ऐसे संपादक ही रचनाओं का कबाड़ा कर देते हैं !

4 साल 8 माह 25 दिन पूर्व भेजी कहानी अब छप रही है! वह भी आधी.अधूरी !
हैरान नहीं हुए आप ?

जी हाँ। बाल किलकारी में मैंने एक कहानी 7 जून 2017 को प्रकाशनार्थ भेजी थी। मार्च 2022 के अंक में वह अब छपी है। वह भी आधी-अधूरी। कोई काट-छाँट नहीं की गई है। संपादित भी नहीं की गई है।

बस ! अंतिम चार अनुच्छेद यानि 509 शब्दों को जगह ही नहीं मिली। हो सकता है कि स्थानाभाव के कारण ऐसा हुआ हो। लेकिन अंतिम दो पेज यानि 47 और 48 पर दी गई कहानी का अंत इस तरह छोड़ दिया जाए तो पाठक को कहानी बेसिर-पैर की लगेगी ही।

अब आप ही बताइए। अगर यह पत्रिका 1000 भी छपती होगी तो 1000 पाठकों के साथ उनसे जुड़े परिवार के सदस्य यदि इस कहानी को पढ़ेंगे तो अपना माथा पीट लेंगे। लेखक बेचारा कहाँ तक सफाई देगा ?
सो , आपके ध्यानार्थ यह मामला दे रहा हूँ और हाँ पूरी कहानी भी दे रहा हूँ।

बचना है तो बचाना होगा


-मनोहर चमोली ‘मनु’
सबने तय किया कि सैर-सपाटे के लिए किसी सुदूर जंगल की ओर चला जाये। मोतीवन का नाम सबने सुना था। कई दिनों की यात्रा के बाद वे मोतीवन पहुंच ही गए। लेकिन यह क्या ! मोतीवन आने का उत्साह पल भर में ठंडा पड़ गया। कुत्ता बिफर पड़ा। कहने लगा-‘‘उफ, ये गर्मी। मैं तो हांफते-हांफते परेशान हो गया हूं।’’


सियार के पसीने छूट रहे थे। उसकी आवाज गले में अटक रही थी। वह बोला-‘‘मेरी तो प्यास ही नहीं बुझ रही है।’’ बंदर बोला-‘‘अरे कोई मुझे ये तो बता दे कि इस मोतीवन के पानी में स्वाद क्यों नहीं है? यहां की धूप से तो मेरी आंखें ही चुंधिया रही है।’’ हाथी ने पेट पर हाथ मलते हुए कहा-‘‘अब भूख सहन होती। लेकिन मेरा पेट तो पानी पी-पीकर भरा हुआ है। मुझे तो लगता है कि मेरे पेट में कीचड़ भर गया है। यहां तो हरे-भरे मैदान भी नहीं हैं।’’ भेड़िया झल्लाते हुए बोला-‘‘इस सैर-सपाटे से अच्छा तो अपना जंगल ही भला है।’’ खरगोश ने सपाट शब्दों में धीरे से कहा-‘‘जैसा जो कुछ है, वैसा नहीं रहेगा।’’ चूहा खरगोश से बोला-‘‘आंय। तुम क्या कहना चाहते हो?’’


खरगोश बोला-‘‘यही कि हमारे जंगल के हालात भी ऐसे ही होने वाले हैं।’’ अब तक भालू चुप था। वह खरगोश से बोला-‘‘क्या तुम हमें डरा रहे हो?’’ खरगोश ने कहा-‘‘मैं डरा नहीं रहा हूं। आने वाला भविष्य बता रहा हूं। मोतीवन का खूब नाम सुना था न हमने ! अब यहां आकर हमें जो महसूस हो रहा है, क्या वह काफी नहीं? आने वाले समय में हमारे जंगल में भी यह सब दिखाई देगा।’’ सियार ने झल्लाते हुए कहा-‘‘तुम जो कुछ कह रहे हो, वह चैंकाने वाला है। लेकिन मेरी समझ से बाहर है। ठीक से बताओ। आओ, सुस्ता भी लें।’’ खरगोश ने पेड़ के तने से टेक लगाई और सुदूर नज़रें घुमाते हुए बोला-आखिर बारिश लाने वाले जंगल बचे ही कहां हैं? हम भी तो लगातार जंगल नष्ट करने पर तुले हुए हैं।’’ चूहे ने हैरानी से पूछा-‘‘एक मिनट-एक मिनट। कहीं तुम रेनफोरेस्ट की बात तो नहीं कर रहे हो?’’


खरगोश ने जवाब दिया-‘‘हां। मैं रेनफोरेस्ट की ही बात कर रहा हूं। गनीमत है कि हमारे जंगल में वर्षावन अभी कुछ हद तक जिन्दा है।’’ सियार बीच में ही बोल पड़ा-‘‘कुछ हद तक ! तुम कहना क्या चाहते हो?’’ चूहा बोल पड़ा-‘‘हां, खरगोश सही कहता है। कुछ हद तक ही तो बचा है हमारा वर्षावन। हर कोई आग जलाने के लिए लकड़ी काट रहा है। खेती के लिए तारबाड़ के लिए बड़े-बड़े पेड़ रोज कट रहे हैं। हमारे कई शाकाहारी साथी चरने के लिए घने जंगल में चले जाते हैं।’’ भालू ने नाराजगी जताई-‘‘तो तुम ये कहना चाहते हो कि शाकाहारी अब चारापत्ती की जगह कंकड़-पत्थर खाएं?’’ खरगोश ने एकदम से जवाब दिया-‘‘नाराज मत होओ। हम सब वर्षावनों के घटने के लिए जिम्मेदार हैं। वन धरती की बहुमूल्य संपदा है। इमारती और जलावन लकड़ी के अलावा सैकड़ों जीव वनों पर ही जिंदा हैं। तब जाकर मांसाहारी जीव भी जिंदा हैं। हम सबके लिए सबसे खतरनाक जीव तो इंसान है। उसने तो जंगल काट-काट कर कंकरीट के जंगल खड़े कर दिये हैं। अब इंसानों की नजर बचे-खुचे जंगलों पर भी है।’’


चूहा बोला-‘‘अरे हां। हम सब जानते तो हैं कि एक नई सड़क जब भी बनती है, सैकड़ों पेड़ों का कटान होता है। काश! वर्षा वनों में कोई न घुस पाता। वर्षावन ही तो बारिश लाने में खास भूमिका निभाते हैं। जब बारिश ही नहीं होगी तो मौसम कैसे बदलेंगे? नदी, तालाब, पोखरों में जल कहां से आएगा? इस मोतीवन के हालात हम देख ही रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग का असर अब जंगलों में भी तो पड़ने लगा है।’’ कुत्ता भौंकते हुए बोला-‘‘आज से फर्नीचर, फर्श और घर के खिड़की-दरवाजों के लिए जो कोई भी पेड़ काटेगा उसकी खैर नहीं। हम सब उस पर हमला बोल देंगे।’’


हाथी ने परेशान होते हुए कहा-‘‘यार हम आए तो सैर-सपाटे और मस्ती के लिए थे। लेकिन हम सब तो गंभीर चर्चा में लग गए। यह सब बातें तो मुझे सोचने पर विवश कर रही है। अब ये भी तो बताओ कि हम वर्षावन को कैसे बचा सकते हैं?’’ खरगोश ने जवाब दिया-‘‘हम सभी को जागरुक होना होगा। गरमी पड़ते ही कुछ नासमझ और अराजक जंगलों में आग लगा देते हैं। हर साल हजारों जंगल राख हो जाते हैं। हमें आग से जंगलों को बचाना होगा। कुछ सुख-सुविधाएं त्यागनी होगी। पेड़ लगाने होंगे। पेड़ बचाने होंगे। इससे भी कुछ खास नहीं होगा। पहले तो एक भी पेड़ नहीं काटना होगा। एक पेड़ सौ अन्य जीवों के बराबर है। पेड़ एक दिन में तो बढ़ता नहीं है। सो हमें वन क्षेत्र को संरक्षित करना होगा। पारिस्थितिकी तभी बचेगी। अब तुम यह पूछोगे कि ये पारिस्थितिकी क्या है?’’


चूहा झट से बोल पड़ा-‘‘मैं बताता हूं। दोस्तों मैं सड़े-गले अनाज-बीज आदि खाता हूं। मुझे मेरा भोजन पेड़-पौधों की वजह से ही मिलता है। यदि पेड़-पौधे ही न रहें तो मैं कैसे जिन्दा रहूंगा? मैं न रहा तो बिल्ली-सांप को भोजन के लाले पड़ जाएंगे। यानि हम सब किसी न किसी पर निर्भर हैं। यह एक भोजन चक्र है। इस भोजन चक्र की एक कड़ी भी टूटी तो कई जीव-जंतु लुप्त हो जाएंगे। अब सोचिये हम जीव-जंतु तो वनों पर ही निर्भर हैं न? वन ही नहीं रहें तो हम कहां जाएंगे!’’ भालू ने सिर हिलाया-‘‘तुम सही कह रहे हो। पांडा तो अब लगभग विलुप्त ही हो गया है। बंदर के कई दोस्त जंगल से शहर को चले गए हैं। सुना है वहां इंसान उन्हें पकड़ कर चिड़ियाघर में कैद कर देते हैं। भई। ताकतवर जानवरों से मिलकर हमें वर्षावन की सुरक्षा के लिए कुछ नियम तो बनाने पड़ेंगे। नहीं तो हमारा जीना मुहाल हो जाएगा।’’


बंदर ने कहा-‘‘हम अपने जंगल का आधा हिस्सा सुरक्षित पार्क के रूप में विकसित कर सकते हैं। एक चैथाई हिस्से में किसी को भी जाने से रोक देंगे। संरक्षित करना होगा। जंगल बचेगा तो पानी मिलेगा। दोस्तों जल है तो कल है। जल है तो जीवन है।’’ सियार ने कहा-‘‘यार। ये सैर-सपाटा छोड़ो और सीधे अपने जंगल चलो। बचना है तो जंगल बचाना होगा।’’ सब सियार की बात से सहमत थे। सबने वापिस अपने जंगल लौट आए। अब वे हर किसी से जंगल को बनाये और बचाये रखने के तरीकों पर काम करने के लिए एकजुट करने में जुट गए थे।

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