कहानियाँ बाल मन की पुस्तक समीक्षा

कहानियाँ सभी को रोमांचित कर देती हैं। बमुश्किल ही कोई होगा जो उनकी रंगत से दूर हो। अलबत्ता बच्चों को तो कहानियाँ ज़्यादा ही रिझाती हैं। उनके मन के धागे अक्सर कहानियाँ बुनते रहते हैं। जटिल बातें भी वह कहानियों से समझ जाते हैं। ऐसी ही दिलचस्प कहानियों का संग्रह “कहानियाँ बाल मन की” किताब है। इस रचना के मुसन्निफ़ हैं मनोहर चमोली ‘मनु’ जी।

किताब का कवर ही दिलचस्पी बढ़ा देने वाला है। इस ज़ीनत का श्रेय जाता है अनुप्रिया जी को। 40 लाजवाब कहानियों की शोभा उन्होंने अपने चित्रांकन से बखूबी बड़ाई है। शब्दों की बनावट और आकृति पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। फलतः किताब आंखों को भी सुकून देने वाली है। श्वेतवर्णा प्रकाशन से 2021 में छपी यह किताब का आर्थिक मूल्य 250 रुपय है।

किताब की विषयवस्तु बेहद ही विविध है। सारी ही कहानियाँ सुगठित हैं। सलासत से रची ये कहानियाँ पाठक को तसव्वुर के जहान में गौते खाने पर मजबूर करती हैं। बच्चें ही नहीं, हर वर्ग के पाठक के लिए यह कहानियाँ मज़ेदार हैं। इन रचनाओं में रोमांच है, प्रहसन है और कई गहरे संदेश भी महफ़ूज़ हैं।

कहानियाँ अंतःविषय होती हैं। यह किताब इस बात की साक्ष्य है। किताबों की तहरीर कहानियों के माध्यम से बच्चों को आसानी से समझाई जा सकती है। महज़ कुछ चरित्रों के बीच गड़ा संवाद खाद्य शृंखला, गणित के विषय, विज्ञान के मुद्दे, प्राणियों के बीच संघर्ष, बदलती भोजन प्रणाली और कई सारे विषयों पर एक समझ पैदा कर रहा है।

यह रचनाएँ पाठकों के लिए सोचने का अवसर छोड़ रही हैं। नैतिकता की ज़मीन को छोड़ यह वास्तविकता के धरातल पर अधिक केंद्रित हैं। समाज में रहकर बच्चें भी सामाजिक स्वभाव के आदि हो जाते हैं। ईष्या, लालच की भावना, वर्चस्व की चाह जैसी भावनाओं को भी कहानियों में ज्यों-का-त्यों डाला गया है। आदर्श स्थापित करने की जगह स्वभाविक चीज़ों को वैसा ही रखा गया है। ये रचनाएं पाठक को परिकल्पना और पात्र से जुड़ाव महसूस करवा रहीं हैं।

संग्रह की कुछ कहानियाँ छोटी-छोटी रोजमर्रा की घटनाओं पर भी आधारित हैं। जिन पर अक्सर हम ध्यान भी नहीं दिया करते। बेहद ही छोटे वाक्यों से कहानी गड़ी गयी है। सरल से शब्दों का चयन किया गया है। छोटी-छोटी चीज़ों का ख़्याल रखा गया है। पात्रों के नाम की विविधता भी क़ाबिल-ए-ग़ौर है। संग्रह की एक कहानी “इंटरवल” इसका अच्छा उदाहरण है।

कहानियों के शीर्षकों को बड़ा ही सटीक चुना गया है। शीर्षक कौतूहल पैदा कर रहे हैं। नाम से ही कहानियाँ रुचिकर प्रतीत हो रही हैं। दो-तीन पन्नो से चार-पांच पन्नों की कहानियाँ लेखक की गहरी समझ का दर्पण हैं। बच्चों के मासूम सवालों को भी जगह दी गई है। कल्पनाओं के क्षितिज को छुने के साथ वैज्ञानिक तथ्यों का बेहतरीन समन्वय बैठाया गया है। नवाचार के खाद-पानी से यह कहानियाँ सींची गई हैं।

संग्रह की पहली कहानी “छोड़ दिया फुदकना” ही एक लाज़वाब शुरुआत है। यह कहानी कल्पना के आसमाँ में पाठक को पहुंचा देती है। मज़े-मज़े में “एक से एक हज़ार एक” कहानी बच्चों में गिनती और रुपए की समझ पैदा करती है। साथ ही हर उस छोटी सी छोटी चीज़ के महत्व को समझाती है जिसका अस्तित्व बड़ी चीज़ों के सामने नगण्य मान लिया जाता है। प्रकृति के सामंजस्य और हर प्राणी के महत्व पर “ज़रूरी हैं सब” कहानी रची गयी है। “अनुभवों का स्कूल” वर्तमान शिक्षा तंत्र की प्रतिस्पर्धा केंद्रित मानसिकता की ओर प्रकाश डालता है। स्कूल किस तरह एक ही साइज का जूता हर शिक्षार्थी को पहनाने की जद्दोजहद करता है यह भी इस कहानी में बख़ूबी दर्शाया है।

“खाना मगर ध्यान से” कहानी बड़ी ही संजीदगी से खाने-पीने में सावधानी बरतने की जानकारी देती है। “भूत था क्या” कहानी भ्रम और वास्विकता के बीच की पतली परत को बड़ी ही खूबसूरती से अलग करती है। “टॉफी के बदले” कहानी लेखक की बुद्धि तत्परता को दर्शाती है। कहानी की परिकल्पना बेहतरीन है। हर कहानी मज़ेदार है। कल्पना और सीखने के नए अर्ज़-ओ-तूल तक पाठकों को पहुँचा रही है।

यह कहानियाँ आसानी से कितना कुछ सिखा रही हैं! इन्हें पढ़ कर एक ही ख़्याल आ रहा है कि अगर हमारी तालीम में भी ऐसी ही कहानियों का तड़का लगाया जाए तो इल्म हासिल करना कितना रुचिकर हो जाए।

-कृति अटवाल (11वीं)
-नानकमत्ता पब्लिक स्कूल ,
ऊधम सिंह नगर ।

कहानियाँबालमनकी

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