता होगा, तो वह पड़ोस में कहीं कुछ खा लेता होगा और जीवित रहता होगा। पर घर उसने नहीं छोड़ा। उसने इसी घर को अपना घर मान लिया था।
जब मैं घर में घुसा, बिजली जलाई तो मैंने देखा कि वह खुषी से चहकता हुआ यहाँ से वहाँ दौड़ रहा है। वह षायद समझ गया कि अब इस घर में खाना बनेगा, डिब्बे खुलेंगे और उसकी खुराक उसे मिलेगी। दिनभर वह आनंद से सारे घर में घूमता रहा। मैं देख रहा था। उसके उल्लास से मुझे अच्छा ही लगा। पर घर में खाना बनना षुरू नहीं हुआ। मैं अकेला था। बहन के यहाँ जो पास में ही रहती है, दोपहर को भोजन कर लेता। रात को देर से खाता हूँ, तो बहन डब्बा भेज देती। खाकर मैं डब्बा बन्द करके रख देता। चूहाराम निराष हो रहे थे। सोचते होंगे यह कैसा घर है। आदमी आ गया है। रोषनी भी है। पर खाना नहीं बनता। खाना बनता तो कुछ बिखरे दाने या रोटी के टुकड़े उसे मिल जाते।
मुझे एक नया अनुभव हुआ। रात को चूहा बार-बार आता और सिर की तरफ मच्छरदानी पर चढ़कर कुलबुलाता। रात में कई बार मेरी नींद टूटती मैं उसे भगाता। पर थोड़ी देर बाद वह फिर आ जाता और सिर के पास हलचल करने लगता।
वह भूखा था। मगर उसे सिर और पाँव की समझ कैसे आई? वह मेरे पाँवों की तरफ गड़बड़ नहीं करता था। सीधे सिर की तरफ आता और हलचल करने लगता।
एक दिन वह मच्छरदानी में घुस गया। मैं बड़ा परेषान। क्या करूँ? इसे मारूँ और यह किसी अलमारी के नीचे मर गया तो सड़ेगा और सारा घर दुर्गन्ध से भर जाएगा। फिर भारी अलमारी हटाकर इसे निकालना पड़ेगा। चूहा दिन भर भड़भड़ाता और रात को मुझे तंग करता। मुझे नींद आती मगर चूहाराम मेरे सिर के पास भड़भड़ाने लगते।
आखिर एक दिन मुझे समझ में आया कि चूहे को खाना चाहिए। उसने इस घर को अपना घर मान लिया है। वह अपने अधिकारों के प्रति सचेत है। वह रात को मेरे सिरहाने आकर षायद यह कहता,‘‘क्यों बे! तू आ गया है। भर पेट खा रहा है! मगर मैं भूखा मर रहा हूँ। मैं इस घर का सदस्य हूँ। मेरा भी हक है। मैं तेरी नींद हराम कर दूँगा। तब मैंने उसकी माँग पूरी करने की तरकीब निकाली। रात को मैंने भोजन का डब्बा खोला तो पापड़ के कुछ टुकड़े यहाँ-वहाँ डाल दिए। चूहा कहीं से निकला और एक टुकड़ा उठाकर अलमारी के नीचे बैठकर खाने लगा। भोजन पूरा करने के बाद मैंने रोटी के कुछ टुकड़े फर्ष पर बिखरा दिए। सुबह देखा कि वह सब खा गया है।
एक दिन बहन ने चावल के पापड़ भेजे। मैंने तीन-चार टुकड़े फर्ष पर डाल दिए। चूहा आया। सूँघा और लौट गया। उसे चावल के पापड़ पसन्द नहीं। मैं चूहे की पसन्द से चमत्कृत रह गया। मैंने रोटी के कुछ टुकड़े डाल दिए। वह एक के बाद एक टुकड़ा लेकर जाने लगा।
अब यह रोजमर्रा का काम हो गया। मैं डब्बा खोलता तो चूहा निकलकर देखने लगता। मैं एक-दो टुकड़े डाल देता। वह उठाकर ले जाता। पर इतने से उसकी भूख षान्त नहीं होती थी। मैं भोजन करके रोटी के टुकड़े फर्ष पर डाल देता। वह रात को उन्हें खा लेता और सो जाता। इधर मैं भी चैन की नींद सोता। चूहा मेरे सिर के पास गड़बड़ नहीं करता। फिर वह कहीं से अपने एक भाई को ले आया। कहा होगा,‘‘चल रे मेरे साथ उस घर में। मैंने उस रोटीवाले को तंग करके डरा के खाना निकलवा लिया है। चल दोनों खाएँगे। उसका बाप हमें खाने को देगा। वरना हम उसकी नींद हराम कर देंगे। हमारा हक है।’’
अब दोनों चूहाराम मजे में खा रहे हैं। मगर मैं सोचता हूँ। आदमी क्या चूहे से भी बदतर हो गया है? चूहा तो अपनी रोटी के हक के लिए मेरे सिर पर चढ़ जाता है। मेरी नींद हराम कर देता है।
इस देष का आदमी कब चूहे की तरह आचरण करेगा?

॰॰॰

-मनोहर चमोली ‘मनु’

शैक्षिक दख़ल, जुलाई 2018

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