वीणा जैन कृत एक उत्सव: एक महोत्सव

‘रात भर सुबह को उडीकती रही’ ने चौंकाया। याद आया कि यह उडीकना शब्द कहीं न कहीं तो पहले पढ़ा है। याद ही नहीं आया। हालांकि कविता सन्दर्भ के साथ पढ़ते हुए इस शब्द का अर्थ स्वतः ही दे रही थी। फिर भी मालूमात की तो यह पहाड़ के हेरने, जग्वाल या बाट जोहने के समकक्ष का शब्द लगा। कवि घनानंद कृत ‘अभी-अभी थारी बाँट उड़ीकाँ थाँ बिन बिरहा अधिक सतावै।’ इसी तरह रही उड़ीक द्वारा पर मैं हूँ अंत घड़ी जीवन की, पूर्ण करो हे नाथ ! शेष है एक साध दर्शन की’ में भी इस शब्द का वर्णन मिलता है। राजस्थान का यह शब्द प्रतीक्षा करना का पर्याय ही है।
बहरहाल, इसी एक शब्द ने मुझे वीणा जैन की कविताएँ पढ़ने को बाध्य किया। बात आगे बढ़ाने से पहले आप भी इस कविता ‘उजालों के ठिकाने’ को पढ़ना चाहेंगे-


रात भर
सुबह को उडीकती रही।

जब-जब जुगनू
गुजरे बगल से
उजालों के ठिकाने पूछती रही
…रात भर सुबह को उडीकती रही।
आते सपने
जाते रहे
सपनों से बातें…
मैं करती रही… यादें मुझे तड़पाती रही
रात भर सुबह को उडीकती रही।

आँखों में अंधेरे समाते रहे
कैसै-कैसे साये उभरते रहे, और डराते रहे
मैं अनमनी-सी डरती रही
….रात भर सुबह को उडीकती रही।

दो-चार सितारे
खिड़की से जो देखती
मैं उन्हें बुलाती,
‘कुछ जादू करें, कि
करिश्माई उजालों में
तुम खो जाओ’, यूँ कहती रही
…..रात भर सुबह को उडीकती रही।
जानती हूँ
सुबह होगी जरूर !!
बीत ही जायेगी…
ये अपने में सहज रातें
ये सपनों-सी सरल रातें
मगर, ये लम्बी-लम्बी रातें
मुश्किल होती जिन्दगी और दर्दभरे जगराते !!
मैं सोते-जागते …बस यूँ ही,
…रात भर सुबह को उडीकती रही।

रातों का यूँ मुस्कुराना
अंधेरों का मुझ पर हँस पड़ना दृ
..मैं क्या करती

मैं चाँद से रोशनी माँगती रही
मैं तारों का हास पीती रही
मैं जुगनुओं से बतियाती रही
और विस्मित-सी
…रात भर सुबह को उडीकती रही


इस कविता को पढ़ने के उपरांत जे़हन में किसी कवयित्री की शैली और भाव टकराने लगे। लेकिन कोई सिरा या बोध पकड़ में नहीं आ रहा था।
संग्रह की एक अन्य कविता ने ध्यान खींचा। संग्रह की दूसरी कविता यह है जिसने मेरा ध्यान आकर्षित किया। इसे दो बार पढ़ने पर भाव-अर्थ भी भिन्न-भिन्न महसूस हुए। आपकी आप जानें-


क्या स्त्री थकती नहीं…?

हुगली के चौड़े पाट पर खड़े
मैंने सोचा था, कभी-
क्यूँ मजबूर है नदी बहने के लिए
जबकि यहाँ विश्राम करना चाहती है नदी…
वर्ष बीते,
निरन्तर बहती जिन्दगी की दारुण थकान के साथ…
एक बार फिर रूबरू हूँ हुगली से…
नदी ने मुझसे पूछा-
‘विश्राम करना चाहोगी?’
‘न’ सहसा, बोल पड़ी मैं !!
पता नहीं, विश्राम की बात
कभी नदी के मन में आयी भी होगी या नहीं…
नदी भी तो स्त्री है
मेरी तरह…
क्या स्त्री थकती नहीं?

इस कविता को पढ़ते हुए सोच रहा था कि कवयित्री ने नदी को स्त्री क्यों कहा होगा?
मैं कवयित्री की सोच और विस्तार की थाह लेने की कोशिश में था कि कविता
‘केदारनाथ के आँसू…’ पर दृष्टि ठहर गई।
हुगली की बात करते-करते कोई मन्दाकिनी की बात करने लगे तो चौंकना स्वाभाविक है। पहले आप भी इस कविता का आनन्द लीजिएगा।

पहले तो कभी
न उफनी थी यूँ … मन्दाकिनी !!
ये कैसा सैलाब था, इस बार
कि समूचा आस-पास बहा कर ले गया
और तुम अवश…
खड़े देखते रहे, केदारनाथ?
गिरते घर,
डूबते गाँव,
टूटते पहाड़
चीखते-चिल्लाते,
रोते-बिलखते लोग
तूफान, बारिश, घनघोर गर्जन, कड़कती बिजलियाँ
और एक भयभीत करते सन्नाटे के बीच
मौत का भयानक मंजर… और फिर-
फूली लाशों पर मंडराते बाज-
अपनों को खोजती डबडबायी आँखें
मन्दाकिनी सी इक नदी…
आँसुओं की नदी…
बही थी न, उस दिन
तुम्हारी आँखों से भी तो…
कहो ‘केदारनाथ’!


इस कविता को पढ़ते हुए मुझे 16 जून 2013 याद आ जाता है। उत्तराखण्ड में बादल फटने से आई विनाशकारी बाढ़ ने कई शहरों और गांवों को तबाह कर दिया था। इस बाढ़ में हज़ारों की संख्या में लोग बह गए थे। आज भी कई श्रद्धालुओं की शिकायत है कि उनके परिजनों के शव नहीं मिले। संभवतः कवयित्री उस दौरान यात्रा पर यहाँ आई हो। या उनके परिजन आए हों। या यह भी संभव है कि इस आपदा ने उनके मन को व्यथित-हतप्रभ किया हो।


बहरहाल, केदारनाथ उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग जिले का हिस्सा है। यह समुद्रतल से 3584 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। केदारनाथ चार धाम में एक है। श्रद्धालू जिन बारह ज्योतिर्लिंगों को मानते हैं उनमें केदारनाथ सबसे ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ मंदिर के निकट ही मंदाकिनी बहती है। केदारनाथ लगभग एक हजार साल पुराना मंदिर है। बताते हैं कि आदि शंकराचार्य ने चार धाम की स्थापना के बाद बत्तीस साल की उम्र में ही इसी स्थान पर समाधि ली थी।
इस कविता को पढ़ने के बाद भी मैं उस कवयित्री तक नहीं पहुँच पा रहा था, जिसकी लय,भाव, बोध और अहसासात मुझे इन कविताओं में दिखाई दे रहे थे।


अब ‘सोच रही अनमनी धनिया’ कविता ने अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर लिया। पहले यह कविता-

वो दीप जला कर
बैठी थी…
और तेल चुकने वाला था।।

बीत गयी थी
आधी रात…
और, घर आया नहीं अभी, बुधिया…

मंद हुआ
पटाखों का शोर, और
कुंद हो चली थी
रोशनी…

इधर, ठण्डा चूल्हा-
खाली कनस्तर-
लुढ़के बर्तन
गालों पर सूखे आँसू…
रोते-रोते सो गये थे, भूखे बच्चे-
पूछ रहे थे बाबा कब आयेंगे, माई?

घुप्प अंधेरा
और बुझता दीया
मुँह चिढ़ा रहे थे धनिया का…
कि आज अमावसी रात, रे…!!

तोड़ देता
मिठाई का वादा…
भले न लाता
पटाखों का पुलिंदा…
अरे, लौट तो आता
जल्दी घर…
सोच रही थी, अनमनी धनिया…
कि आज दीपावली की रात, रे…!!

वो दीप जला कर बैठी थी,
और तेल चुकने वाला था।

वीणा जैन कृत ‘एक उत्सव: एक महोत्सव’ कविता संग्रह कलमकार मंच ने प्रकाशित किया है। वीणा जैन का यह सातवाँ कविता संग्रह है। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ अक्सर प्रकाशित होती रहती हैं। दिलचस्प बात यह है कि वह चित्रकार भी हैं। तैलचित्रों में उन्हें महारत हासिल है। उनकी एकल प्रदर्शनी कोलकाता और विशाखापत्तनम जैसे शहरों में लग चुकी हैं।
एक उत्सव: एक महोत्सव में अस्सी कविताएँ हैं। किताब सादगी से छपी है। आवरण शानदार है लेकिन यकायक लुभाता नहीं। पुस्तक का शीर्षक अच्छे फोंट में नहीं है। आवरण कुंवर रवीन्द्र ने बनाया है। वह शानदार है लेकिन ले आउट में और शीर्षक के डिम और ठीक से संयोजित करने से वह भी लुभाता-सा नहीं लगता। प्रत्येक कविता नए पेज से आरम्भ होती है। यह अच्छी बात है। लेकिन कविताओं का क्रम रखने में कोई विचार नहीं दिखाई देता। एक पेज पर समाप्त होती कविताओं को पहले रखा जा सकता था। फोंट बहुत ही छोटा है। कविता समाप्त होने के बाद बहुत सा स्थान खाली है। कुछ चित्र बनाए जा सकते थे। इन दिनों आँखों को भाने वाले और ज़्यादा जोर न देने वाले फोंट आए हुए हैं। पता नहीं प्रकाशक ने इस ओर क्यों कर ध्यान नहीं दिया।


कशमीरी कवयित्री जिन्हें ललद्यद, लल्लद या लल्लेश्वरी आदि नामों से भी जाना जाता है। 1320-1391 की कवयित्री का लेखन कालान्तर में सामने आया। भले ही उनका काव्य अध्यात्म, धर्म और भक्ति से जोड़कर अधिक देखा गया हो। लेकिन मुझे ललद्यद की रचनाओं में अच्छा-खासा द्वंद्व नज़र आता है। पूरा दर्शन नज़र आता है। मनुष्य बनने की यात्रा और सहज स्वीकारोक्ति भी नज़र आती है। अपने अनुभवों से जीवन की सूक्ष्म पड़ताल करने वाली ललद्यद के भाव-बोध मुझे वीणा जैन की कविता में नज़र आते है। मेरे मन्तव्य को हू-ब-हू या नकल नहीं समझा जाना चाहिए।

चौदहवीं शताब्दी में कश्मीर में जन्मी ललद्यद पहली शैव योगिनी कवयित्री मानी जाती हैं। उनकी रचनाओं में मीरा जैसी दीवानगी है। वे जहाँ अपने शंकर के लिए भटकती-सी मालूम होती हैं। वहीं वह कबीर की तरह कर्मकांड, व्रत-उपवास को नकारती भी हैं। ललद्यद सांप्रदायिक भेद में विश्वास नहीं करती थीं। हिन्दू-मुस्लमान सभी उन्हें अपना मानते थे। जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को वह काव्य में साधती थीं।

ललद्यद के कुछ वाख यह हैं-


यि क्याह आसिथ यि कुस रंग गोम,
बैरंग करिथ गोम लग कमि शाठय ।
तालव राजदानि अबख छान प्योम,
जान गोम जान्यम पन नुय पान ।।
साहेब छु बिहिथ पानय वानस,
सारिय मंगान केंछाह दि ।
रोंट नो कांसि हुंद राछय नो वानस ।
यि चे गछिय ति पानय नि ।।
चिदा नंदस ग्यान प्रकाशस,
यिमव च्यून तिम जीवत्य मौखत ।
विशेमिस समसारनिस पाश्यस,
अबोध गड़ाह शेत्य शेत्य दित्य ।।
जल हा मालि लूसुय न पकान-पकान,
सिरयि लूसुय न वोलगान सुमीर ।
चन्द्रम लूसुय न मरान त ज्यवान,
मनुष्य लूसुय न करान न्यंध्या ।।


बहरहाल, मुझे वीणा जैन की यह कविताएँ बार-बार पढ़नी होंगी। कुछ कविताएं शायद मेरी समझ के स्तर से ज़्यादा ध्यान चाहती हैं। यह भी संभव है कि कवयित्री जीवन के कई पड़ाव पार कर चुकी हैं। वह मात्र उनके अनुभवों का सपाट बयान थोड़े हैं। कविता की लय, वजन और उसकी थाह के लिए पाठक की क्षमता भी अहम् होती है।
इस संग्रह की भूमिका मुंबई के प्रद्योत पंडित ने लिखी है। उदयपुर के संचय जैन किताब के अध्येता पाठक हैं।


किताब – एक उत्सव: एक महोत्सव
विधा – कविता
रचनाकार – वीणा जैन
प्रकाशक – कलमकार मंच
मूल्य- 170 रुपए
पेज संख्या- 128
आवरण-कुंवर रवीन्द्र
संस्करण वर्ष – 2022
कवयित्री सम्पर्क- veenajainvrinda@gmail.com

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By manohar

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