‘नया साल, कोरोना और हम’

किसी परिवार का एक सदस्य नहीं, दो नहीं….बल्कि सभी के सभी कोरोना पॉजीटिव हो जाएं तो चिंतित होना स्वाभाविक था। ……………….

बशीर बद्र साहब को कहाँ पता था कि उनका ये शेर 2020 में नए अर्थों और सन्दर्भों में कुछ और ही ध्वनि दे रहा होगा।

पहले शेर आपकी नज़र-

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

एक शहर क्या और एक मुल्क़ क्या ! यहाँ तो अब दुनिया ही फ़ासला चाहती है। हमारे साथ भी ऐसा ही हुआ। हालांकि यह ज़रूरी था। 17 दिसम्बर 2020 की बात है। अनीता दो-तीन दिन से बुखार में थीं। उससे पहले अनीता को नवम्बर में टाइफाइड की शिकायत रही। यूँ तो हम पिताजी का पहला वार्षिक श्राद्ध में शामिल होने देहरादून गए थे। लेकिन यह बात नवम्बर के आखिरी सप्ताह की थी।

अब याद कर रहा हूँ तो 11 या 12 दिसम्बर को मुझे भी बुखार महसूस हुआ था। एक-दो दिन खाने-पीने का मन भी नहीं किया। लेकिन मैंने इसे हलके में लिया। यह बात भी जोड़ देना चाहता हूँ कि जनता कर्फ्यू के घोषित होने के बाद से ही हम पूरे 10 महीने पौड़ी में ही रहे। 20 किलोमीटर तक की भी कोई यात्रा नहीं की। कोरोना काल में परिषदीय परीक्षा में कक्ष निरीक्षक की जिम्मेदारी निभाई। बोर्ड परीक्षा का मूल्यांकन कार्य भी किया। लेकिन कोरोना से हम भी भयभीत रहे। सतर्क रहे। सावधानी भी बरती।

मार्च 2019 से मैं अपने विद्यालय के सेवित क्षेत्र में थोड़े-थोड़े अन्तराल पर कोरोना की डॅयूटी करता रहा। कालान्तर में सितम्बर माह से तो नगरपालिका क्षेत्र के अन्तर्गत वॉर्ड 8 में सिटी रिस्पान्स टीम में कोरोना की ड्यूटी में जुट गया था। 2 नवम्बर 2020 से विद्यालय खुल जाने की दशा में ही कोरोना की ड्यूटी से कार्यमुक्त हुआ। मीर हसन की बात से सहमति है कि सुख के साथ दुःख भी आते हैं। कष्ट के दिन कुछ ज़्यादा लंबे लगते हैं। वे लिखते हैं-

सदा ऐश दौराँ दिखाता नहीं गया वक्त फिर हाथ आता नहीं

यह सब विस्तार से बताना ज़रूरी इसलिए भी है कि पूरी सावधानी बरतने के बावजूद घर में यह कोरोना वायरस दाखिल हो ही गया।

फिर हम 6 दिसम्बर 2020 को पौड़ी वापिस आ गए। हमारे साथ देहरादून से माँजी भी लौटी। साल भर से अधिक हो गया था, वे देहरादून ही थीं।तो, बात 17 दिसम्बर 2020 की हो रही थी। पौड़ी के राजकीय चिकित्सालय में गए। डॉक्टर रौतेला जी को दिखाया। उन्होंने कुछ टैस्ट कराए। अनीता की प्लैटलेट्स कम हो गई थीं। दवाएं दीं और कोविड 19 जांच भी लिख दी। 21 दिसम्बर को रिपोर्ट आई। पॉजीटिव। मैं विद्यालय में था। शिक्षक साथी बिजल्वाण जी की स्कूटी ली और लौट आया। मैं स्टॉफ गाड़ी में जाता रहा हूँ। सावधानी के चलते विद्यालय को भी बंद करना पड़ा।

बहरहाल! अनीता की अलग कमरे में व्यवस्था करना ठीक समझा गया। अलग टॉयलेट-वॉशरूम। ठीक ही हुआ। यहाँ वसीम बरेलवी का एक शेर समीचीन साझा कर रहा हूँ-

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसेतेरी मर्जी के मुताबिक नज़र आएँ कैसे

अब हमारी बारी थी। 21 दिसम्बर को ही तुरंत मेरी, माँजी, अनुभव और मृगाँक की कोरोना सैम्पलिंग हुई। पाँच दिन बीत गए। लेकिन छठे दिन फोन आया और मुझे बताया कि हम सभी (पूरा परिवार, 5 सदस्य) कोरोना पॉजीटिव है। एक पल के लिए तो मैं परेशान हो गया।

अनीता को 2 जनवरी 2021 तक होम आइसोलेशन में रहना तय किया गया। और हम चारों का 6 जनवरी 2021 तक होम आइसोलेशन में रहना तय किया गया। 28 दिसम्बर 2020 तक यदि हम 17 दिसम्बर को ही अनीता का कोविड संक्रमण का दिन मान लें तो 12 दिन हुए जाते हैं। और यदि हम चारों 21 से जिस दिन हमारी सैम्पलिंग हुई है को संक्रमण का दिन मान लें तो भी हमें 8 दिन हो चुके हैं। और आज जब 7 जनवरी 2010 है तो हम सभी को आज 22 वां दिन हुआ जाता है।

स्थिति सामान्य है। बुखार नहीं है। गले में खराश और यदा-कदा खिच-खिच मात्र है। सभी का ऑक्सीजन स्तर 95 से ऊपर ही है। नमक के गरारे कर रहे हैं। गरम पानी पी रहे हैं। भाप भी ले रहे हैं और ससमय दी गई दवाई ले रहे हैं।हम परिवार के पाँचों सदस्य एक छत के नीचे होते हुए भी एक छत के नीचे न थे। अक्सर अहमद फराज़ याद आए। जिन्होंने यह क्यों कहा? आज समझ में आ रहा है-

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम

तू मुझे से ख़फा है तो ज़माने के लिए आक्या समय रहा?

कोई नाराज़गी भी नहीं थी और सब एक-दूसरे से ऐसे दूरी बनाए हुए थे कि ख़फा हो गए हों। खैर…पीछे मुड़कर देखता हूँ तो याद आता है कि गोल्डन कॉर्ड बनाने के लिए लाईन में मुझे एक दिन नहीं दो दिन लगना पड़ा था। फिर अनुभव और मृगाँक को भी मैंने एक अलग दिन लाईन में लगाया था। मृगाँक की अंगुलियाँ कम्प्यूटर नहीं पकड़ रहा था तो ऑपरेटर ने कहा कि बच्चे का आधार अपडेट कराना होगा। उसके लिए मुझे दो दिन और एक बैंक में जाना पड़ा। इस बीच मुझे भीतर ही भीतर बुखार रहा और भोजन का स्वाद भी बिगड़ गया था।

संभवतः मुझसे ही अनीता संक्रमित हुई होगी। फिर बच्चों ने तो होना ही था। माँजी के साथ हम हैं ही हैं तो वे भी संक्रमित हो गईं। बहरहाल ..इन 22 दिनों में बहुत सारे साथियों ने बेहद आत्मीयता से आत्मबल बढ़ाया। अल्लामा इकबाल ने यूँ थोड़े कहा है-

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अभी इश्क के इम्तिहाँ और भी हैं

हमारे देहरादून, दिल्ली और अन्य जगहों में रह रहे पारिवारिक सदस्यों ने नियमित दूरभाष पर हमारी सुध ली। मैं अपने विद्यालय रा॰इ॰कॉ॰केवर्स के विद्यालयी परिवार के सहयोग को कभी नहीं भूल सकूंगा।

साथ ही अनीता के विद्यालय रा॰इ॰कॉ॰ कालेश्वर के शिक्षकों का भी सहयोग अविस्मरणीय है। देवानन्द भट्ट जी रोज़ शाम को दूध लाते रहे। शिक्षक साथी रघुराज चौहान जी ने पारिवारिक जिम्मेदारी निभाई। वे राशन-तरकारी और दवाई आदि लाते रहे। रविन्द्र नेगी, विनय मोहन डबराल, रमाकान्त बिजल्वाण, सीता राम रावत, राजेन्द्र सिंह राणा, बन्टी रौथाण, बिमल नेगी, राजू भाई, आकाश सारस्वत, जीवानन्द, सरोज, सतीश, मुकेश वशिष्ठ, देवेन्द्र कण्डारी,किशोर रौतेला, बबीता नेगी,शोभा, सुनीता मलेठा, मोहन चौहान, सतीश जोशी, प्रदीप बहुगुणा ‘दर्पण’, रघुबीर रावत, अजय, दुर्गेश जुगरान, राकेश पटवाल, जगमोहन चोपता, जगमोहन कठैत, गणेश बलूनी, विजय आनन्द नौटियाल, कनक लता, सकलानन्द नौटियाल, गजेन्द्र रौतेला, विजय भट्ट, हंसराम चमोली, लक्ष्मी रतूड़ी, निखिलेश, संजय रुडोला, गणेश काला, प्रीति रावत, उनियाल मैडम, धरम सिंह, आशीष नेगी, अनीता ध्यानी, सरिता पंवार,मनोज ध्यानी, उत्तम कुमार सिंह सहित कालेश्वर कॉलेज का विद्यालयी स्टॉफ सुध लेते रहे।

यह तब है जब हमने इस पूरे प्रकरण को सीमित रखा। अलबत्ता आस-पड़ोस में खुलकर बताया। ताकि सभी स्वयं शारीरिक दूरी बना लें। हम लगभग 18 दिन घर में रहे। घाम तापने ही बाहर आए। घर के आँगन तक दूध देने आ रही बालिका ही ने प्रवेश पाया। उसे भी ताकीद कर दी गई कि दूध पहले से रखे बरतन को बिना छुए अपने बरतन से उलट दे। मैं सिटी रिस्पांस टीम (सी॰आर॰टी॰) मैडिकल टीम का भी आभार प्रकट करता हूँ। लैब से सीधे फोन आते ही मैंने सीआरटी को अवगत कराया। आधे घण्टे में ही अनीता की दवाई किट घर पर उपलब्ध हो गई। वॉर्ड के समन्वयक और सीआरटी सदस्य गणेश काला भी तत्काल कागजी कार्रवाई के लिए पहुंच गए। आधे घण्टे में ही सैम्पलिंग टीम हमारे सैंपल ले गई।

हम चारों की रिपोर्ट पॉजीटिव आने की खबर लैब से सीधे मुझे मिली तो मैंने टीम को अवगत कराया। आधे घण्टे में ही हम चारों के लिए दवाई किट और काग़जी कार्रवाई के लिए संबंधित साथी दरवाजे पर थे। अस्पताल से, स्वास्थ्य विभाग से, आपदा प्रबन्धन से, पुलिस कंट्रोल रूम से और देहरादून स्थित कोरोना सेन्टर से बराबर फोन आते रहे। वे वस्तुस्थिति से अवगत होते रहे और हमारा हौसला बढ़ाते रहे। कुल मिलाकर मैं और हम सभी पाँच सदस्य इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि यदि नकारात्मकता हावी न हो और आप कितने भी अकेले हों तो भी बड़ी से बड़ी समस्या से निजात पा सकते हैं। अनीता को पूरे 14 दिन परिवार से बिल्कुल अलग रखने में जो मानसिक, पारिवारिक उलझने हुईं वे इस रोग से बहुत छोटी थीं। दवाईयों के अलावा तीन-चार बार सादा पानी में भाप लेना चलता रहा।

गिलोय का उबला हुआ पानी भी पिया। रात को शुद्ध हल्दीयुक्त दूध भी पीना पड़ा। टमाटर सूप भी चलता रहा। एक दिन में तीन बार साबुत काली मिर्च और अदरक को पीसकर बनाई गई चाय पी। पपीता, अनार और सेब को दो-तीन घण्टे धूप में रखकर नियमित खाया। परिणाम यह हुआ कि सभी बुखार की न्यूनतम परिधि में रहे। ऑक्सीजन का स्तर औसत से अच्छा रहा। खांसी ने पल दो पल ही परेशान किया। रिपोर्ट पॉजीटिव की ख़बर ने ज़रूर खाने के स्वाद को पूर्णतः फीका कर दिया था। लेकिन उससे भी हम दो-तीन दिनों में उबर गए। आज इस कोरोना प्रकरण के घर में प्रवेश को 21 दिन पूरे हुए जाते हैं।

हम उम्मीद करते हैं कि हम पाँच के शरीर में यह अब मृत हो गया होगा। शेष जीवन तो भविष्य के गर्त में है। समय बड़ा बलवान है। उसके आगे हम नतमस्तक हैं। अलबत्ता हम पूरी सतर्कता और जागरुकता के साथ नियमित जीवन जीते हैं। लेकिन कहीं न कहीं लापरवाही तो हुई है। यह भी कि यह शरीर है। धीरे-धीरे यह खोखला होता जाता है। 65 वर्षीय माँजी ने जिस सकारात्मकता के साथ खुद को और हमें भी सँभाला, वह प्रणम्य है। हाँ ! पिताजी होते तो वह ज़रूर हम सबका हौसला होते। वे ज़रूर इस नमुराद कोरोना को कुछ न समझते। पर उनके अनुभव हमारे खूब काम आए।यूँ तो हम याद रख ही रहे थे कि सभी को एक-दूसरे से दूर रहना है। अनुभव को दादी से अलग कर दिया। अनीता ऊपर वाली मंजिल में रह रही थीं। बच्चे भी यदा-कदा एक-दम सामने आ-जा रहे थे। तब फिराक गोरखपुरी जी को कहाँ पता रहा होगा कि उनका शेर 2020-21 में इस कदर याद आता रहेगा-

तुम मुखातिब भी हो करीब भी होतुम को देखें कि तुम से बात करें

और अंत में-अनुभव (दस बरस) और मृगाँक (आठ बरस) को भी हमने जैसे ही फोन से सूचना मिली, बता दिया गया। इन दोनों ने भी भरपूर सहयोग किया। वे दोनों अपनी माँजी से 14 दिन दूर रहे। एक बार भी नजदीक नहीं गए। कोरोना प्रभाव वे भी देख-सुन-पढ़ रहे थे। बाद में उनके पॉजीटिव आने की ख़बर भी आई तो यह भी उन्हें तत्काल बता दिया गया। पहले माँजी से अलग रहना और अब दादी से और अपना पिता से दूरी बनाए रखना आसान काम तो न था। अपनी उम्र के स्वभावानुसार उन्होंने अपेक्षा से अधिक सहयोग किया।

दो कमरों में रहते हुए हमसे जितना हुआ, हमने हिदायतें बरतीं। अनीता के 14 दिन पूरे होते ही सब कुछ सहज होने लगा। तो हमारा अनुभव यह भी बताता है कि हमें बच्चों को बच्चा नहीं समझना चाहिए। उन्हें अपनी बातों का, अहसासों का, तकलीफों का साझीदार बनाना चाहिए। यूँ तो क्या जि़ंदगी तो कट ही जाती है। मुंशी अमीरुल्लाह तस्लीम के शब्दों से हौसला मिलता है। वे कहीं कहते हैं कि-सुबह होती है शाम होती हैउम्र यूँ ही तमाम होती हैआप सभी का धन्यवाद कि आपने हमारे इन इक्कीस दिनों का संक्षिप्त ब्यौरा पूरा पढ़ा। आभार।

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और अंत में –

नए साल की शुभकामनाएँ!

खेतों की मेड़ों पर धूल भरे पाँव को

कुहरे में लिपटे उस छोटे से गाँव को

नए साल की शुभकामनाएं!

जाँते के गीतों को बैलों की चाल को

करघे को कोल्हू को मछुओं के जाल को

नए साल की शुभकामनाएँ!

इस पकती रोटी को बच्चों के शोर को

चौंके की गुनगुन को चूल्हे की भोर को

नए साल की शुभकामनाएँ!

वीराने जंगल को तारों को रात को

ठंडी दो बंदूकों में घर की बात को

नए साल की शुभकामनाएँ!

इस चलती आँधी में हर बिखरे बाल को

सिगरेट की लाशों पर फूलों से ख़याल को

नए साल की शुभकामनाएँ!

-सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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