स्वैच्छिक शीतकालीन कैम्प में जुटे सैकड़ों शिक्षक

तीन दिन सामूहिक चर्चा, अनुभवों का साझाकरण और शैक्षणिक सन्दर्भों के व्याख्यान में पचास अध्यापकों का शामिल होना अपने आप में आगे बढ़ने का समय रहा। उत्तराखण्ड के लगभग सभी जिलों से तेईस अध्यापक और सत्ताइस अध्यापकों ने एक साथ मिल-बैठकर सार्थक चर्चाओं में हिस्सेदारी की। अपने अनुभव साझा किए। भाषाई कौशलों के विकास में उनके विद्यालयी अनुभवों को सुना-समझा और जाना गया। तीनों दिन सुबह लगभग नौ बजे के आसपास सुबह की चर्चा आरम्भ होती और अनवरत् डेढ़ बजे तक चलती। यानी रोज साढ़े चार घण्टे सुनना-सुनाना, देखना-बोलना, समझना-साझा करना चलता रहा। एक चाय का सूक्ष्म मध्यांतर होता। उस मध्यांतर में भी शिक्षक संचालित विषय बिन्दुओं पर बातचीत करते नज़र आते।


लगभग तेरह घण्टे बाल साहित्य की खुशबू और रचना का संसार को भाषा की कक्षा के साथ जोड़कर देखा और समझा गया। हिन्दी विषय में स्वेच्छा से सहभागिता की सहमति देने वाले शिक्षकों के लिए कार्यशाला स्थल हरिद्वार की जगाधरी धर्मशाला रहा। अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के साथियों ने समूचा सभागार भाषाई गतिविधियों से सुसज्जित किया हुआ था। जनपदों के टीचिंग लर्निंग सेन्टरों की खुशबूएँ इन तैयार पोस्टरों, चार्ट पेपरों, दीवार अख़बारों से आ रही थी। आरम्भिक सत्र अवनीश एवं विवेक ने संचालित किया। राज्य स्तर पर आयोजित यह तीसरा कैंप है। शिक्षक साथियों को बताया गया कि इस कैम्प में बाल साहित्य के मौजूदा सन्दर्भ और प्रयोगों के साथ भाषा सीखने के नज़रिए से बाल साहित्य की ज़रूरत पर भी चर्चा की जाएगी। बाल साहित्य के उपयोग की योजना पर भी काम किया जाएगा। बाल साहित्य से कक्षा-कक्ष में पठन-पाठन और सीखने के स्तर पर कैसे काम का विस्तार हो। अभिव्यक्ति के मसअले, पढ़ना सीखना और लिखना सीखना कैसे एक-दूसरे के पूरक हैं। लेखन अभ्यास और उनकी प्रक्रियाओं पर भी काम करने की ज़रूरत पर बल दिया गया।


एक शानदार गतिविधि का आयोजन किया गया। उपस्थित शिक्षकों से अनुरोध किया गया कि वह उस एक पुस्तक का नाम बताएं जो उन्हें बहुत पसंद आई। क्यों पसंद आई? वह पुस्तक कब पढ़ी थी? क्यों उसे दोबारा पढ़ना चाहेंगे? शिक्षक साथियों ने अपना परिचय भी दिया और इस गतिविधि में अपनी पसंदीदा पुस्तक के बारे में भी बताया। कार्यशाला स्थल पर श्वेतपट्ट पर वह नाम अंकित किए गए। शिक्षकों ने पुस्तकों के नाम भी बताए तो पत्रिकाओं के भी और कुछ शिक्षक कहानी मात्र पर भी केन्द्रित हो गए। मसलन गोदान, परदा,जीत आपकी,बाल प्रहरी, रामचरितमानस, पंचतंत्र, तोत्तोचान, ईदगाह, नैतिक शिक्षा, प्रेरक प्रसंग, सब मजेदारी है-कथा नीलगढ़ की, 12 वीं फेल, जूठन, पहला अध्यापक, अखण्ड ज्योति, दिपाली, बरखा सीरीज, मुंशी प्रेमचन्द की कहानियाँ, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, दो बैलों की कथा, सुबह-सवेरे, झाँसी की रानी, कविता,चंदामामा, नंदन, कप्तान का बचपन, नीलकंठ, बाल पोथी, कृष्ण सुदामा चरित, पक्की दोस्ती, गुलिवर की कथाएं, शाल का आखिर क्या हुआ?, बचपन की कहानी, नमक का दरोगा, सात बौने, चंपक, रिमझिम, रामायण, बाल्मीकि रामायण, कॉमिक्स चाचा चौधरी, मेरा हिन्दुस्तान, पंच परमेश्वर, उत्तराखण्ड की संस्कृति, दुर्गा सप्तशती, स्वतंत्रता आंदोलन में बागेश्वर का योगदान, जासूसी उपन्यास, शेक्सपीयर की कहानी, गिजुभाई बधेका की पुस्तकें, महकता आँचल, मेरी माँ, तुम्हारी औकात क्या है?, पहला गिरमिटिया, लप्पूझन्ना, मंत्र, छिपकली आदि को सूचीबद्ध किया गया।


इस अवसर पर सफ़दर हाश्मी कृति कविता किताबें करती हैं बातें बीते ज़माने की, दुनिया की इन्सानों की कविता का वाचन भी हुआ। कुल मिलाकर किताबों पर बाचतीत करने का वातावरण तैयार हुआ। यह भी पता चला कि पढ़े-लिखे शिक्षक और पढ़ते-लिखते शिक्षकों में क्या अनुपात है। नवीनतम पुस्तकें पढ़ने में शिक्षक कहाँ हैं? साथी पवन ने एक गीत के साथ गतिविधि भी संचालित की। अनुमान और कल्पना के साथ गपबाज़ी का शानदार समन्वय इस गीत में दिखाई देता है। अंत में बिना आँखवाले का उपहास न उड़ाया जाए जैसी ध्वनि न जाए तो यह एक शानदार गीत है जिसे खेलते-अभिनय करते बच्चे बहुत पसंद करते हैं।

गीत निम्न है-


हमने तीर बनाये तीन
दो तो बने ही नहीं
एक में नोंक नहीं
जिसमें नोंक नहीं,
उसने शेर मारे तीन
दो तो मरें ही नहीं,
एक भाग गया।
जो भाग गया ,
उसने नदियाँ लांघी तीन
दो तो सुखी ही पड़ी,
एक में पानी नहीं
जिसमें पानी नहीं
उसमें नाव चले तीन
दो तो टूटी ही पड़ी ,
एक में पैंदा नहीं
जिसमें पैंदा नहीं ,
उसमें लोग बैठे तीन
दो को दिखता ही नहीं,
एक के आँख नहीं
जिसके आँख नही ,
उसने तीर बनाये तीन


पहले दिन ही विवेक ने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा फाउंडेशनल स्टेज 2022 के खण्ड 2.3 का उल्लेख करते हुए कहा कि पाठ्यचर्या के उद्देश्य व्यापक हैं। हमें इस दिशा में गंभीरता से सोचकर शिक्षण योजना बनानी होगी। स्कूल और बाल साहित्य का प्रयोग पर भी सार्थक चर्चा हुई। इस सत्र में ध्येय यह रखा गया कि शिक्षक साथी अपने-अपने विद्यालयों में पुस्तकालय और पुस्तकों के रख-रखाव, उपयोग पर चर्चा करेंगें। स्कूल के विद्यार्थी पुस्तकालय की किताबें कैसे पढ़ते हैं। बतौर शिक्षक उनकी क्या भूमिका रहती है। क्या पुस्तकालय बच्चों के सीखने में कुछ मदद करता है? यह सत्र विचारों का आदान-प्रदान रहा। कई शिक्षक साथी प्रत्यक्ष रूप से पुस्तकालय से जुड़े हुए हैं। शिक्षक साथियों ने मिले-जुले, सकारात्मक और विपरीत परिस्थितियों से युक्त अनुभव साझा किए। पुस्तकालय में पुस्तकों का पंजीकरण में विद्यार्थियों का सहयोग लिया जाता है। यह बात रेखांकित हुई।

अधिकतर विद्यालयों में वरिष्ठ विद्यार्थी पुस्तकों के लेन-देन और पुस्तकालय पंजिका के रख-रखाव की जिम्मेदारी लेते हैं। अच्छे से निभाते भी हैं। किताबों का रख-रखाव हेतु कक्षा-कक्ष एक समस्या है। कक्षा में किताबों का कोना से अधिकतर काम चलाया जाता है। कई विद्यालयों में पढ़ने की घण्टी अलग से निर्धारित है। किताबें पढ़ने के बाद प्रश्नोत्तर गतिविधि संचालित होती है। पुस्तकालय का प्रयोग करने का समय, पढ़ने के लिए उचित बैठक व्यवस्था करना चुनौतीपूर्ण है। कक्षावार निर्धारित विषयानुकूल या विषय के प्रकरणों के विस्तार वाली किताबों का चयन-वितरण करना, साहित्य के प्रति विद्यार्थियों में रुचि उत्पन्न करना, पढ़ने की आदत बनाना में पुस्तकालय का उपयोग करना, पुस्तकों की सूची और विवरण तैयार करना, पढ़ने की तय घण्टी की व्यवस्था न होना, प्रातःकालीन सभा में किसी पुस्तक का पढ़ा जाना, विद्यार्थियों में धीरे-धीरे पढ़ी गई पुस्तक के बारे में लिखने के लिए प्रेरित करना, पढ़ने का कोना लगातार सक्रिय रखना, सभी तरह की पुस्तकों का वितरण होना, विद्यार्थियों को पुस्तकालय का संचालन देना, पुस्कालय को सजाना, इच्छानुसार पुस्तकों को ले जाने की स्वतंत्रता देना, दीवार पत्रिका का निर्माण करना, कक्षा में कहानी सुनाना और मौखिक प्रश्नोत्तर को बढ़ावा देना आदि पर शिक्षकों ने अपने अनुभव साझा किए।
पहले ही दिन राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2023 के आलोक में मौजूदा चुनौतियों पर भी चर्चा की गई। इन्हें छह बड़े भागों में बांटा गया-

  • साक्षरता का निम्न स्तर: भारत वर्तमान में सीखने के संकट में है, जहां प्राथमिक विद्यालय में वर्तमान में छात्रों के एक बड़े हिस्से ने साक्षरता में मूलभूत कौशल, यानी बुनियादी पाठ को पढ़ने, समझने और लिखने की क्षमता हासिल नहीं की है।
  • निम्न-गुणवत्ता वाली शिक्षण सामग्री: विभिन्न चरणों में भाषा शिक्षण के लिए उपयोग की जाने वाली शिक्षण सामग्री वर्तमान में असमान गुणवत्ता वाली है, जिनमें से बहुत सी निम्न गुणवत्ता वाली हैं। अच्छी गुणवत्ता वाली सामग्री के लिए प्रासंगिक सामग्री (शब्द, संदर्भ, चित्र, लेआउट) के सावधानीपूर्वक चयन की आवश्यकता होती है जो छात्रों के लिए सीखने के लिए उपयुक्त और दिलचस्प हो। भाषा सीखने के लिए केवल पाठ्यपुस्तकों की सामग्री पर निर्भर रहना बहुत सीमित है। भारतीय भाषाओं में आयु-उपयुक्त बाल साहित्य की उपलब्धता की कमी ने पूरे देश में भाषा कक्षाओं में एक गंभीर बाधा उत्पन्न कर दी है।
  • शिक्षक की तैयारी का अपर्याप्त स्तर: अक्सर, यह धारणा बना ली जाती है कि विषय में पर्याप्त प्रशिक्षण के बिना और या तैयारी के लिए पर्याप्त समय के बिना कोई भी छात्रों को भाषा सिखा सकता है। इससे भाषा सीखने में उपलब्धि कम हो जाती है और कक्षाएं अप्रभावी हो जाती हैं। विभिन्न उपाय किए जाने के बावजूद, भारत में कुशल भाषा शिक्षकों की भारी कमी है। भाषा सीखने में सार्थक और आनंददायक छात्र अनुभव के लिए विषय में उचित तैयारी, स्वभाव और अभ्यास वाले शिक्षक आवश्यक हैं।
  • अप्रभावी शैक्षणिक रणनीतियाँ: अक्सर उपयोग की जाने वाली कई शिक्षण पद्धतियाँ इस बात की अच्छी समझ पर आधारित नहीं हैं कि भाषा कैसे काम करती है और विभिन्न आयु समूहों में छात्र भाषा कैसे सीखते हैं। शिक्षकों को उन रणनीतियों का जायजा लेने की जरूरत है जो वे अब तक अपनी मनोरंजकता, प्रभावशीलता और छात्रों को सार्थक रूप से संलग्न करने की क्षमता के लिए उपयोग कर रहे हैं।
  • योग्यता-आधारित शिक्षण के बजाय सामग्री-पूर्णता पर ध्यान दें: भाषा शिक्षा में, सामग्री में महारत हासिल करने की तुलना में दक्षता हासिल करना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। व्यवहार में, शिक्षकों या मूल्यांकन डेवलपर्स द्वारा अक्सर इस पर विचार नहीं किया जाता है। प्रभावी भाषा शिक्षण को केवल पाठ्यपुस्तक में दी गई सामग्री को समाप्त करने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, छात्रों द्वारा दक्षताओं और सीखने के परिणामों की उपलब्धि से प्रेरित होना चाहिए।
  • स्मृति-आधारित मूल्यांकन: भाषा शिक्षा का उद्देश्य भाषा दक्षता, संचार और कार्यात्मक क्षमता और साहित्य की सराहना हासिल करना है। अधिकांश मूल्यांकन भाषा क्षमताओं का आकलन करने के बजाय पाठ्यपुस्तक में दी गई सामग्री की याददाश्त का आकलन करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। हालाँकि सामग्री के विवरण को याद करना सीखने को प्रदर्शित करने का एक तरीका हो सकता है, लेकिन यह भाषा सिखाने और सीखने का मुख्य उद्देश्य नहीं है।

इसी सत्र में साथियों ने नई शिक्षा नीति के तहत पाठ्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों पर भी विस्तार से चर्चा की। प्रीपेटरी स्टेज के उद्देश्यों को कक्षावार समूह के स्तर पर देखने-समझने और जानने पर बल दिया गया। जैसे-
CG-1 विचारों को सुसंगत रूप से समझने और संप्रेषित करने के लिए जटिल वाक्य संरचनाओं का उपयोग करके मौखिक भाषा कौशल विकसित करता है।
CG-2 परिचित और अपरिचित पाठों (जैसे गद्य और कविता) के विभिन्न रूपों की बुनियादी समझ प्राप्त करके समझ के साथ पढ़ने की क्षमता विकसित करता है।
CG-3 अपनी समझ और अनुभवों को व्यक्त करने के लिए सरल और मिश्रित वाक्य संरचनाएं लिखने की क्षमता विकसित करता है।
CG-4 विभिन्न स्रोतों के माध्यम से विभिन्न संदर्भों (घर और स्कूल के अनुभव) में शब्दों की अधिक व्यापक श्रेणी प्राप्त करता है।
CG-5 पढ़ने में रुचि और प्राथमिकताएं विकसित करता है।

 इसी तरह मिडिल स्टेज पर पाठ्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों को भी समूह में प्रदर्शित किया गया। वह यह हैं-
CG -1 विवरण, विश्लेषण और प्रतिक्रिया के लिए भाषा कौशल का उपयोग करके प्रभावी संचार की क्षमता विकसित करता है।
CG -2 साहित्यिक उपकरणों के विभिन्न रूपों की खोज करके भाषा और भाषा से संबंधित साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत की सराहना करता है।
CG -3 बुनियादी भाषाई पहलुओं (शब्द और वाक्य संरचना) को पहचानने और उन्हें मौखिक और लिखित अभिव्यक्ति में उपयोग करने की क्षमता विकसित करता है।
CG -4 समीक्षा लिखने की क्षमता विकसित करता है और संदर्भ खोजने के लिए लाइब्रेरी का उपयोग करता है।
CG -5 किसी विशेष भाषा की विशिष्ट विशेषताओं की सराहना विकसित करता है, जिसमें उसकी वर्णमाला और लिपि, ध्वनियाँ, छंद, वाक्य और भाषा के लिए अद्वितीय अन्य शब्द-प्ले और खेल शामिल हैं।

समूह में एक गतिविधि भी शामिल की गई। सभागार में बाल साहित्य की किताबें रखी गईं थीं। स्वेच्छा से किसी एक किताब को पढ़ना था और उसे निम्नांकित बिन्दुओं के आलोक में समझना था। बिन्दु निम्न रहे-

  • पढ़ते हुए ऐसे प्रसंग दर्ज करना जहाँ आनन्द, कौतूहल, जिज्ञासा, रोचकता आदि की अनुभूति हुई?
  • ऐसे बिंदु नोट करना, जिन पर बच्चों से चर्चा करना चाहिए?
  • इस बाल साहित्य को पढ़ने और चर्चा करने से बच्चों को क्या-क्या हासिल होगा।

सहभागी शिक्षकों ने मनपंसद किताबें टटोली और पढ़ीं। हाँ यह ओर बात रही कि अमूमन अधिकांश शिक्षकों ने कम पेज वाली किताब पढ़ना ठीक समझा। पहले दिन जो पढ़ने-लिखने का वातावरण सृजित किया गया उसके पीछे अप्रत्यक्ष तौर पर ध्येय यही था कि कैम्प में सभी शिक्षक बाल साहित्य की खुशबू स्वयं अपने अनुभव से करते हुए सूँघ लें। विवेक और अविनाश की युगलबंदी में अन्य साथियों ने भी भरपूर सहयोग किया। एन.सी.एफ. 2005 के आलोक में बनी रिमझिम और वसंत हिन्दी की किताबों का भी ज़िक्र आया। बाक़ायदा किताबों के आमुखों के सन्दर्भ दिए गए। यह बताने और साझा करने का सफल प्रयास किया गया कि बाल साहित्य की आवश्यकता और महत्ता संचालित पाठ्य पुस्तक भी करती है और शिक्षा के दस्तावेज भी प्रबल समर्थन के साथ इनकी उपयोगिता को पुरजोर ढंग से रखते हैं। एन.सी.ई.आर.टी. कृत कक्षा छह की हिंदी पुस्तक वसंत साल 2006 से संचालित है। यह पुस्तक शिक्षक से अनुरोध करती है। वह कहती है-


‘नयी कविता बच्चों लिए अनुपयुक्त मानी जाती रही है। शिक्षकों में भी उसे भावार्थ, सीख आदि के पारंपरिक शैक्षणिक पैमानों पर कुछ अटपटा मानने की प्रवृत्ति रही है। इससे साहित्य की समग्रता के प्रति बच्चों की रुचि को बढ़ाने में हम सफल नहीं हो सकते। नयी कविता के पाठ और प्रश्न-अभ्यासों के माध्यम से बच्चों के ज्ञान और ग्रहण कौशल का विकास किया जा सकता है। अंततः कोई भी भाषा-पुस्तक तभी सफल मानी जाएगी जब वह बच्चों को साहित्य की धरोहर और आज लिखे जा रहे साहित्य के प्रति उत्सुक बनाए।’

इसी पुस्तक का आमुख कहता है कि-


‘इस प्रयत्न की सफलता अब इस बात पर निर्भर है कि स्कूलों के प्राचार्य और अध्यापक बच्चों को कल्पनाशील गतिविधियों और सवालों की मदद से सीखने और सीखने के दौरान अपने अनुभव पर विचार करने का कितना अवसर देते हैं। हमें यह मानना होगा कि यदि जगह, समय और आज़ादी दी जाए तो बच्चे बड़ों द्वारा सौंपी गई सूचना-सामग्री से जुड़कर और जूझकर नए ज्ञान का सृजन करते हैं। शिक्षा के विविध साधनों एवं स्रोतों की अनदेखी किए जाने का प्रमुख कारण पाठ्यपुस्तक को परीक्षा का एकमात्र आधार बनाने की प्रवृत्ति है। सर्जना और पहल को विकसित करने के लिए ज़रूरी है कि हम बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में पूरा भागीदार मानें और बनाएँ, उन्हें ज्ञान की निर्धारित खुराक का ग्राहक मानना छोड़ दें।’

शिक्षक साथियों से एन.सी.ई.आर.टी. कृत रिमझिम पाठ्य पुस्तक में दर्ज़ ‘बड़ों से दो बातें’ के तहत लिखा गया है कि-


‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा यह सलाह देती है कि कक्षा की गतिविधियों को बच्चों के रोज़मर्रा के अनुभवों से जोड़ा जाए ताकि अध्यापन और परीक्षा पाठ्यपुस्तक केंद्रित बनकर न रह जाए। भाषा सीखने-सिखाने की प्रक्रिया कक्षा के बाहर की दुनिया (जिसमें पास-पड़ोस, बाज़ार, बगीचा, संगी-साथी आदि सभी शामिल हैं) से भी उतनी ही प्रभावित होती है जितनी कक्षा के भीतर आयोजित होने वाली गतिविधियों से। भाषा की कक्षा में बच्चों के साथ मिलकर जो-जो गतिविधियाँ की जा सकती हैं उनका क्षेत्र बहुत व्यापक है। रिमझिम केवल सुझाव के तौर पर उसके कुछ नमूने और संकेत प्रस्तुत करती है। इन गतिविधियों में हिंदी में उपलब्ध बाल साहित्य लगातार शामिल किया जाना चाहिए। बच्चों की भाषा को विस्तार देने के लिए यह ज़रूरी है कि आप इस प्रकार की अन्य कहानियाँ और कविताएँ आदि पढ़ने के अनेक अवसर बच्चों को दें।’

हिंदी की इसी किताब में यह भी अनुरोध है कि-


बच्चांे के उत्तरों और उनमें निहित सोच एवं कल्पना को स्वीकार करना ज़रूरी है। शुरू से ही बच्चों की त्रुटियाँ निकालना, उनकी आलोचना करना और उन्हें दंडित करना शिक्षा के बुनियादी उद्देश्यों को खंडित और ध्वस्त कर देना है। प्रारंभिक स्तर में की गई त्रुटियाँ बच्चों की सीखने की प्रक्रिया का स्वाभाविक और अस्थायी चरण होती हैं। त्रुटियों से आपको यह जानने में मदद मिलेगी कि बच्चे कितना सीख पाए हैं। त्रुटियों को सुधारने से पहले उनका विश्लेषण करना जरूरी है जिससे यह तय हो सके कि उन पर कब और कैसे ध्यान दिया जाना उपयोगी होगा। बच्चों की भाषा की कई आँचलिक रंगतंे अक्सर त्रुटियाँ समझ ली जाती हैं। उन्हीं त्रुटियों पर ध्यान दें जो बातचीत तथा समझ में बाधा बन रही हों। साथ ही यह भी तय करना ज़रूरी है कि किस त्रुटि पर कब ध्यान दिया जाए जिससे बच्चों को स्वयं उस त्रुटि को अपनी समझ और कोशिश से दूर कर पाने का अवसर मिल सके। जहाँ तक परीक्षा की बात है, परीक्षा में त्रुटियों पर ध्यान देने के बदले बच्चे द्वारा कही गई बात को ध्यान में रखना अधिक उपयोगी रहेगा।’

इस अवसर पर सीखने के प्रतिफल पर भी चर्चा हुई। बाल साहित्य की किसी कहानी से किस तरह कक्षा में भाषाई कौशलों का विकास हो सकता है? हेमलता कृत कहानी महागिरी से एक गतिविधि का आयोजन भी हुआ। यह कहना उचित होगा कि पहले ही दिन भाषा के सभागार में लगभग साठ किताबें पढ़ी गईं। चूँकि सभागार में विविधता से भरा बाल साहित्य उपलब्ध कराया गया था जिसमें चित्रात्मक पुस्तकें रखी गईं। बरखा सीरीज का हिन्दी और क्षेत्रीय संस्करण भी रखा गया था। प्रथम बुक्स, नेशनल बुक ट्रस्ट, चिल्ड्रन बुक्स, इकतारा और एकलव्य की किताबें भी उपलब्ध थी। पहले दिन का भाषाई सत्र लगभग डेढ़ बजे समाप्त हुआ।


दूसरे दिन की सुबह 9 बजे सन्दर्भदाताओं विवेक, अविनाश सहित खजान भी जुड़ गए। विकास सहित कई साथी पहले दिन की तरह दूसरे दिन भी समय पूर्व सभागार में व्यवस्थाओं के साथ तैयार रहे। पहला दिन कैसा रहा? क्या अच्छा लगा? इन सवालों के जवाब सहभागी शिक्षकों ने लिखित में भी दिए और मौखिक तौर पर भी प्रस्तुति दी।
प्रातःकालीन सत्र में शिक्षकों ने स्वयं बाल साहित्य की किसी एक किताब की कहानी या कविता को आधार बनाकर शिक्षण योजना पर भी काम किया। समझकर पढ़ना विषय पर अवनीश जी ने बात रखी। कुछ बिन्दुओं पर चर्चा हुई। जैसे-सामान्यतः डिकोडिंग को ही पढ़ना माना जाता है। समझकर पढ़ना एक विस्तृत अवधारणा है। अर्थ निर्माण (विषयवस्तु को समझने का कौशल और स्वयं के विचारों-अनुभवों का जुड़ाव), पढ़ने का प्रवाह, शब्द भंडार, ध्वनि जागरूकता, लिपि ध्वनि संबंध, साहित्यिक समझ- सौन्दर्यबोध-संवेदना बोध, उचित प्रश्न करना, समालोचनात्मक समझ, निष्कर्ष निकाल पाना और समझे-सीखे हुए का जीवन में उपयोग करने जैसे पहलू शामिल होते हैं। समझकर पढ़ना सीखने की बुनियादी शर्त है। इसके लिए यह आवश्यक है कि पढ़ना सीखने के अधिक से अधिक अवसर हों और विविध प्रकार की पठन सामग्री भी उपलब्ध हो।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पढ़ना पढ़ते-पढ़ते ही आएगा और जितना इनपुट (सुनना, पढ़ना) समृद्ध होगा, जितने अधिक एक्सपोजर मिलेंगे। उतना ही आउटपुट (मौखिक और लिखित अभिव्यक्ति) बेहतर होगा। सभागार में गधों पर सवार पुस्तकालय कहानी का प्रदर्शन किया गया। कोलंबिया मुल्क की इस कहानी का उपयोग अब उत्तराखण्ड में भी होने लगा है। नैनीताल के शुभम बधानी द्वारा घोड़ा लाइब्रेरी की चर्चा भी खजान जी ने रखी। कोलंबिया की कहानी पर साथी अध्यापकों ने विस्तार से चर्चा की। लुइस का घर और घर में बढ़ती किताबों का विकल्प क्या हो सकता है? डायना का यह कहना कि इन किताबों का क्या करना है? क्या इन किताबों को भात के साथ खाना है? लुइस किताबों को लेकर घोड़े पर चल पड़ता है। किताबों की ताकत और उन बच्चों तक किताबें ले जाना जिनकी दुनिया में इस तरह की किताबें कभी थी ही नहीं।

एन.सी.ई.आर.टी. नई दिल्ली के भाषा विभाग और ‘फिरकी बच्चों की’ के सम्पादन से जुड़ी डॉ॰ ऊषा शर्मा कृत बाल साहित्य की जादुई दुनिया लेख शिक्षक साथियों के साथ साझा किया गया। शिक्षकों ने निजी तौर पर उसका मौन वाचन किया। लेख पर फिर विस्तार से चर्चा हुई। समूचा लेख शानदार है। विद्यालयी जटिलताएं और प्रक्रियाओं के साथ बालमन स्वभाव, उसकी दुनिया से होता हुआ यह लेख बाल साहित्य की महत्ता को असरदार तरीके से प्रस्तुत करता है। बच्चों को घर से स्कूल आने तक का जो सामाजिक चित्रण,चिंतन है उसे कारगर तरीके से शामिल किया गया है। लेख एक जगह कहता है-

हमारी शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बाल साहित्य के लिए न तो कोई स्थान नजर आता है और न ही ऐसा बाल साहित्य जो सम्मोहन का जादू जानता हो। ऐसे अनेक बच्चे हैं जो शिक्षा-व्यवस्था की ‘दुर्व्यवस्था’ के कारण इस जादू से अछूते हैं। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है-पाठ्य-पुस्तक संस्कृति! क्या कोई पाठ्य-पुस्तक बाल साहित्य जैसा जादू उत्पन्न करने में समर्थ है? क्या वह बाल साहित्य जैसा चमत्कार कर पाती है कि हाथ और नजरों से किताब छूटे ही ना! संभवतः नहीं! पाठ्य-पुस्तक की अपनी एक ‘विशिष्ट और विचित्र-सी’ संस्कृति जो कहीं न कहीं परीक्षा के भय को अपने भीतर समेटे हुए है या यूं कहिए कि वह स्वयं परीक्षा से भयाक्रांत है। पाठ्य-पुस्तक परीक्षा के दायरे में बँधी हुई है और एक तयशुदा दिशा में चलती है। पहले पहला पाठ ‘पढ़ाया’ जाएगा, फिर दूसरा, फिर तीसरा और फिर चौथा…। पाठ-दर-पाठ ‘पढ़ाने’ के एक निश्चित अंतराल पर परीक्षा होगी जो उन पाठों पर ही आधरित होगी। परीक्षा के आधार पर बच्चों की प्रगति का लेखा-जोखा रखा जाएगा। तो फिर ‘दूसरी’ किताब यानी बालसाहित्य की कोई किताब क्यों पढ़ी जाए? लिहाजा बालसाहित्य शाला या कक्षा के बाहर ही अपनी उपस्थिति दर्ज करता है। इसका मतलब यह है कि किन्हीं नीतियों के तहत अगर बाल साहित्य खरीद भी लिया जाए, तो वह किसी अलमारी या किसी संदूक में बंद हो जाता है। प्राथमिक स्तर पर और विशेष रूप से कक्षा एक और दो के बच्चों के लिए बाल साहित्य जैसी किसी ‘चीज’ को निषेध मान लिया जाता है, क्योंकि शिक्षकों एवं ‘शिक्षा अधिकारियों’ के मध्य यही अवधारणा व्याप्त है कि पहली-दूसरी के बच्चे पढ़ना तो जानते नहीं हैं, फिर इन्हें बाल साहित्य देने से क्या फायदा? ये भला कहाँ पढ़ पाएँगे? किताब और फाड़ देंगे। फिर पड़ जाएँगे लेने के देने ! यही कारण है कि बच्चों की शिक्षा केवल पाठ्य-पुस्तक तक ही सीमित होकर रह जाती है जिसका सरोकार केवल परीक्षा से है। हम यह भूल जाते हैं कि शिक्षा परीक्षा में ‘अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होना’ नहीं है।

खजान जी किस्सों-कहानियों का खजाना लुटाते हुए

साक्षरता कार्यक्रम की समन्वयक और राष्ट्रीय साक्षरता केंद्र प्रकोष्ठ की प्रभारी डॉ॰ ऊषा शर्मा इस लेख में आगे और भी पहलूओं पर प्रकाश डालती हैं। वह लिखती हैं-
बच्चों में आलोचनात्मक चिंतन, कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता का विकास करने के लिए विविध प्रकार की कहानियों की किताबों से उनका परिचय करवाया जाना बहुत महत्त्वपूर्ण है। कक्षा में ‘पढ़ने का कोना’ और / या विद्यालय में एक जीवंत पुस्तकालय की उपस्थिति बच्चों को विविध प्रकार की पठन सामग्री से परिचित करवाने और उन्हें सक्रिय ‘पाठक’ के रूप में तैयार करने में मदद मिलती है। इस दिशा में सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत शाला-पुस्तकालयों को जीवंत बनाने और पुस्तकालय में पुस्तकें/बाल साहित्य खरीदने के लिए राज्यों को अनुदान राशि भी प्रदान की गई।

हेमलता कृत महागिरी कहानी पर चर्चा

वह लिखती हैं-

इस संदर्भ में यह सवाल भी उठता है कि अच्छा बाल साहित्य क्या होता है, उसकी क्या विशेषताएँ होती हैं, अच्छा बाल साहित्य कहाँ से प्राप्त किया जा सकता है, क्या कोई ऐसी सूची है जो यह बता सके, सुझा सके कि किस प्रकार का बाल साहित्य बच्चों को पढ़ने, पढ़ना सीखने, पढ़कर समझने और भाषायी क्षमताओं का विकास करने में मदद करेगा। एनसीईआरटी द्वारा इन सभी सवालों को सम्बोधित करने का प्रयास किया गया।

यह लेखक कल, आज और कल में बाल साहित्य की जादुई दुनिया को ही रेखांकित नहीं करतीं। वह बाल साहित्य का चयन कैसे करें। बाल साहित्य को चुनने का मानदंड क्या हो? बाज़ार में क्या स्थिति है बाल साहित्य की? बच्चों को क्यों और कैसी किताबें देनी चाहिए? समग्रता के साथ इन सवालों को जवाब सहित लेख में शामिल किया गया है। प्रोफेसर ऊषा शर्मा हमें यह भी बताने की सफल कोशिश करती हैं कि बाल साहित्य की दुनिया आम दुनिया से किस तरह अलग है।

मतलब कुछ भी बाल साहित्य के नाम पर नहीं दिया जा सकता। उन्हीं के लेख का एक खास हिस्सा-

हिन्दी शिक्षकों का समूह
बाल साहित्य की समीक्षा से जुड़े अनुभवों ने बहुत कुछ सिखाया है और चिंतन कार्य को दिशा भी प्रदान की है। आइए एक-एक करके इन अनुभवों को साझा करते हैं और बाल साहित्य की रोचक भरी दुनिया को समझते हैं-
* एक ऐसा अनुभव जो समिति में शामिल लगभग हर व्यक्ति ने अनुभूत किया है कि विज्ञापन में सुझाए गए बिंदुओं को दरकिनार करते हुए बाल साहित्य के नाम पर बहुतायत में पाठ्य-पुस्तकें, अभ्यास पुस्तिकाएं, व्याकरण संबंधी किताबें, वर्णमाला सिखाने वाली बेहद नीरस किताबें प्राप्त हुईं। अनेक किताबें ऐसी भी थीं जो किसी पोथी से कम नहीं थीं यानी बहुत मोटी किताबें जिन्हें देखकर कोई भी बता सकता है कि ये प्राथमिक स्तर के बच्चों के स्तर के अनुरूप नहीं हैं। यह अनुभव इस ओर संकेत करता है कि बाल साहित्य की अवधरणात्मक समझ ख़तरे में है।
* ख़तरे का अंदाज़ इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्राथमिक स्तर के बच्चों के लिए बाल साहित्य के विषय विभिन्न प्रकार के जानवर, पक्षी, जंगल, चांद आदि ही हैं। इनमे भी बिल्ली, चूहा, शेर, बंदर, चिड़िया, तोता आदि ही हैं। ऐसा लगा कि बाल साहित्य की दुनिया से नए विषय समाप्त हो गए हैं। इतना ही नहीं इनके विशेषण और रिश्ते भी तयशुदा हैं, जैसे-चालाक बिल्ली, हाथी दादा, बंदर मामा, बिल्ली मौसी, चांद मामा, शेर जंगल का राजा, मिट्ठू तोता आदि। कहना न होगा कि सृजनात्मकता का अभाव साफ-साफ नज़र आने लगा है।
* कुछ प्रकाशकों से ऐसी भी किताबें प्राप्त हुईं जो क्रमिक पुस्तकमाला श्रेणी की थीं। इस तरह की किताबों को बाल साहित्य की सूची में रखने के बारे में गहन विचार-विमर्श हुआ। चयन समिति के विशेषज्ञों का मानना था कि ये किताबें एक खास उद्देश्य से लिखी जाती हैं जो संभवतः फुर्सत में पढ़ी जाने वाली सामग्री से भिन्न होता है। अतः ऐसी किसी भी क्रमिक पुस्तकमाला को बाल साहित्य की चयनित सूची में शामिल करने पर विचार नहीं किया गया। इतना ही नहीं और ये किताबें किन मानकों के आधार पर श्रेणीकृत की गई हैं उनमें भी अस्पष्टता थी।
* बच्चे कक्षा में; किसी संदर्भ में भाषा के विविध प्रयोगों को अपने साथ लाते हैं और इस प्रकार कक्षा में विचार-विमर्श को समृद्ध बनाते हैं। भाष सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में भाषा परिवेश का महत्व होता है। यदि बच्चों को समृद्ध भाषिक परिवेश उपलब्ध कराया जाए तो वे सहजता से भाषा को अर्जित करते चलते हैं। वे एक से अधिक भाषाओं का प्रयोग भी कर सकते हैं। भाषाएं एक-दूसरे के सान्निध्य में ही फलती-फूलती हैं। यही कारण है कि कक्षा में सहज संसाधन के रूप में बहुभाषिकता को उपयोग में लाया जा सकता है। लेकिन जिस तरह की द्विभाषिक किताबें हमें प्राप्त हुईं वे पाठों को हिंदी से अंग्रेज़ी सिखाने के विचारों पर आधारित लगीं। इस प्रकार के शब्दानुवाद का एक उपदेशात्मक स्वरूप होता है जो पठन के प्रवाह को बाधित करता है। इससे भाषा की मूल संरचना भी बाधित होती है। यही बात हमें द्विभाषिक पुस्तकों में भी दिखाई दी। अतः द्विभाषिक पुस्तकों को इस चयन में शामिल नहीं किया गया। इस संदर्भ में एक बिंदु और विचारणीय है- वह यह कि क्या हम बड़े कोई कहानी दो भाषाओं में एक साथ पढ़ते हैं? क्या कोई उपन्यास, लघु कथाएं, कथा संकलन द्विभाषिक प्रकाशित होता है? नहीं. क्योंकि साहित्य पढ़ना भाषा सीखने के प्रयासपूर्ण उद्देश्य से अलग होता है। साहित्य को पढ़ना पढ़ने-लिखने की कुशलताओं में मदद तो करता है लेकिन उसका प्रमुख उद्देश्य पढ़ने का आनंद देना है भाषा सिखाना नहीं। तो फिर बाल साहित्य में द्विभाषिक किताबों की घुसपैठ क्यों? ज़रा सोचिए!
* चयन समिति के समक्ष अनेक किताबें ऐसी भी आईं जो प्राथमिक स्तर के बच्चों के रुचि-क्षेत्र से न तो मेल खाती थीं और न ही उनके स्तर के अनुरूप थीं। उनकी विषय-वस्तु और अवधरणाएं बेहद जटिल थीं। वे किसी भी दृष्टि से पढ़ने और पढ़कर उसका आनंद लेने की प्रेरणा देने वाली नहीं लगीं, जैसे-पौराणिक ग्रंथों और महाकाव्यों के छद्म संस्करण, आत्मकथाएं, संतों की कहानियां, विज्ञान और गणित की जटिल अवधारणाएं आदि।
* बाल साहित्य में मूल्यों के प्रति अति आग्रह उसके आकर्षण और सरसता को कम कर देता है जबकि हम सब यह जानते हैं कि मूल्य सिखाए नहीं जा सकते, वे ग्रहण किए जाते हैं। एक कहानी या कोई एक प्रसंग किस बच्चे के मन-मस्तिष्क पर क्या और कैसा प्रभाव छोड़ेगा, यह तो वही बता सकता है। किसी भी पाठ्य-वस्तु से समान अर्थ ग्रहण किया जाए, अत्यंत कठिन है। हमारे अनुभव, हमारी समाज-आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि हमारे सोचने-विचारने को प्रभावित करती है। नैतिक मूल्यों के जबरन बोझ से दबा बाल साहित्य भी चयन समिति के समक्ष आया। प्रत्यक्ष रूप से दिए गए उपदेश बच्चों को किताब पढ़ने के लिए प्रेरित नहीं करते। ऐसी अनेक किताबों को सूची से परे करते हुए लगा कि बाल साहित्य के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ समझना, करना शेष है।
* चित्र विषय-वस्तु को संदर्भ में समझने में मदद करते हैं। चित्रों के सहारे छपी-लिखित भाषा के बारे में अनुमान लगाने में मदद मिलती है। चित्र यदि आकर्षक, जीवंत, तर्कसंगत और कल्पनाशील हों तो इससे पाठक को पढ़ने में मदद मिलती है तथा वे स्वयं ही कथ्य को संप्रेषित कर देते हैं। चित्र वह भी कहते हैं जो शब्दों में कहा नहीं गया। कुछ बाल साहित्य केवल चित्रों के द्वारा ही रचा गया था और उन्हीं के सहारे कहानी आगे बढ़ रही थी। जबकि अनेक किताबें ऐसी थीं जिनके चित्रों में न तो किसी तरह का आकर्षण था और न ही जीवंतता! कंप्यूटर के सहारे बनाए गए चित्रों में प्रायः जीवंतता का अभाव रहता है। यूं कहा जा सकता है कि चित्रों के मामले में अपन का अनुभव अत्यंत कटु रहा।

इसके साथ-साथ एक और आलेख वितरित किया गया। ‘अर्थ कहाँ से आता है?’ इस पर माथापच्ची हुई। एक शानदार गतिविधि का आयोजन भी किया गया। व्हाइट बोर्ड पर प्रदर्शित किया गया-

जे़ हाले मिसकीं मकुन तग़ाफुल

दुराय नैना बनाय बतियाँ।

कि ताबे-हिजरा न दारम् ऐ

जां न लेहु काहे लगाय छतियाँ।।

जानना चाहा गया कि आखि़र यह है क्या? क्या समझ आ रहा है। सहभागी शिक्षकों ने खू़ब मशक्कत की। अपने अनुभव और सुने गए सन्दर्भ से समझते हुए अपने विचार व्यक्त किए गए। लेकिन ठीक-ठाक या अर्थ के निकट पहुँचने में सभी असहज रहे। दरअसल यह गीत उर्दू भाषा में अमीर खुसरो साहब ने लिखा है। कालान्तर में गुलज़ार साहब ने एक फिल्मी गीत भी इसी तर्ज़ पर रचा। वह यह है- जिहाल-ए-मिस्कीं मुकों बा-रंजिश बहार-ए-हिजरा बेचारा दिल है बाद उसके इसका अर्थ स्पष्ट किया गया। वह यह है-

शिक्षक भी पढ़ते हैं कहानी-कविता !

इस लाचार (मस्कीं) दिल को जब देखो (ज़िहाल), तो गुस्से से (बा-रंजिश) नहीं (मकुन), इस बेचारे दिल को हाल ही में (ब-हाल) अपने महबूब से जुदाई (हिज्र) का गम मिला है।

सभी ने महसूस किया कि जब अपरिचित, अब तक न पढ़ा-सुना और देखा गया कोई किस्सा, कथन सामने आता है तो असहजता स्वाभाविक है। फिर भी अपने अनुभव और सन्दर्भ से अंदाज़ा लगाते हुए अर्थ के नजदीक पहुँचने की कोशिश की जाती है। अंततोगत्वा समझ आया- ‘जब समझकर पढ़ रहे होते हैं तो लिखे हुए से संवाद कर रहे होते हैं। अपने अनुभव और कल्पना-अनुमान-अवलोकन के आधार पर सोचते हुए लिखे हुए से सामंजस्य स्थापित कर अपनी खुद की राय बनाते हुए अर्थ निर्माण की तरफ बढ़ रहे होते हैं।’

दूसरे समूह में ‘अर्थ कहाँ से आता है?’ लेख पढ़ा गया। यह लेख कृष्ण कुमार का है। कृष्ण कुमार पूर्व में एनसीईआरटी के निदेशक रहे हैं। किताब पढ़ना,ज़रा सोचना का यह अंश है। इसे इकतारा प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। इस लेख पर भी खूब चर्चा हुई। खजान जी ने स्पष्ट किया कि साहित्य का आनन्द पाठकों को स्वयं लेना होता है। बुनियादी कक्षाओं में कविता का अर्थ स्पष्ट करने में मदद करनी चाहिए या यह कहना कि कवि यह कहना चाहता है क्या सही होगा। अगर कहना चाहता ही है तो फिर कविता की ज़रूरत ही क्यों पड़ी। अर्थ कहाँ से आता है पर चर्चा करने से एक खास दृष्टि हासिल हुई यह तो कहा ही जा सकता है।

लेख का एक अंश-

यदि कोई बच्चा पढ़ नहीं पाता या अक्षर बोल-बोलकर इतना धीरे पढ़ता है कि शब्दों और वाक्यों में निहित बातों या बिम्बों से स्वयं को नहीं जोड़ पाता, तो वह कहानी की दुनिया के बाहर ही खड़ा रहेगा। ऐसा शायद उन तमाम बच्चों के साथ होता है जिन्हें पुराने यांत्रिक तरीकों से साक्षर बनाया जाता है। ये तरीके स्कूलों में लोकप्रिय बने हुए हैं।

शिक्षक कई हफ्तों या महीनों तक वर्णमाला के अक्षरों की आवाज़ें रटाते रहते हैं। वे सोचते हैं कि जब तक बच्चे को अक्षर-ज्ञान नहीं हो जाता, वह पढ़ कैसे सकता है। सुनने में भले यह बात उचित लगती हो, इसमें गहराई ज्यादा नहीं है। पढ़ना अक्षरों से परिचित हो जाने से काफी भिन्न काम है। अक्षरों से परिचय यदि इतना कष्टप्रद और लम्बा बन जाए कि उन्हें जोड़कर बनाए गए वाक्यों और वाक्यों को जोड़कर बनी कहानी का संसार महीनों तक बच्चे से दूर बना रहे तो ऐसी पढ़ाई से पढ़ना सम्भव नहीं हो पाएगा और किसी तरह हो भी जाए तो कमजोर बना रहेगा। यह बात समझना शायद बहुत मुश्किल नहीं है कि एक शब्द उसमें अक्षरों और मात्राओं का कुल योग या जमा नहीं है, न ही उसका अर्थ उन अक्षरों को बार-बार लिख या बोलकर समझ के दायरे में लाया जा सकता है।

यदि एक बच्चा ‘रोटी’ शब्द में आए चिह्नों को पहचानकर उन्हें जोड़कर पढ़ सकता है, तो भी यह जरूरी नहीं है कि वह बुढ़िया की रोटी की कहानी में खुद को प्रवेश दे सके। ‘र’, ‘ओ’ की मात्रा ‘ट’, बड़ी ‘इ’ की मात्रा जोड़ देने से ‘रोटी’ बन अवश्य जाएगी पर जब तक वह बनेगी, उसकी गर्माहट बहुत कम हो चुकी होगी और उसे एक कौए द्वारा एकदम उठा लिए जाने पर बुढ़िया की झुंझलाहट सम्भवतः बेगानी या कम से कम अजीब लगेगी। इस कहानी को सुनते हुए बच्चे जितनी आसानी से उसके घटनाचक्र में प्रवेश कर लेते हैं, उतनी आसानी से वे कहानी की इबारत को यांत्रिक ढंग से, यानी तोड़-तोड़कर, पढ़कर नहीं कर पाएँगे। यदि कहानी में अर्थ उसका पाठक या श्रोता उसमें वर्णित घटनाओं और पात्रों से जुड़कर पैदा करता है, तो कविता में अर्थ कहाँ से आता है?

यह तो स्पष्ट है कि कविता में घटनाएँ या चरित्र अथवा पात्र नहीं होते। फिर कविता में शब्दों की क्या भूमिका होती है? इस प्रश्न का उत्तर सोचने से पहले हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि कविता में शब्द बहुत कम होते हैं। कविता की यह विशेषता इस बात की तरफ इशारा करती है कि कविता का हर शब्द अपने आप में महत्वपूर्ण होता है, यानी उसका कोई पर्यायवाची वह काम नहीं कर सकता जो वह शब्द करता है। कविता के छोटे-से आकार में हर शब्द विशेष हो उठता है। कई बार हमें लगता है कि शब्द किसी अन्य चीज का संकेत है और कई बार ऐसा लगता है कि एक ही शब्द से कई संकेत फूट रहे हैं।

ऐसी स्थिति में बेहतर यह होगा कि हम कविता में आए शब्दों पर मन ही मन सोचते रहें। पर यह छूट स्कूल नहीं देता। शिक्षक जोर डालते हैं कि हर शब्द का अर्थ याद करो। आमतौर पर शिक्षक स्वयं बता देता है कि अर्थ क्या है। आमतौर पर अध्यापक पूरी कविता का अर्थ धीरे-धीरे स्वयं बताते हैं। इसे ही कविता की पढ़ाई कहते हैं। इस किस्म की पढ़ाई के चलते कविता पढ़ना सम्भव नहीं रह जाता। यदि होता तो पढ़ने वाला कुछ शब्दों पर गौर करता, उन्हें मन में उलट-पुलटकर अपनी स्मृति और कल्पना से जोड़ता। यह मिजाज स्कूल की पढ़ाई पूरी करते-करते बहुत कम लोगों में रह जाता है। शायद इसीलिए कविता की किताबें इतना कम बिकती हैं।

इन बातों को थोड़ी गहराई से समझने के लिए एक उदाहरण की मदद लेना उपयोगी रहेगा। सूरदास का यह पद हिन्दी की पाठ्यपुस्तकों में प्रारम्भिक स्तर की किसी न किसी कक्षा में शामिल रहता हैः ‘मैया मोरी मैं नहिं माखन खायो। भोर भये गैयन के पाछे मधुबन मोहि पठायो…’ इस पद को पढ़ाने का एक आम तरीका पूरे शब्दों को ब्रज से हिन्दी में अनूदित करने से शुरू होता है। ऊपर की दो पंक्तियाँ इस तरह अनुवाद से गुजरती हैं-‘मेरी माँ, मैंने मक्खन नहीं खाया, सुबह से मुझे गायों की देखभाल के लिए मधुबन भेज दिया गया था।’ इस तरह पेश किए जाने पर सूर के शब्दों में कविता का कोई गुण या तत्व नहीं रह जाता। शिक्षक जिसे अर्थ कहता है, वह कविता को नष्ट कर देता है। तो फिर सूर के पद का अर्थ है कहीं और बच्चे उसे कैसे समझ सकते हैं पहले प्रश्न का उत्तर है कि अर्थ सूर के बनाए चित्र को मन ही मन देखकर उभरता है। शिक्षक इस उभार को सम्भव बनाने में इतनी मदद कर सकता है कि वह सूर के पद को एक अवसर या प्रसंग के चौखटे में रख दे।

इसी सत्र में एक बार फिर से शिक्षक साथियों ने पसंदीदा किताब ली। पढ़ी और उस पर शिक्षण योजना बनाई। बाल साहित्य प्रबन्धन, बाल साहित्य की कसौटियाँ, स्कूल और बाल साहित्य में शिक्षक की भूमिका पर विस्तार से चर्चा हुई। शिक्षकों ने अपने अनुभव भी साझा किए। तीसरे दिन की शुरुआत नरेन्द्र सिंह नेगी के गीत से हुई। साथी प्रमोद पैन्यूली के कण्ठ से जनसरोकारी स्वर में यह गीत बहुत ही शानदार ढंग से गाया गया। गढ़वाली में यह गीत यहाँ भी प्रस्तुत है-

बोला भै-बन्धू तुमथैं कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्

हे उत्तराखण्ड्यूँ तुमथैं कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्

जात न पाँत हो, राग न रीस हो छोटू न बडू हो,

भूख न तीस हो मनख्यूंमा हो मनख्यात,

यनूं उत्तराखण्ड चयेणू छ्

बोला बेटि-ब्वारयूँ तुमथैं कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्

बोला माँ-बैण्यूं तुमथैं कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्

घास-लखडा हों बोण अपड़ा हों

परदेस क्वी ना जौउ सब्बि दगड़ा हों

जिकुड़ी ना हो उदास, यनूं उत्तराखण्ड चयेणू छ्

बोला बोड़ाजी तुमथैं कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्

बोला ककाजी तुमथैं कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्

कूलूमा पाणि हो खेतू हैरयाली हो

बाग-बग्वान-फल फूलूकी डाली हो

मेहनति हों सब्बि लोग,

यनूं उत्तराखण्ड चयेणू छ्

बोला भुलुऔं तुमथैं कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्

बोला नौल्याळू तुमथैं कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्

शिक्षा हो दिक्षा हो जख रोजगार हो

क्वै भैजी भुला न बैठ्यूं बेकार हो

खाना कमाणा हो लोग यनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्

बोला परमुख जी तुमथैं कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्

बोला परधान जी तुमथैं कनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्

छोटा छोटा उद्योग जख घर-घरूँमा हों

घूस न रिश्वत जख दफ्तरूंमा हो

गौ-गौंकू होऊ विकास यनू उत्तराखण्ड चयेणू छ्!

इन तीन दिनों में लगभग 150 बाल साहित्य की किताबें पढ़ी गईं !

इस गीत सहभागी शिक्षकों ने भी सहगान किया।

तीसरे दिन दूसरे दिन के सत्र पर दो-दो शिक्षक साथियों ने रपट रखी। खजान जी ने पाठ्यक्रम और पाठ्यचर्या से सत्र का आरम्भ किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि लगातार बाल साहित्य को कक्षा-कक्ष में बरतने की ज़रूरत है। उन्होंने शिक्षा का अधिकार अधिनियम के हवाले से यह कहने का प्रयास किया कि अब विद्यालयों में बाल साहित्य की अनिवार्यता है। यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि अच्छा साहित्य हमारे पुस्तकालयों में आए। खजान बोले कि पढ़ने-लिखने का संकट अनेक माध्यमों के आने से बढ़ रहा है। लेकिन भाषा का स्वभाव तभी बढ़ेगा जब ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ने के लिए पठन सामग्री वितरित हो। विविध सामग्री की आवश्यकता है। भाषा की रंगते तभी फैलेंगी जब भाषा की एक किताब पर निर्भरता छूटेगी। एक पाठ्य पुस्तक से साल भर कैसे काम चल सकता है। साहित्य ही है जिससे भाषा बढ़ती हे। मूल्य बढ़ते हैं। संवेदनाएं गहरी होती हैं।

उन्होंने कहा कि साहित्य पढ़ते हुए उसका अर्थ समझना नितांत पाठक का निजी मसअला है। अर्थ की परतें खुद के अनुभव से खुलती हैं। उसे महसूस करने का हूनर भी तो सीखना-समझना है। खजान कक्षा-कक्ष की प्रक्रिया से जोड़ते हुए कहते हैं कि लिखना एक कला है। विधा है। एकदम से नहीं होता। विद्यार्थी ही नहीं हम बड़े भी जूझते हैं। लिखना दुखती रग है। लिख नहीं पाने के कई कारण है। एक सत्र यह भी हुआ कि आखिर विद्यालयों में बच्चे लिख क्यों नहीं पाते? तमाम शिक्षकों ने अपने अनुभव साझा किए। सभी शिक्षक साथियों को लिखने के लिए एक कार्यपत्रक लेखन वितरित किया गया। यह शानदार गतिविधि रही।

कार्यपत्रक यह रहा-

कार्यपत्रक लेखन सेक्शन- (अ)
सुगमकर्ता एक छोटा अनुच्छेद श्रुतलेख के तौर पर बोलेंगे:-
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इन वाक्यों को सुलेख के रूप में लिखिए:-
‘लेखन, लिखने वाले की विचार प्रक्रिया पर ही निर्भर करता है। गांधीजी की लिखावट को देखने में सुन्दर नहीं कहा जा सकता, लेकिन विचारों में उनका कोई सानी नहीं।’
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उत्तराखंड में कितनी भाषाएं बोली जाती हैं?
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सेक्शन- (ब)
ईरान के चरवाहों पर एक छोटा सा अनुच्छेद लिखिए अथवा एस्किमो के जीवन पर एक संक्षिप्त अनुच्छेद लिखिए: –

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सेक्शन- (स)
अधूरी कहानी पूरी कीजिए:-

छुट्टी का दिन था। मैं अपनी पसंद की एक किताब में डूबी थी/था। तभी जोर-जोर से दरवाजा खटखटाने की आवाज सुनाई दी . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . . . .
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इस कविता की पंक्ति में तीन लाइनें और जोड़िए-
मन करता है चारों ओर बिखर जाऊं
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सेक्शन-(द)
आपकी क्या चाहना है। आपके 75वें जन्मदिन पर आपके बारे में आपके मित्र क्या कहें अथवा आप क्या चाहते हैं, आपके बच्चे आपको किस रूप में याद करें?
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आपका नाम. . . . . . . . .————————————— .. . . . . . . . . .

यह गतिविधि बेहद-बेहद शानदार रही। श्रुतलेख लिखते हुए ही साथी अध्यापकों में हड़बड़ी मच गई। ठीक से न सुन पाने, जल्दी-जल्दी न लिख पाने और साफ-साफ न लिख पाने की बातें होने लगी। इस गतिविधि को लिखने के लिए आधा घण्टा दिया गया था।
मकसद साफ समझ आ रहा था कि बतौर विद्यार्थियों की तरह लेखन करना आसान नहीं है। क्या बतौर अध्यापक हम इस गतिविधि को हमेशा याद रख सकेंगे? इस गतिविधि पर भी चर्चा हुई। खजान बोले कि लिखना एक कौशल है और यह लिखते-लिखते ही सधता है। बच्चों के स्तर पर हमें यह बखूबी समझना होगा। हम बड़ों के पास जीवन के कई वसंत जी चुकने का अनुभव होता है। वहीं बच्चे अभी अपने अनुभवों से ज़्यादा समय व्यतीत नहीं कर पाए हैं। उनके मन के औज़ारों में चिन्तन, कौशल, दिमाग, दिल, स्मृतियांँ और छवि क्या हम बड़ों की तरह समृद्ध हैं?
लेखन पत्रक पर काम करते हुए और सुगमकर्ताओं की बातचीत से यह समझ बनती है कि विद्यार्थियों के स्तर पर बहुत सरल टॉस्क दिए जाने चाहिए। भरपूर बातचीत करनी चाहिए और उन्हें भी भरपूर बातचीत करने का अवसर देना चाहिए। कल्पना करने, शब्दों का चयन करने, चिन्तन करने का अवसर भी देना चाहिए और आज़ादी भी।
लेखन प्रक्रिया के सन्दर्भ में भी कई बातें स्पष्ट हुई। मसलन कि मर्म अवश्य लेखन में शामिल हो। तथ्य भी आएं। शब्दों का चयन भी एक बड़ा काम है। कल्पना भी हो तो उसमें अर्थ गढ़ा हुआ हो। स्मृति के पिटारे से भी लेखन सामग्री मिलती है। एक चलचित्र सामने आता है। यह भी कि अंत को किसी खूबसूरत मोड़ पर लाकर छोड़ा भी जा सकता है। कुछ भी लिखते हैं तो भविष्य का खाका भी बनता है। लेखन सामग्री पढ़ते समय अच्छी भी लगे। रोचक भी लगें यह भी हो कि पाठक को लगे कि वाह ! अहा ! क्या लिख दिया ! पठनीय सामग्री ग्राह्य भी होनी चाहिए। विचारों की एक लम्बी प्रक्रिया चलती है। उसे चलते रहना चाहिए। अभ्यास और प्रक्रिया के साथ मानसिक औज़ारों का प्रयोग करते रहना चाहिए।


यह भी समझ में आया कि बच्चे ज़्यादा संभावनाशील होते हैं। उन्हें ज़्यादा सोचने-समझने का नज़रिया देने के मौके देने चाहिए। हम पढ़ते क्यों हैं? हम लिखते क्यों हैं? पढ़ना-लिखना हमें मुक्त करता है। हमारी संकीर्णताओं को और हमारे ओछेपन को मुक्त करता है। समग्र चेतना हमारे बाह्य जगत और अन्तर्जगत से होते हुए सृजन के द्वार खोलती है। सृजन तभी बढ़ेगा जब अधिक से अधिक संवाद होगा। अधिक चर्चाएं होंगी। यात्राएं होंगी। सृजन चेतना बढ़ाने के लिए होता है। विचार पनपता है। उस विचार को भाषा शब्द देती है। भाषा को बरतते संयोजन करने से पूर्व चिंतन चलता रहता है। फिर एक खाका बनता है। तब लेखन शुरु होता है।


खजान लेखन प्रक्रिया पर विस्तार से बोले। उन्होंने कहा कि लेखन यात्रा में जीवन के उत्कट अनुभव ज़्यादा कारगर होते हैं। उन्ही अनुभव को लेखन में यथार्थ,कल्पना और अनुमान के साथ फेंटेसी का आकार देना आसान काम नहीं है। गहन मानसिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। शब्दबद्ध करना आसान नहीं है। यह अभ्यास का मसअला भी है। फिर लेखन मात्र मनोरंजन के लिए नहीं होता। लेखन की भी सामाजिक प्रतिबद्धताएं होती हैं। लिखने से पहले जो मसौदा तैयार होता है उससे पहले क्या लिखना है? क्यों लिखना है? कहां लिखना है? किसके लिए लिखना है? कब लिखना है? यह सब लिखने से पूर्व की तैयारी है।


लेखन एक कौशल है। इस पर पूरे एक दिन का सत्र भी होता तो कम पड़ता। एक-डेढ़ घण्टे के स्तर पर सार्थक चर्चा रही। सभागार में अंकित, कृष्ण, विकास, भीम, दिनेश, रीना,पवन,संदीप,धर्मवीर और सुरक्षा हर समय शिक्षक साथियों के सहयोग के लिए सहभागी रहे।

अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन ने तीन दिवसीय राज्य स्तरीय स्वैच्छिक शिक्षक कैम्प का आयोजन किया। हालांकि यह पूर्व निर्धारित पांच दिवसीय था, लेकिन जनवरी में ही व्यावसायिक टैक्सी वाहन चालक हड़ताल पर चले गए। आवागमन की दुश्वारियों के कारण जहाँ प्रतिभागी शिक्षकों को दो जनवरी हरिद्वार पहुँचना था वह चार जनवरी को चण्डीगढ़ भवन और जगाधरी धर्मशाला पहुँचे।

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By manohar

2 thoughts on “बाल साहित्य की खुशबू और भाषा का सम्बन्ध”
  1. It is an interesting report, with greater details Monohar ji. It gives a good understanding of any reader. This report will help those, who are not aware about the Teacher’s camp. Your report looks me as a good resource material for future camp for the participants. Thank you so much for writing and sharing your refelection.

    1. शुक्रिया तो मुझे कहना चाहिए। मुझे बतौर अध्यापक इस शानदार कैम्प में सहभागी होने का अवसर मिला। अभी अपराह्न के सत्र की रपट बाकी है। मैं पढ़ने-लिखने की संस्कृति वाले हिस्से में रहा। कमलेश जोशी एवं साथियों ने ऐसे नायाब पर्चे साझा किए कि अब तक उन पर्चो के मुखड़े कौंध रहे हैं। उस पर जल्दी ही।

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