लपूझन्ना से लूट लो बचपन अपना

-मनोहर चमोली ‘मनु’
लपूझन्ना उपन्यास हाथों में है। दो-तीन बैठक में ही पढ़ लिया गया है। लपूझन्ना में लफत्तू को उपन्यास का केन्द्रीय पात्र माना जा सकता है। उपन्यास का आरम्भ कुछ इस तरह से होता है-‘‘बाबू का ट्रांसफर पहली दफा प्लेन्स में होने पर हम लोग रामनगर आए। उसके पहले हम पहाड़ यानी अल्मोड़ा में रहते थे। खताड़ी नाम के मोहल्ले में हमें जो मकान किराए पर मिला, वह रामनगर के भीतर बसने वाले दो मुल्कों के ऐन बॉर्डर पर था। आजाद भारत के हर सभ्य नगर की तरह रामनगर के भी अपने-अपने हिंदुस्तान और पाकिस्तान थे।
घर के पीछे नजदीक ही एक मंदिर था । लाउडस्पीकर पर सुबह-शाम भजनों का एक घिसा हुआ रिकॉर्ड बजता। रिकॉर्ड की सुई चार या पाँच जगह अटक जाती थी। ऐसा होने पर उसमें से ‘चचचचचच‘ या ‘गगगगगग‘ पर ठहरी हुई आवाज तब तक आती रहती जब तक कि कोई धर्मात्मा सुई को उठाकर आगे-पीछे न रख देता। सामने वाली खिड़की से बाईं तरफ देखने पर तीसेक मीटर दूर मस्जिद की चमकीली मीनार दिखाई देती जहाँ से दिन में पाँच बार अजान आती थी। रामनगर आने से पहले मैं इन धार्मिक आवाजों से अनभिज्ञ था।
“रामनगर में शोर बहुत होता है !” दफ्तर से आने के बाद बाबू अक्सर कहते।
मस्जिद के सामने ख़लील सब्जीवाले की दुकान थी। घर की सब्जी वहीं से आती। सब्जी लेने माँ वहाँ जाती तो किसी पड़ोसन को साथ ले जाती। लौटती तो मुसलमानों के बारे में कुछ-न-कुछ जरूर कहती । मुसलमानों और अन्य नए विषयों से संबंधित मेरा सामान्य ज्ञान, रामनगर में बने मेरे पहले दोस्त लफत्तू की दी हुई सूचनाओं से हर रोज समृद्ध होता था। एक नंबर का चोर माना जाने वाला लफत्तू तोतला और पढ़ने में बेहद कमजोर था। उसके घरवाले उसे बौड़म कहकर बुलाया करते थे।’’
उपन्यास का दिलचस्प पहलू यह भी है कि पाठक अंत के पन्ने पर भी इसका अंत नहीं चाहता। उपन्यास का अंत आप भी पढ़िए –
गंदी पड़ चुकी नेकर-कमीज़ और हवाई चप्पल के ऊपर उसने कोट भी पहन लिया। हमारे चारों तरफ़ लड़कों की भीड़ जुटना शुरू हो गई थी। साइकिल वाला छोटा बच्चा संभवतः उसका नवीनतम शागिर्द था। साइकिल चलाना रोककर वह भी हमें ताक रहा था।
‘‘ये मेला थब थे पक्का दोत्त ऐ बेते। नैनताल में पलता है, नैनताल में!” लफत्तू ने बच्चे के हाथ से साइकिल ली और तेजी से गोल-गोल चक्कर काटने लगा। उसकी पहनी टाई हवा में लहराने लगी। उसने ख़ुश होकर उन्हीं दिनों लोकप्रिय हुए एक गाने की पैरोडी गाना शुरू कर दिया- ‘‘नैनताल थे आया मेरा दोत्त… दोत्त को छलाम कलो।‘‘
सारे बच्चे हँस रहे थे। लफत्तू ख़ुश था। मैं ख़ुश था। सारा संसार ख़ुश था। गोल चक्कर काटता लफत्तू अपनी पुरानी रौ में आकर ‘उहुँ-उहुँ‘ करने लगा था। अगर ख़ुशी का कोई ठोस रूप होता था तो वह मेरे सामने था। मुझे अपना समूचा अस्तित्व रुई की तरह हल्का होता महसूस हुआ। सामने से बत्तीसी दिखाता, भागता लाल सिंह आ रहा था। बागड़बिल्ला, बंटू, जगुवा और सत्तू उसके पीछे थे। आसमान से फूल झरने लग गए थे।
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उपन्यास की कथावस्तु कुछ इस प्रकार से है। अशोक के पिता का तबादला रामनगर हो जाता है। परिवार अल्मोड़ा से पहली बार मैदानी क्षेत्र में आया था। अशोक की दोस्ती लफत्तू से हो जाती है। लफत्तू तोतला बोलता है। पढ़ाई में कमजोर है। दस-ग्यारह साल का अशोक रामनगर कस्बे में लगभग दो साल रहता है। बाद में उसके पिता उसे नैनीताल बोर्डिंग वाले स्कूल का इम्तिहान दिलाते है और वह रामनगर छोड़ देता है। नैनीताल स्कूल में भर्ती हो जाने के बाद पहली बार सर्दियों की छुट्टियों में वह रामनगर लौटता है तो घर जाने से पहले उसका दोस्त लफत्तू घर के पास मैदान में किसी छोटे बच्चे को साइकिल सिखाते हुए मिल जाता है। अंत आप भी पढ़िएगा-
रामनगर को दस साल के बच्चे ने जैसा देखा, समझा और जिया। वह चित्रण बड़े सधे अंदाज़ में है। विवरणात्मक और आत्मकथात्मक शैली का अधिकाधिक प्रयोग किया गया है। उपन्यासकार कभी-कभी भी वर्तमान समय के साथ उपन्यास में शामिल हो जाता है। हालांकि समूची कथावस्तु अधिकाधिक सन उन्नीस सौ पिचहत्तर से सतहत्तर के देशकाल के मध्य की मानी जा सकती है।
लपूझन्ना उस दौर के बचपन का कस्बाई रेखाचित्र बेहद करीने से पाठकों की आँखों में खींचने में सफल हुआ है। यह उपन्यास साठ, सत्तर और अस्सी के दशक में पैदा हुए पाठकों को बहुत पसंद आएगा। यह तय है। लेकिन यह भी तय है कि इक्कीसवीं सदी में पैदा हुए पाठक भी उस कालखण्ड के कस्बाई जीवन में झांक सकते हैं। वे इस उपन्यास की यात्रा में बहुत से खो चुके शब्दों से, खेलों से, गीतों से, बाज़ारी वस्तुओं,सेवाओं,चीजों,उत्पादों से परिचित हो सकते हैं। मुहल्ले की गंगा-जमुनी संस्कृति के साथ रामनगर के आस-पास के नगरों की संस्कृति की पड़ताल कर सकते हैं।
पता नहीं क्यों मुझे लपूझन्ना राग दरबारी की याद दिला रहा है? मुझे लपूझन्ना में विविधता अधिक दिखाई देती है। यहाँ गाँव,कस्बा और नगर का मिश्रित रहन-सहन है। यहाँ उस दौर के विद्यालय और विद्यालयी व्यवस्था है। यहाँ उस दौर के बाज़ार के साथ काॅलोनइज्ड कल्चर है। यहाँ किशोर होते बालमन की उड़ानें हैं। यहाँ उस दौर के अभिभावकों का अवैज्ञानिक लालन-पालन है। यहाँ घर में और स्कूल में बच्चों की सामाजिक स्वीकारोक्तियुक्त पिटाई है। यहाँ गंगा-जमुनी संस्कृति हैं। यहाँ दूसरे धर्म और जाति के खान-पान और संस्कृति में मीन-मेख निकालने वाला समाज हैं। यहाँ बच्चों के अपने अनुभव से समाज में आगे बढ़ने के कृत्य हैं। यहाँ तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था का ऐसा सटीक चित्रण है जो बताता है कि हम क्यों नहीं वैज्ञानिक विचारधारा को अभी तक आत्मसात नहीं कर पाए हैं। यहाँ उस दौर के बच्चों का भला चाहने वाला समाज भी है तो यहाँ बच्चों को घास-पात समझने वाले मास्साब भी हैं।
अशोक का एडमिशन नैनीताल के बोर्डिंग स्कूल में हो गया था। अशोक हाॅस्टल में चला गया था। एक बच्चा घर-परिवार से पहली बार अकेला रहता है। वह क्या सोचता है? आप भी महसूस कीजिएगा-
‘‘कई तरह के बच्चे कई तरह की गतिविधियों में लगे हुए थे। उन्होंने कुछ देर तक हमें उत्सुकता से देखा फिर अपने कामों में लग गए। अकेला होते ही मैं खिड़की से बाहर देखने लगा। गीली हवा, लाल टीन की छतों और चीड़-देवदार के सोते हुए पेड़ों के आगे हर चीज कोहरे में लिपटी हुई थी। मुझे घर से दूर अकेला छोड़कर बाबू रामनगर जा चुके थे। पहला एहसास यह हुआ कि मुझे कोहरे के समुद्र में किसी निर्जन द्वीप पर रहने की सजा दे दी गई थी, ‘‘इसीलिए तुम्हें हॉस्टल भेज रहे हैं।‘‘ दीवारघड़ी चार बजा रही थी। लाल सिंह की दुकान पर दूध-बिस्कुट सूतते हुए बंटू और बागड़बिल्ला मेरे बारे में बातें कर रहे होंगे। मुरादाबाद के अस्पताल में लेटा लफत्तू मुझे याद कर रहा होगा। घर पर माँ रो रही होगी। रुलाई छूट गई। वहाँ चुप कराने वाला कोई न था।
सबसे ज्यादा याद लाल सिंह की आई जो मुझे विदा करने बस अड्डे तक आया था। छत पर चढ़े मुस्तफा को संदूक और बिस्तरबंद भी उसी ने पकड़ाया था। मेरे बस में चढ़ने से पहले उसने मेरे हाथ में पाँच रुपये का नोट थमाया। ‘अच्छे से रहना यार!” आँखें पोंछता वह मेरी तरफ देखे बिना वापस लौट गया था।
हॉस्टल की दिनचर्या का पालन किया जाना था जिसमें सुबह साढ़े चार बजे उठने से रात साढ़े आठ बजे सोने के बीच सैकड़ों तरह के काम होते थे। उतनी ही बार अटेंडेंस भी होती। दो-तीन दिन में उसकी आदत पड़ गई।
नियम के मुताबिक इतवार को नाश्ते के बाद हमें अपने घरवालों को चिट्ठी लिखनी होती थी। सारे बच्चों को एक-एक ख़ाली अंतर्देशीय पकड़ाया गया। माँ-बाबू को संबोधित कर मैंने चिट्ठी में अपनी दिनचर्या के बारे में विस्तार से लिखा और बताया कि मैं ख़ुश था। चिट्ठी के आख़िर में मैंने लफत्तू की तबीयत के बारे में पूछा।
नैनीताल के स्कूल में न नहर थी, न आम का बगीचा। खेल के तीन मैदान जरूर थे लेकिन किसी की भी बगल में न बौने का ठेला लगता था न कोई पिक्चर हॉल था। हर हफ्ते स्कूल के विशाल ऑडिटोरियम में पिक्चर दिखाई जाती और नाश्ते में हफ्ते में तीन बार साबूदाने की खीर मिला करती। स्कूल के अलावा हॉस्टल की लाइब्रेरी में भी दुनियाभर की किताबें और पत्रिकाएँ थीं।’’
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इस उपन्यास की खास बात यह है कि उपन्यासकार हमें अशोक के बचपन में ले जाता है। हम अशोक के बचपन में अपना बचपन भी पाते हैं। लेकिन उपन्यासकार अशोक की समझ और वयस्क हो चुके अशोक के नज़रिए को भी बीच-बीच में प्रस्तुत करते हुए दिखाई देते हैं। जो क़तई अटपटा नहीं लगता। ऐसा लगता है कि बचपन में ही घोषित होशियार अशोक उसी कालखण्ड से हमें संजय की मानिंद हालिया बयान प्रस्तुत कर रहा हो। एक बानगी आप भी पढ़िएगा। उस दौर के मास्साबों का वर्णन हैरान भी करता है कि आज़ादी के बाद भी कई दशकों तक विद्या के आलयों की क्या दुर्गति रही-
‘‘दुर्गादत्त मास्साब कर्नल रंजीत के जासूसी उपन्यासों के सबसे बड़े पाठक थे। उन्हें हर सुबह एस.पी. इंटर कॉलेज के परिसर में आलसभरी चाल के साथ प्रवेश करते देखा जाता था। असेंबली ख़त्म होने को होती थी जब उनकी विशाल देह प्रवेशद्वार पर नमूदार होती। भीतर घुसते ही उन्हें ठिठककर थम जाना पड़ता था क्योंकि राष्ट्रगान शुरू हो चुका होता। वे इत्मीनान से आँखें बंद कर राष्ट्रगान के ख़त्म होने का इंतजार करते।
असेंबली के विसर्जन के समय प्रिंसिपल साब एक खीझभरी निगाह दुर्गादत्त मास्साब पर डालते थे लेकिन उस निगाह से बेजार मास्साब स्टाफरूम की तरफ घिसटते जाते थे। उनके अगल-बगल से क़रीब तीन हजार बच्चे हल्ला करते, धूल उड़ाते अपनी-अपनी कक्षाओं की तरफ जा रहे होते थे। पहली क्लास दस बजे से होती । उसके लिए बच्चों के पास पाँच मिनट का समय होता था। असेंबली मैदान उन पाँच मिनटों में धूल के विशाल बवंडर में तब्दील हो जाया करता।
स्टाफ रूम की बड़ी खिड़की से सटाकर लगाई गई, अपने आकार के हिसाब से अतिसूक्ष्म कुर्सी में वे किसी तरह अट जाते थे। खिड़की से बाहर बाजार का विहंगम दृश्य देखा जा सकता था। वे साथी अध्यापकों से बात नहीं करते थे। दुर्गादत्त मास्साब प्रिंसिपल के रिश्ते के मामा लगते थे इस वजह से उनसे बात करने की स्टाफ तो दूर ख़ुद प्रिंसिपल साहब की भी हिम्मत नहीं होती थी। उन्हें पहला पीरियड भी नहीं पढ़ाना होता था। अल्मारियों से अटेंडेंस रजिस्टर, किताबें, चॉक और डस्टर आदि जल्दी-जल्दी निकालने में व्यस्त अध्यापकों की तरफ उकताई-सी निगाह डालकर मास्साब उपन्यास में डूब जाते।
दुर्गादत्त मास्साब विज्ञान के मेरे पहले टीचर थे। कक्षा छह (अ) में क़रीब दो सौ बच्चे थे। क्लासरूम की दीवारें बहुत मैली थीं और टीन की उसकी छत तनिक नीची थी। ब्लैकबोर्ड के कोनों पर चिड़ियों की बीट के पुरातन डिजाइन उकेरे गए से लगते थे। बच्चे फर्श पर चीथड़ा दरियों पर बैठते थे। सामने डेस्क होती थी और डेस्क के एक कोने पर पीतल से बनी छोटी-सी दवात। हर सुबह कोई इन दवातों में स्याही भर जाता था। हमने कागज की गेंदें स्याही में डुबोकर एक-दूसरे पर फेंकने का खेल खेलना सीख लिया। छुट्टी के बाद जब घरों को जाते तो हमारी सफेद क़मीजों पर बड़े-बड़े नीले धब्बे पड़े होते।’’
उस दौर में जनता ने जन सहयोग से देश भर में इंटर कालेज स्तर के सैकड़ों विद्यालय बनाए। श्रमदान किया। भूमिदान किया। आर्थिक संसाधन मुहैया कराए। एक वर्णन उपन्यास से-
‘‘एस.पी. यानी सीताराम पूरणमल इंटर कॉलेज में मेरा पहला दिन था। होशियारी के चलते मैं चैथी से सीधा छठी में पहुँच गया था। पहली क्लास अँग्रेजी की थी। अटेंडेंस ली ही गई थी कि अँग्रेजी मास्साब को किसी ने बाहर बुला लिया। हमारी तरफ एक पल को भी देखे बगैर वह पूरे पीरियड भर अपने परिचित से बातें करते रहे। फिर घंटा बज गया। भीतर आकर अँग्रेजी मास्साब ने एक बार भी हमारी तरफ नहीं देखा और उपस्थिति रजिस्टर लेकर निकल गए। हम अगले मास्साब का इंतजार कर रहे थे।
भले ही लफत्तू का चरित्र बेहद आकर्षित करता है। लेकिन उपन्यासकार ने लाल सिंह को भी शानदार तरीके से प्रस्तुत किया है। वह भी पूरे उपन्यास में जब-तब सामने आता है। अशोक से छह-सात साल बड़ा। लेकिन उसी की क्लास में पढ़ने वाला। और भी रंग हैं लाल सिंह के इस उपन्यास में। फिलहाल इसे पढ़िएगा-
‘‘लाल सिंह हमारी क्लास की सबसे विलक्षण चीज था। पाँच या छह साल फेल हो चुकने के बाद वह तकरीबन अठारह का हो चुका था। उसकी मूँछें भी थीं। मेरे बड़े भाई जितना लंबा और अपनी तरह से प्यारा था। लंबाई और क्लास के हिसाब से अनफिट मूँछों पर आने वाली शर्म को छिपाने का प्रयास करता वह हमें तमाम मास्टरों के मजेदार किस्से और लतीफे सुनाता था। उसने बताया कि अपनी अस्तित्वहीन गरदन के कारण अँग्रेजी मास्साब को टोड कहा जाता था और पिचकी नाक वाले वाणिज्य मास्साब को पिच्चू । मैं पहले ही दिन से लाल सिंह को अपना सबसे पक्का दोस्त बनाने का मन बना चुका था।
‘‘आ गया, आ गया! भैंसा आ गया!‘‘ लाल सिंह की चेतावनी सुनते ही सबकी आँखें दरवाजे पर लग गईं। दुर्गादत्त मास्साब बिना किसी तरह की हड़बड़ी के क्लास में घुसे। उन्होंने लाल सिंह पर एक परिचित निगाह डाली।


कक्षा शांत हो गई। दुर्गादत्त मास्साब का आकार ही हमें डरा देने को पर्याप्त था। मिनट भर पहले लाल सिंह हमें उनके गुस्से के एक-दो किस्से सुना चुका था। वह तुरंत खड़ा हुआ और मास्साब के हाथ से रजिस्टर लेकर अटेंडेंस लेने लगा। मास्साब ने बेरुख़ी से हमारी ओर एक बार देखा और कोट की जेब में हाथ डालकर एक किताब बाहर निकाल ली। किताब का चमकीला कवर बहुत आकर्षक था। कद में छोटा होने के कारण मैं सबसे आगे की क़तार में बैठता था और उस जादुई किताब को साफ साफ देख सकता था। चेहरा एक तरफ को थोड़ा सा झुकाए कर्नल रंजीत की आँखें मुझ पर लगी थीं। उसने काले ओवरकोट के साथ काली हैट पहन रखी थी। तीखी मूछे ऊपर की तरफ खिंची हुई थीं और निगाहों में सवाल था। उसके एक हाथ में छोटा-सा रिवॉल्वर था। कर्नल का दूसरा हाथ एक अधनंगी लड़की की कमर पर था जो कर्नल से चिपकने का प्रयास कर रही थी। पृष्ठभूमि में लपटें उठ रही थीं। कवर के निचले हिस्से में एक लाश पड़ी थी और लाश की बगल में ख़ून से सना चालू।
ऐसा भी नहीं है कि उपन्यास की कथावस्तु विवरणात्मक लहज़े में आगे बढ़ती है। बहुत जगहों पर संवादात्मक लहज़ा शानदार ढंग से पाठकों को बांधे रखता है। आप भी पढ़िएगा-
कर्नल रंजीत के पास कोई दिव्य ताक़त थी कि वह एक साथ लड़की, लाश और मुझको पैनी निगाहों से देख सकता था। यह बेहद आकर्षक था। मैं सर्वशक्तिमान कर्नल रंजीत के कारनामों बारे में कल्पनाएँ कर रहा जब दुर्गादत्त मास्साब ने बोलना शुरू किया। अगले आदेश की प्रतीक्षा में लाल सिंह अब भी उनकी बगल में खड़ा था।
“मैं तुम लोगों को बिग्यान पढ़ाया करूँगा।‘‘
सबने विज्ञान की किताब निकाल ली। हमारी साँसें थमी हुई थीं। मास्साब ने पूछा, “कछुआ कितने बच्चों ने देखा है ?‘‘
कुछ हाथ हवा में उठे। किताब थामे हुए मास्साब सीट से उठे और अपना मैला कोट एक बार हल्के से झाड़ा। मेरी आँखें अब भी कवर से चिपकी हुई थीं।
‘‘तेरा नाम क्या है, बच्चे ?‘‘ वे मेरी तरफ देख रहे थे ।
चोरी पकड़े जाने के भय से मैं थप्पड़ का इंतजार करने लगा। नीची निगाहों से डेस्क को देखता हुआ मैं उठा, ‘‘मास्साब… मैं… ‘‘ “मास्साब मैं नाम हैगा तेरा ?‘‘
जीभ पत्थर की हो गई थी। मैं रोने-रोने को हो गया। उनका बड़ा-सा हाथ मेरे कंधे पर था, ‘‘तू वो खताड़ी वाले पाण्डेजी का लड़का है ना ?‘‘ मैंने हाँ में सिर हिलाया।
“सुना है कि तू भौत होशियार है। अब जे बता, तैने कछुआ देखा है कभी असली वाला जिंदा कछुआ ?‘
‘‘नई मास्साब।‘‘
‘‘बढ़िया। कोई बात नहीं। आज सारे बच्चे असली का कछुआ देखेंगे।‘‘ अपने कोट की बड़ी-सी जेब में हाथ डालकर उन्होंने पत्थर जैसी कोई गोल चीज बाहर निकाली।
“ये रहा कछुआ। असली जिंदा कछुआ। लो पाण्डेजी पकड़ो इसे‘‘ मास्साब द्वारा पाण्डेजी कहे जाने पर मुझे शर्म आई। काँपते हाथों से मैंने उस कड़ी चीज को पकड़ा।
‘अभी कछुआ सोया हुआ है। अगर उसे आराम से खुजाओगे तो ये तुम्हें ऽ अपनी शकल दिखाएगा। लाल सिंह, चलो पाण्डेजी की मदद करो। ‘‘
जरा भी देर किए बिना लाल सिंह ने मेरे हाथों से कछुआ थाम लिया। उसने एक अनुभवी उँगली को कछुए के किसी हिस्से में खुभाया तो कछुआ खोल से बाहर निकल आया। यह चमत्कार था। आगे की सीटों वाले बच्चे लाल सिंह के गिर्द इकट्ठा होने लगे थे।
“एक-एक करके लाल सिंह!‘‘ मास्साब वापस अपनी सीट पर जा चुके थे। उपन्यास पढ़ने में उन्हें किसी तरह का व्यवधान नहीं चाहिए था।
लाल सिंह ने डपटकर सारे बच्चों को सीट पर बिठा दिया और कछुआ मुझे थमाया। कछुआ वापस खोल में घुस चुका था। मैंने भी लाल सिंह की तरह उँगली घुसाने की कोशिश की पर कुछ नहीं हुआ।
‘अब तेरी बारी है।‘‘ कहकर लाल सिंह ने कछुआ मेरे साथ वाले बच्चे को पकड़ा दिया। शोर बढ़ता जा रहा था। पीछे की सीटों के बच्चे अधीर होकर बेक़ाबू हो गए थे। कछुआ उनकी पहुँच से दूर था सो उन्होंने आइस-पाइस खेलना चालू कर दिया। जब तक कि अगली क़तार के सारे बच्चों को कछुआ देख पाने का अवसर मिलता, घंटा फिर से बज गया। कछुआ मास्साब के सुपुर्द कर दिया गया।
कुर्सी से सश्रम उठते हुए मास्साब ने हमारी तरफ देखकर कहना चालू किया, ‘‘जिनका नंबर आज नहीं आया वो बच्चे कल कछुआ देखेंगे।‘‘ कक्षा से बाहर जाते हुए उन्होंने कुछ अस्पष्ट शब्द बुदबुदाए जो पिछली क़तारों के असंतुष्ट बच्चों के कोलाहल में डूब गए।
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उपन्यास में रामनगर के इस स्कूल का बेहद ही लचर वर्णन आया है। समूचा स्टाफ एक तरह का! स्वयं उपन्यासकार ने इस हवाले से यह बात दर्ज़ की है। यह हैरान करने वाली ठैरी-
‘‘सारे अन्य मास्टरों की तरह रविवर्मा चैहान मास्साब भी थे तो जल्लाद ही लेकिन उनकी कमेंट्री ने मुझे उनका दीवाना बना रखा था। छत पर क्रिकेट खेलते हुए रौ में आता तो मैं कहने लगता, ‘‘बंटू जोशी राइट आर्म राउंड द विकेट! बबलू पाण्डे एट द क्रीज। श्री स्लिप्स एंड टू गलीज।‘‘

लूडो निबटने के बाद जब बंटू और बागड़बिल्ला चले गए, लफत्तू ने मेरी दुखती रग छेड़ी, “कब जा ला तू नैनताल ?‘‘
कुछ संवाद और वर्णन बेहद शानदार,चुटीले, व्यंग्यात्मक और प्रभावकारी हैं। कुछ बानगी-
‘‘तू हिंदू हैगा। तेरे लिए फिरी!’’ उसने एक कुल्हड़ मेरी तरफ़ बढ़ाया और फुसफुसाकर बोली,‘‘सकीना हैगा मेरा नाम। सादी करेगा मुस्से?’’
‘‘पैते काटो अंकलजी औल अपना काम कलो।’’ लफत्तू ने हिका़रत और आत्मविश्वास का प्रदर्शन करते हुए अपनी आँखें फेर लीं।
‘‘बलबाद हो जागा इन थालों के चक्कल में बेते।’’
‘‘क्यों बे सुतरे,नकल की थी तैने?’’
काटो तो ख़ून नहीं। इसके पहले कि मैं रोने लगता, लफत्तू ने मित्रधर्म का निर्वाह किया और अपनी जगह पे खड़ा हो गया।
‘‘क्या है बे चोट्टे?’’ तिवारी मास्साब भी लफत्तू की ख्याति से अनजान नहीं थे।
‘‘मात्ताब मेले पलोस में रैता हैगा असोक और भौत होत्यार है।’’
‘‘होस्यार है तो बैठ जा। बीस में बीस लाया है सुतरा!’’
थाकिल में बैथ के कोइ तत्ती कैते कल पाएगा बेते!’’
‘‘बला लौंदियाबाज है थाला!’’
‘‘जो दल ग्या बेते वो मल गया।’’
पहले लफत्तू ‘मुगल-ए-आज़म’ से सीखा हुआ एक संवाद फेंकता, ‘‘माँबदौलत अब आलाम कलेंगे।’’ इसके बाद वह जाँघों को बदलकर हाथ से नृत्य चालू करने का इशारा करके मुझे आँख मारता और आदेश देता,‘‘मंतली मदला लाओ।’’
ऐसा नहीं है कि उपन्यास के केन्द्र में मात्र हास-परिहास ही है। कई जगह पर उपन्यास पाठकों को भावातिरेक की स्थिति में ला खड़ा कर देता है। पाठक जल्दी से आगे बढ़ता हुआ अपनी आशंका के बादल छाँट लेना चाहता है। खासकर लफत्तू के बीमार हो जाने पर। लाल सिंह के अशोक के नैनीताल जाने पर या अशोक का रामनगर न छोड़ जाने की छटपटाहट पर।
कुल मिलाकर पाठकों को एक पठनीय,यादगार और बचपन में लौट ले जाने वाला उपन्यास मिला है। बहुत ही सरल,सहज और कीमत भी पहुँच के भीतर। हाँ! उपन्यासकार कई जगहों पर अपनी वर्णनात्मक भाषा को और भी सरल कर सकते थे। कवर पेज थोड़ा और मोटा होता तो बढ़िया होता। धूप में यह गोल घूम जा रहा है। फोंट साइज ज़रा-सा और बढ़ा होता तो आनन्द आ जाता। कागज उम्दा है। छपाई भी शानदार है।


किताब: लपूझन्ना
विधा: उपन्यास
उपन्यासकार: अशोक पाण्डे
मूल्य: 199
पृष्ठ: 224
प्रकाशक: हिन्द युग्म
प्रस्तुति: मनोहर चमोली ‘मनु’
प्राप्ति स्रोत: [email protected]

वेबसाइट : www.hindyugm

प्रकाशन वर्ष: जनवरी 2022
प्रकाशक दूरभाष: 120 4374046

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