सासौ एक बालक है। वह अपने पिता के साथ बाज़ार जा रहा है। उसके पिता किसान है और फसल बेचने के लिए बाज़ार जाते हैं। सासौ तरबूज बेचने जब बाजार जा रहा होता है तो उसे शहर के दूसरी ओर एक लड़की दिखाई देती है। सासौ को वह लड़की अच्छी लगती है। सासौ समझता है कि लड़कियों को उपहार पसन्द होते हैं। वह उस प्यारी लड़की को उपहार देने की सोचता है।

वह दस तरबूज़ टोकरी पर जमाता है। टोकरी सिर पर रखकर लड़की को उपहार देने चल पड़ता है। रास्ता लम्बा है। सासौ थक गया है। तभी एक व्यापारी अपनी गाय के साथ वहां से गुजरता है। सासौ चार तरबूज़ के बदले गाय खरीद लेता है। लड़की को उपहार में देने के लिए छह तरबूज बचे हैं। वह यह सोचता है।

अब सिर पर टोकरी। टोकरी में छह तरबूज लेकर वह गाय के ऊपर बैठ जाता है। रास्ते में उसे लड़की का ख़याल आता रहता है। भरी दुपहरी गरमी में गाय थक जाती है। पस्त हो जाती है। एक ऊँट वाला वहाँ से गुजरता है। सासौ चार तरबूज़ के बदले ऊँट ले लेता है। उसके पास दो तरबूज़ बच जाते हैं।


कॉन्ताँ ग्रेबाँ कृत बरास्ता तरबूज़ जैसी कहानी मैंने पहले कभी नहीं पढ़ी। हिन्दी में अनूदित इस किताब के चित्र भी कॉन्ताँ के हैं। यह किताब अंग्रेज़ी में है। अनुवाद शिवनारायण गौर ने किया है। एकलव्य ने इसे प्रकाशित किया है। साल 2008 में प्रकाशित इस किताब को 2011 में हिन्दी में लाया गया। यह एक शानदार किताब है।


ऊँट के ऊपर गाय। गाय के ऊपर सासौ। सासौ के ऊपर टोकरी। टोकरी के ऊपर दो तरबूज़। गरमी में ऊँट भी पस्त हो जाता है। रास्ते में सासौ एक बूढ़ा हाथी एक तरबूज के बदले में खरीद लेता है। हाथी के ऊपर ऊँट। ऊँट के ऊपर गाय। गाय के ऊपर सासौ। सासौ के ऊपर टोकरी। टोकरी के ऊपर एक तरबूज़। लेकिन यह क्या! हाथी भी पस्त होकर जमीन पर लेट जाता है। अब सासौ क्या करेगा?


जी हाँ। यही कहानी नया मोड़ लेती है। सासौ अपनी पीठ पर हाथी को उठा लेता है। हाथी के ऊपर ऊँट। ऊँट के ऊपर गाय। गाय के ऊपर सासौ। सासौ के ऊपर टोकरी। टोकरी के ऊपर एक तरबूज़। सासौ ने इतनी कड़ी मेहनत कभी नहीं की। वह खुद थक जाता है। प्यासा है। वह खुद को रोक नहीं पाता और बचा एक तरबूज़ खा लेता है। अब वह कोई तरकीब सोचता है। लड़की को उपहार तो देना है। वह लड़की के घर का दरवाज़ा खटखटाता है। लड़की बाहर आती है। दोनों आमने सामने होते हैं। सासौ एक शब्द भी नहीं बोल पाता है। और अंत में…..।


जी हाँ ! अंत अकल्पनीय है। ख़याल से परे। इसके लिए किताब जरूर पढ़िएगा।


किताब: बरास्ता तरबूज़
लेखक: कॉन्ताँ ग्रेबाँ

अनुवाद: शिवनारायण गौर
मूल्य: 70
पेज: 28
प्रकाशक: एकलव्य
वेबसाइट : www.eklavya.in

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By manohar

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