असल बात कह दी है दिव्या जी ने

दिव्या झिंकवान बच्चों के बीच में काम करती हैं। पढ़ाना ही उनका काम है। वह अध्यापिका जो है। वे लिखती भी हैं। लिखने के लिए नहीं लिखतीं। समाज को बेहतर समाज की ओर बढ़ता हुआ भी देखना चाहती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों को तरजीह देती हैं। उसे जीती भी हैं।

हम एक बार विभागीय कार्यशाला में मिले थे। बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करने के लिए रीडिंग कार्ड बनाए थे। तब उनके लेखन में आई उनकी सोच से परिचय हुआ था। बहरहाल, उन्होंने भी ‘कहानियाँ बाल मन की’ पुस्तक खरीदी। न सिर्फ खरीदी, बल्कि पढ़ी भी। न सिर्फ पढ़ी बल्कि उन्होंने संग्रह में शामिल 40 कहानियों के आलोक में ऐसी बात को महसूस किया जिसे अब तक किसी भी परिचित-अपरिचित साहित्यकार, मित्र, पाठक आदि ने मुझे भेजी टिप्पणी में नहीं लिखा। दिव्या जी की इस टिप्पणी को मैं यहां इसलिए भी दे रहा हूँ ताकि इस पोस्ट को पढ़ने वाले यह बात जान लें कि एक अध्यापक से बेहतर साहित्यकार ओर कोई नहीं हो सकता। यदि अध्यापक अपनी इस क्षमता को महसूस कर लें। लीजिएगा आप भी दिव्या जी की टिप्पणी पढ़िए-

”मुझे जैसा लगा, बच्चों के लिए ये कहानियां वाकई इस दौर की मांग हैं, इन कहानियों में भावनाओं का, कुछ काल्पनिकता, कुछ हंसी का पुट है, इन कहानियों में बच्चों का हिस्सा तो लाजिमी है, वन्य जीवों का भी हिस्सा है सबसे बढ़कर खास है कहानियों का वैज्ञानिक, तार्किक दृष्टिकोण, लोगों के बीच सामान्यीकृत हो चुके अंधविश्वासों का वैज्ञानिक तरीके से खंडन, वो भी बच्चों के लिए अपेक्षाकृत सरल भाषा में । कहानी के पात्रों के नाम बिना किसी पूर्वाग्रह के रखे गए हैं और धर्म, जाति की संकीर्णताओं से मुक्त हैं जिनसे लेखक का लोकतांत्रिक और निरपेक्ष नजरिया दिखता है । कहानियों के कथानक दुरूह नहीं हैं पर कल्पनाओं की उड़ान की भी संभावनाएं पूरी हैं है ।ये कथाओं का वैज्ञानिक रूप कहा जाय या सरल विज्ञान का कहानीकृत रूप, ये एक दूसरे के होने को बेहतर तरीके से पुष्ट करती हैं । इन के माध्यम से छोटी व्यावहारिक बातों का सरल स्पष्टीकरण बच्चो के लिये किया गया है । पर्यावरण हो या पारिस्थितिकी, लेखक के द्वारा अपने सरोकार भी कहानियों के माध्यम से व्यक्त किए जाए हैं । मुझे किताब अच्छी लगी, बच्चों की कहानी की किताब में चित्रांकन रंगीन होता तो, ज्यादा आकर्षक लगती। एक और बात, क्या हम हाशिए पर रखे गए दलित, आदिवासी बच्चों की कल्पनाओं, कहानियों, डर, चिंताओं को भी शामिल कर सकते थे ? बच्चों की किताब के लिए ये पहलू शामिल करना इसकी स्वीकृति को व्यापक ही करेगा । हम ये लक्ष्य जरूर रख सकते हैं । संग्रह में चालीस कहानियां हैं, हर एक कहानी में कोई न कोई संदेश है, इसके पाठक वय वर्ग के लिए यह मुझे जरूरी भी लगा ।बाकी हिंदी बाल साहित्य के क्षेत्र में मनु जी को कौन नहीं जानता, उनकी किताब पर एक पाठिका होने के नाते मैं अपनी बात रख रही हूं । शायद पहले ही कुछ लिखती, मुझे किताब जरा देर से ही प्राप्त हो पाई । मनु जी को भी बहुत शुभकामनाएं।”

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