By manohar Oct 20, 2023

तिरासी वर्षीय भाषा के जानकार, शिक्षक, नाटककार, स्तम्भकार, ब्लॉगर, यू ट्यूबर सुरेश पंत की किताब सितम्बर 2023 में आई है। किताब का नाम है-‘भाषा के बहाने’.
यह हिन्दुस्तानी भाषा पर किताब है। कहूँ तो यह किसी कुएँ या तालाब की सीमित व्याख्या नहीं है। यह तो किसी बहती नदी की असीमित व्याख्या है। ऐसी विपुल व्याख्या जो निर्णय नहीं सुनाती एक पक्षीय सूत्र नहीं थोपती। यह किताब तो भाषाई झरने की फुहारों के सौन्दर्य की कुछ बूंदें लेकर आई हैं।
एक नदी से अस्सी बूंदों की ठंडक ऐसी कि पाठक जल और पानी के फ़र्क को महसूस करेगा। किताब भाषिक आधार के साथ-साथ शब्दों के प्रचलन और स्वीकार्यता पर भी बेहद बातूनी ढंग से पाठक को तार्किकता प्रदान करती है।
पाठक इस बात पर माथापच्ची ज़रूर करने लगता है कि अपने पिता को बाप कह सकते हैं या नहीं? बरसाती गदेरे के पानी को जल कहना उचित होगा? यदि नवरात्र और नवरात्रि दोनों ठीक हैं तो यह स्वीकार करने के पीछे तर्क क्या हैं। क्यों भाइयों, बहनों, साथियों कहना और लिखना हिंदी व्याकरण के हिसाब से गलत है। गाँधी पढ़ते रहें और गांधी लिखते रहें। यह खुलासा भी यह किताब करती है।
सुरेश पंत मन पढ़ना जानते हैं। जानते हैं कि लंबे-लंबे अध्याय पाठक नहीं पढ़ते। अधिकतर सामग्री एक या दो पेज की हैं। बमुश्किल विचारोत्तेजक प्रकरण ही दो पेज से अधिक गया है। सुरेश पंत समाचार पत्रों-पत्रिकाओं में स्तम्भ लिखते रहे हैं जो उस दौर में भी खू़ब पढ़े गए। लॉक डाउन के दौरान तो उनके आलेख, भाषा की बारीकियों की नकल करते हुए सैकड़ों यू ट्यूबर बन गए।
किताब में शामिल मिश्रित प्रकरणों में कुछ शीर्षक आप भी पढ़िए-अइयो, अज्ञ बने विशेषज्ञ, अपशब्द और जातीय गालियाँ, आधुनिक भारतीय भाषाओं में नपुंसकलिंग, आप ‘ढ’ तो नहीं हैं, इंगे हस्तिनापुर, उंगे चेन्नई, इनने-उनने, उत्तराखंड की भाषाएँ और मानकीकरण, उर्दू और हिंदी-अद्वैत में द्वैत, उल्लू सीधा करना, कचहरी, काश केदारनाथ, किसान आंदोलन के शब्द, कुछ कहावत कथाएँ, कुमाउँनी में वर्षा से संबंधित अभिव्यक्तियाँ, कुलथी और रस-भात, कौनो ठगवा नगरिया लूटल हो क्या हम नकसुरे हो रहे हैं, खसम चर्चा, गङ् गंगा, गाड,़ गाली चर्चा, गिलास के बहाने, गुमानी को याद करते हुए, गू , गुएन और पू , गोरखधंधा के बहाने, घुट्टी की बात, चीनी – मिसरी की कथा, चुनावी मौसम की कुछ अभिव्यक्तियाँ, चौधरी जी की बात, जल और पानी, जेठ और जेठजी के बहाने, ठुल्ला के बहाने डबल रोटी और सैंडविच, तमिलनाडु में हिंदी विरोध: कुछ तथ्य, तरबूज का हिंद संबंध, थाली और ताली, दंगा परिवार के सदस्य, दारूहल्दी बनाम किल्मोड़ा, दूध दुहने वाली दुहिता, देसी शब्दों को लीलती अंग्रेजी, दोहद का औरंगजेब कनेक्शन, धोबी का कुत्ता, नवरात्र और नवरात्रि, फागुन के बहाने रंग चर्चा, फाड़ना के बहाने, बंकिम और बाँका, बम पुलिस, बहादुर नौकर-चाकर, बाप है पिता, बेवड़ा कौन, भाषा को मोदी जी का योगदान, भूत चर्चा, मटकी के बहाने, मटरगश्ती के बहाने, मँडुवाडीह के बहाने, मिर्च का स्वाद, मीडिया: आलोचना और आत्मावलोकन, मीडिया की भाषा, मुकेश और ऋषिकेश, मुट्ठी, पौस, अंजुरी, यज्ञ से जश्न, राष्ट्रपति के बहाने, रोजगारपरक शिक्षा का माध्यम हिंदी, लक्ष्मी जी की घर वापसी, लोक भाषाओं में वैज्ञानिक संकल्पनाएँ, वीर, वीरांगना और वीर पत्नी, शहीदों के बहाने, शाल-दुशाला, सत्य और स्वप्न, समीप: जल से निकट तक, सरग माथा या सगर माथा, हाट और हड़ताल, हिंदी उच्चारण की विशेषताए,ँ हिंदी की बिंदी और गांधी, हिंदी: प्रश्न और प्रतिप्रश्न, हिंदी में शुद्धीकरण, हिंदी विरोध की रस्म, हिंदी विरोध पहले भी, हिंदी सीखते तमिल भाषियों की भूलें के साथ ही संधि: हिंदी की अपनी संधि।
भाषा के जानकार कभी किसी एक भाषा के भक्त नहीं होते। वह स्वभाव से हठी भी नहीं होते। भाषा के बहाने सुरेश पंत संस्कृत के गहन अध्येता है। उसके प्रति उनका विशेष लगाव दिखाई भी देता है लेकिन वह आम बोलचाल के शब्दों की उत्पत्ति और उनका सटीक,प्रचलित अर्थ बताने के लिए अमूमन संस्कृत का सहारा लेते हैं। यह ठीक भी है। लेकिन ऐसा नहीं है कि वह पाठक को संस्कृत और हिन्दी की विकेट के बीच में ही खिलाते हैं। विविध भारतीय भाषाओं और विदेशी भाषाओं से भरे मैदान में वह भाषाई खेल में पाठक को खेलने के लिए आमंत्रित करते हैं। यह उदारमन अनुभव से आता है।
संभव है कि अब तक लिखी गई बात एक पक्षीय सराहना समझी जा सकती है। लेकिन किताब के प्रति तटस्थ भाव बने इसके लिए सीधे किताब के कुछ अंश यहाँ देना समीचीन होगा।
एक अंश-
आप ‘ढ’ तो नहीं हैं
पिछले कुछ दिनों से मैंने देश की उर्वरा माटी में जन्मे, प्रायः अज्ञात व्युत्पत्तिक लोक शब्दों का संग्रह प्रारंभ किया जो मूर्ख/मंदबुद्धि के पर्यायवाची शब्द हैं। आश्चर्य हुआ कि हिंदी क्षेत्र की और उससे लगी हुई कुछ भाषाओं की लोक शब्दावली में सौ से अधिक ऐसे शब्द आज भी प्रचलित हैं !
इस संग्रह में से अभी केवल एक शब्द की चर्चा करूँगा जो एकाक्षरी है और मुख्यतः मराठी में और गौणतः गुजराती, कोंकणी, कन्नड़ तथा राजस्थान की एक-दो बोलियों में उपस्थित है।
शब्द है ‘ढ’। ढ का अर्थ है मूर्ख, बौड़म, मूर्खतापूर्ण हठ करने वाला। ‘ढ’ नाम से गुजराती में एक फिल्म भी है जो विशेषकर स्कूली बच्चों को लेकर बनी है।)
प्रश्न यह है कि यह एकाक्षरी शब्द मूर्ख या मानसिक रूप से विकलांग के अर्थ में कैसे रूढ़ हो गया! बड़ी रोचक कहानी है।
ध्यान देने योग्य बात है कि देवनागरी वर्णमाला में यह अकेला वर्ण है जो 5000 ईसा पूर्व ब्राह्मी लिपि से लेकर आज की देवनागरी लिपि तक उसी रूप में विद्यमान है, जबकि अन्य सभी वर्ण ब्राह्मी से देवनागरी तक पहुँचते-पहुँचते अनेक बार अपना रूप-आकार बदल चुके हैं। निष्कर्ष यह कि जैसे ष्ढष् के स्वरूप में पिछले सात हजार वर्ष के इतिहास में कोई अंतर नहीं आया, ऐसे ही कुछ व्यक्ति होते हैं जो किसी भी हाल में अपनी मूर्खता नहीं त्यागते । वे सचमुच ‘‘ढ’’ कहलाने योग्य हैं।
आप समझ रहे हैं तो निश्चित है आप ढ नहीं हैं !

एक और अंश-

‘इन्होंने’, ‘उन्होंने’ बोला जाने लगा जो प्रचलन में अब रूढ़ हो गया है।
मीर, गालिब आदि की उर्दू शायरी में भी ‘उनने’ का प्रयोग प्रायः दिखाई पड़ता है जो पुरानी ‘भाखा’, खड़ीबोली में इन रूपों के होने का प्रमाण है।
‘मीर’ के दीन-ओ-मजहब को अब पूछते क्या हो
उनने तो क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया’’

इस प्रकार इन्होंने-उन्होंने का ‘-हों’ अनाहूत अतिथि-सा लगता है। यह न रहे तो सीधे ‘इनने’, ‘उनने’ सिद्ध है। खड़ी बोली सहित कुछ बोलियों में इनने- उनने आज भी प्रचलित है। इसका आशय यह भी नहीं लिया जाना चाहिए कि अब इन्होंने/उन्होंने को हटाकर उसके स्थान पर इनने/उनने स्वीकार कर लिया जाए। व्याकरणिक नियमों से अधिक महत्त्वपूर्ण है लोक स्वीकृति, जो उन्होंने/इन्होंने को मिली हुई है और अतिरिक्त बल यह भी कि इन्हें मानक हिंदी में स्वीकार कर लिया गया है। भाषा का रथ निरंतर अग्रगामी होता है।
एक अंश और इसी किताब से-
एक गैर सरकारी आकलन के अनुसार मातृभाषा के स्तर पर उर्दू बोलने वालों की संख्या नीचे दी जा रही है, किंतु यहाँ यह भी ध्यान में रखना होगा कि इनमें से अधिकांश लोग हिंदी भाषी भी होंगे जिन्हें आँकड़ों में पहचानना दूध में पानी को पहचानना है।
6.81 करोड़ भारत
1.87 करोड़ पाकिस्तान
6.5 लाख बांग्लादेश
6 लाख संयुक्त अरब अमीरात
4 लाख ब्रिटेन
3.82 सऊदी अरब
80895 कनाडा
15000 क़तर
15000 फ्रांस
पाकिस्तान की राजभाषा उर्दू है किंतु इसके लिए भारत से विस्थापित उर्दू भाषी मुहाजिर (शरणार्थी) कारण नहीं हैं। विस्थापित तो आज भी वहाँ मुहाजिर ही हैं और नफरत से देखे जाते हैं। मुहाजिरों में 70 प्रतिशत से अधिक आबादी तो उत्तर प्रदेश वालों की ही है। इसलिए वहाँ सभी विस्थापितों को श्यूपी वालाश् भी कहा जाता है, जो पाकिस्तान में एक नस्लीय गाली है। जिन्हें गाली दी जाती हो उनकी भाषा को वे राजभाषा क्यों बनाने लगे। बात कुछ और थी। पाकिस्तान में तो आज भी उर्दू भाषी कुल आबादी के आठ प्रतिशत से भी कम हैं।

भेद बुद्धि के लोग भाषा को मजहब से जोड़ देते हैं, जैसे हिंदी एक धर्म की, उर्दू दूसरे मजहब की। अंग्रेजी को थर्ड रिलीजन की नहीं कहते, क्योंकि उसके बिना काम नहीं चलता। ऐसा होने लगे तो उसका भी कबूतर खाना तय है।

हैरानी होती है कि हम शुद्ध हिंदी की बात तो करते हैं लेकिन यह हिंदी शब्द उन अर्थों में शुद्ध नहीं है यानी देवभाषा संस्कृत से व्युत्पन्न नहीं है। आक्रामकों के साथ आई फारसी भाषा का है। सिंध उनके लिए हिंद था और हिंद पार की प्रत्येक वस्तु के लिए संकेतक, विशेषण था ‘हिंदी’। संस्कृत भी हिंदी थी, सिंध पार के निवासी भी हिंदी थे। बाद में हिंद की भाषा हो गई हिंदवी। अमीर खुसरो, जिन्हें हिंदी और उर्दू वाले दोनों ही अपना कहते हैं, वे इसे हिंदवी या भाखा ही कहते थे। भाखा से याद आया। यह भाषा ही भाखा कहलाया। हमें याद है गीता, महाभारत आदि संस्कृत की पुरानी पुस्तकों में भी भाखा-टीका होती थी या भाषा टीका।
पुस्तक से ही-

प्रायः स्वतःस्फूर्त हो जैसे स्वतंत्रता आंदोलन, चिपको आंदोलन, असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन इत्यादि। आंदोलन असंतोष व्यक्त करने के लिए, परिवर्तन या बदलाव के लिए, व्यवस्था में सुधार के लिए, किसी बात के सामूहिक विरोध के लिए हो सकता है किंतु आवश्यक नहीं है कि वह विद्रोह लिए हुए भी हो। किसी विशेष लक्ष्य के लिए किए जा रहे कार्यों की पूरी शृंखला आंदोलन के अंतर्गत आ सकती है।

किसान आंदोलन के संदर्भ में एक और शब्द प्रासंगिक है-खेती। यह आंदोलन भी इसी खेती को लेकर है, इसलिए इस शब्द की चर्चा भी लगे हाथ कर ली जाए। खेती शब्द का सीधा जुड़ाव खेत से है जो संस्कृत के क्षेत्र शब्द का तद्भव है। क्षेत्र शब्द के अनेक अर्थ है- मिट्टी, अधिकार क्षेत्र, इलाका, फार्म लैंड इत्यादि। इस क्षेत्र से बने खेत शब्द के चार प्रमुख अर्थ हैं- कृषि के काम में लाई जाने वाली भूमि मुख्य रूप से खेत कही जाती है। खेतों में फसल बोई-बटोरी जाती है। खेत का दूसरा अर्थ फसल भी है जैसेरू हमें खेत काटने हैं। आवारा पशु खेत खा गए। चिड़िया चुग गई खेत। कहीं-कहीं नस्ल या वंश के लिए भी खेत शब्द का प्रयोग होता है। जैसे: अच्छे खेत का घोड़ा, अच्छे खेत का साँड ।

खेत शब्द का संबंध युद्ध भूमि या रणभूमि से भी है। जैसे जब हम कहते हैं: वीर सैनिक बहादुरी से लड़े और कुछ घायल हो गए तथा कुछ ‘खेत रहे’। हम ‘खेत रहे’ सैनिकों को शहीद भी कहते हैं।

खेत से ही बना है खेती, जो कृषि का पर्याय है। खेत में पैदा की जाने वाली सभी वस्तुओं के लिए खेती शब्द प्रयुक्त होता है। अनाज, दलहन, तिलहन, गन्ना, फल, फूल, सब्जियाँ यहाँ तक कि पेड़, घास, ओषधियाँ आदि यत्नपूर्वक खेत में उगाई जाने वाली सभी वस्तुएँ खेती के अंतर्गत आ सकती हैं किंतु मुख्यतः अनाज सब्जियाँ आदि प्रमुख उत्पादों को ही गिना जाता है।
भाषा के प्रवाह के लिए एक अंश और पढ़िएगा-
कौनो ठगवा नगरिया लूटल हो

हिंदी, उर्दू में एक शब्द है ठग, जो अब अंग्रेजी में भी अपना स्थान बना चुका है। ठग शब्द को संस्कृत की स्थग् धातु से निष्पन्न माना जाता है। स्थग् से विशेषण बनता है स्थग, जिसका अर्थ है जालसाज, धूर्त, बेईमान, छली निर्लज्ज ( थ्तंनकनसमदजए कपेीवदमेजए ं तवहनमए ं बीमंज)। ठग शब्द सुनते ही लोगों के दिमाग में चालाक और मक्कार आदमी की तस्वीर उभरती है जो झाँसा देकर कुछ कीमती सामान ठग लेता है। शब्द रत्नावली के अनुसार ‘‘धूर्तो स्थगश्च निर्लज्जः पटुः पाटविकोऽपि च।।’’

व्युत्पत्ति की दृष्टि से स्थगन, स्थगित शब्द भी इसी ‘ठग’ के भाई-बंधु हैं। ठगी, धोखाधड़ी, लूटपाट, हत्या जैसे काम करना ही ठगों का पारंपरिक व्यवसाय रहा है। इनकी विशेष कार्य स्थली गंगा-यमुना का दोआबा माना जाता था, किन्तु अन्यत्र भी इनकी धूम रही है। अंग्रेजों के जमाने में भी इनको जरायमपेशा (अपराध वृत्ति के) माना जाता था। भारत में 19वीं सदी में जिन ठगों से अंग्रेजों का पाला पड़ा था, वे कोई मामूली लोग नहीं । ठगों के बारे में सबसे दिलचस्प और प्रामाणिक जानकारी 1839 में छपी पुलिस सुपरिटेंडेंट फिलिप मीडो टेलर की पुस्तक ‘कनफेशंस ऑफ ए ठग’ से मिलती है जो ठगों के एक सरदार आमिर अली खां का ‘कनफेशन’ यानी इकबालिया बयान है।
लेखक स्वयं किसी नदी की तरह हैं। जन्म कहीं तो पढ़ाई कहीं। कर्म क्षेत्र कहीं तो सेवाओं में भी विविधता रही। यही कारण है कि उनके लेखन में विविधता दिखाई पड़ती है। यहां भी वह एक शैली नहीं अपनाते। सूचनात्मकता के साथ अपने अनुभवजनित किस्से भी सरलता से शामिल हुए हैं। कहीं ऐतिहासिकता को साथ लेकर चलते हैं तो बहुभाषिकता का प्रेम साफ दिखाई देता है। यह जरूरी भी है। कहीं वह प्रकरण को या मुद्दे को रोचकता के साथ प्रस्तुत करते है और धीरे-धीरे उसकी परतें खोलते चले जाते हैं। जानकारीपरक सामग्री भी है तो उसे नीरस होने से बचाने में सावधानी बरती है।
यही कारण है कि यहाँ कुछ अंश सीधे किताब से हू-ब-हू लिए हैं। यह इसलिए भी ज़रूरी है कि पाठक किताब खरीदने से पहले झांक तो ले। हालांकि मेरा स्पष्ट मानना है कि ऐसी किताबें हमारे निजी संग्रह में होनी ही चाहिए। अनुभवी लेखक सुरेश पंत पाठकों के लिए सवाल भी छोड़ते हैं। लोक में व्याप्त भाषा, परम्परा और मान्यताओं को वह अन्तिम नहीं मानते। वह मनुष्य में खोजबीन और अपने अनुभवों से समय के साथ होने वाले बदलाओं के पक्षधर हैं।
एक अंश इसी किताब से-
गङ्, गंगा और गाड़
कुमाउँनी में ‘“गङ्” का अर्थ केवल गंगा नदी नहीं है, यह नदी-सामान्य का पर्याय है! जैसे कालीगङ् गोरीगङ् रामगङ् सरयू गङ्। किसी भी नदी, विशेषकर हिमालय से निकली सदानीरा नदी के नाम के साथ गङ् जोड़ा जाता है। छोटी और कम पानी वाली नदी को गाड़ कहा जाता है जैसे ठूली गाड़, बिशाड़ गाड़, पनार गाड़, स्वालगाड़ आदि। वस्तुतः जिसे गंगा नदी कहा जाता है उसका उद्गम गंगोत्री अवश्य है किंतु उसे देवप्रयाग तक भागीरथी कहा जाता है। देवप्रयाग में अलकनन्दा से मिलने के बाद ही वह गंगा कहलाती।
यही “गङ्” शब्द म्यांमार, वियतनाम, चीन में ‘‘काङ्’’, ‘‘क्याङ्’’ या ‘‘कङ्’’ हो जाता है जैसे मीकाङ् सीक्यांग यांग्त्सीक्यांङ्…! श्रीलंका की सिंहली भाषा में भी गंगा शब्द नदी सामान्य के लिए प्रयुक्त होता है। जैसे त्रिंकोमाली के निकट महावेलि गंगा। इसके अतिरिक्त कालूगंगा और केलानीगंगा भी श्रीलंका की नदियाँ हैं जो पश्चिम में क्रमशः कालुबारा और कोलंबो के पास समुद्र में मिलती हैं। ये सभी गंगाएँ हिमालय से नहीं निकलतीं पर गङ् कही जाती हैं।
तो क्या कोई एक भाषा-भाषी मानव समुदाय पश्चिम से चलकर हिमालय से होकर पूर्व की ओर और फिर दक्षिण की ओर गया था?
कुल मिलाकर यह किताब पठनीय है। संग्रहणीय है। बार-बार उलटने-पलटने के लिए कारगर है। यह किताब किसके लिए नहीं है? सोचता हूँ तो यह हर उस पाठक को पसंद आएगी जो भारत-भाषी-भाषा के सांस्कृतिक, सामाजिक, सामुदायिक, भौगोलिक जीवन में तनिक भी दिलचस्पी रखता है। यह कोई व्याकरण की किताब नहीं है। अलबत्ता यह भाषाओं की रवानगी, उनकी यात्रा और उसमें शनैः शनैः आते बदलावों की बानगी बताती है।
किताब का सजिल्द संस्करण भी आना चाहिए। भले ही किताब बीस-पच्चीस रुपए मँहगी हो जाएगी लेकिन किताब की आयु बढ़ जाएगी। आवरण शानदार है। सियाही स्टूडियो ने तैयार किया है। हाँ यह और बेहतर गुणवत्ता का हो सकता था। पढ़ते-पढ़ते उठा रहता है। सुरेश पंत भाषा के अनुभवी जानकार हैं। वह इसे और भी सरल कर सकते थे। जैसे-किसी भी भाषा में समाज भाषा-वैज्ञानिक नियंत्रण बड़े महत्त्वपूर्ण होते हैं। इनसे भाषिक नियमों में विचलन होता है, अर्थ विस्तार होता है, अपकर्ष होता है और . . . . ।
एक और उदाहरण-हमें उस चर्चा से अधिक इस शब्द की व्युत्पत्ति और चलन पर सोचने का मन हुआ है कि यह बना कैसे और इसकी व्याप्ति क्या है।
एक बानगी यह भी- संधि से तात्पर्य किन्हीं दो निकटस्थ ध्वनियों के मेल से उनमें आने वाला रूप स्वनिमिक परिवर्तन है।
हालांकि किताब में सत्रह ऐसे जटिल से लग सकते वाले शब्दों का विस्तार से वर्णन किया गया है। यह अच्छी बात है। शायद यह और भी विस्तार ले सकता था लेकिन फिर पुस्तक का आकार और काग़ज़ सहित मूल्य जैसे मामले भी सामने आते। प्रायः भाषा सरल है पढ़ते-पढ़ते पाठक आगे बढ़ता है लेकिन वहीं कोष्ठक में सरलीकरण बाधक बनता है। उसे पेज के नीचे दिया जाना चाहिए। या संख्या देकर अंत में विस्तार दिया जा सकता था। अस्सी प्रकरण कह लें या उप विषय या बिन्दु। पहले एक पेज पर समेटे गए विचारों को जगह दी जा सकती थी। फिर दो पेज वालों को, फिर तीन पेज वालों को जगह दी जाती तो बेहतर होता।
पेज दो, चार और एक सौ चोरानवे खाली छूट गए हैं। वह भी भाषाई विचारों, सूक्तियों, कथनों आदि से सज सकते थे। पन्द्रह के आसपास पेज की सामग्री को पिछले पेज पर समेटी जा सकती थी। या उन विचारों, प्रकरणों, मामलों, मुद्दों को पूरे पेज पर ले जाया जाना चाहिए था। हालांकि किसी विचार को किसी शब्द सीमा में समेटना या अनावश्यक विस्तार देना संभव नहीं होता। लेकिन किसी पेज पर छपी सामग्री मात्र पांच-सात पँक्तियों पर खत्म हो जाए और फिर नई सामग्री अगले पेज पर शुरु हो तो यह खालीपन अखरता है। किताब में पेज चौबीस, बत्तीस, पैंतीस, अड़तीस, अड़तालीस, इक्यावन, बयानवे, एक सौ अट्ठाईस, एक सौ सैंतीस, एक सौ तैंतालीस, एक सौ अड़तालीस, एक सौ तिरपन, एक सौ छप्पन और एक सौ बासठ ज़्यादा अखर रहे हैं। इन पेजों का खालीपन भाषा के मुद्दो-सवालों-विचारों से भरा जा सकता था। या कुछ ग्राफिक्स से भी।
नवारुण प्रकाशन प्रकाशन जगत में बहुत पुराना नाम नहीं है। लेकिन अपने नयेपन के कारण वह नई-नई किताबें लेकर आ रहा है। विविधता से भरी। वह मात्र साहित्य का पैरोकार नहीं है। पता नहीं पुस्तक का निर्णय लेते समय यह प्रकाशन क्या सोचता होगा? यह तो तय है कि एक स्वस्थ समाज, वैज्ञानिक नज़रिए को आगे बढ़ाती हुई संवैधानिक मूल्यों की पैरोकारी करती हुई सोच इस प्रकाशन की पुस्तकों से झलकती है।
पाठक जानते हैं कि नई किताब हाथ में आते ही छपाई रंगों की महक अलग ही आती है। यह महक किताब के पुराने पड़ने पर उड़ जाती है लेकिन किताब की गुणवत्ता यदि शानदार है तो वह किताब पाठक के अपने संग्रह में बनी रहती है। काग़ज़, छपाई, टाइप सैटिंग, आकार सहित आवरण पर नवारुण कमोबेश कोई समझौता नहीं करता। एक सौ चौरानवे की इस पुस्तक के आस-पास की अन्य प्रकाशकों की पुस्तकें भी मेरे संग्रह में हैं। कीमत की तुलना करता हूँ तो लगातार छपाई, काग़ज़ और प्रबंधन मँहगा होता जा रहा है। इस लिहाज़ से भी यह प्रकाशन मूल्य तय करते समय पाठक का ध्यान रखता हुआ प्रतीत होता है। यह बड़ी बात है। आवरण अंतिम का रंग संयोजन लेखक के विवरण को उजाला नहीं देता।
कुल मिलाकर यह किताब निसंकोच खरीदी जा सकती है। हिन्दी भाषा से लगाव रखने वाले और लगातार अपनी शब्द संपदा को बढ़ाने वाले पाठकों के लिए भी यह किताब एक टॉनिक का काम देगी। छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों, शोधार्थियों के साथ-साथ भाषा के क्षेत्र में काम करने वालों के लिए भी यह किताब नया अनुभव देगी। कहा जा सकता है कि हिन्दी भाषा यदि समुद्र है और उसे बरतने वाले जीव है तो यह किताब एक खुराक है जिससे मानसिक तृप्ति हासिल की जा सकती है। यह तृप्ति निगलने वाली नहीं बल्कि ज़ेहन में रखने वाली है। उम्मीद की जानी चाहिए कि लेखक की इससे पूर्व आई किताब शब्दों के साथ-साथ की तरह इस किताब का भी भरपूर स्वागत किया जाएगा। किया जाएगा नहीं, किया जा रहा है।
किताब: भाषा के बहाने
श्रेणी: भाषा-विज्ञान
लेखक: सुरेश पंत
मूल्य: 290
पेज: 194
प्रकाशक: नवारुण
प्रकाशक का पता: सी 303, जनसत्ता अपार्टमेन्ट, सेक्टर 9 गाजियाबाद
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