क्या आप कभी स्कूल की छुट्टी का घण्टा बजने से पहले अपने घर के बच्चों को लेने पहुँचे हैं? यदि हाँ तो आपको यह किताब पढ़नी चाहिए। नहीं? तब भी आपको यह किताब पढ़नी चाहिए। क्या आपके बच्चे बड़े हो गए हैं? तब भी आपको यह किताब पढ़नी चाहिए। क्यों?

निकट भविष्य में आपको अपने नाती-पोतों को स्कूल छोड़ने या घर लाने की जिम्मेदारी तो मिलेगी ही। यदि आप अध्यापक हैं तो भी आपको यह किताब पढ़नी चाहिए। क्यों? बच्चे सीखते क्यों नहीं? आपकी बात ठीक से सुनते क्यों नहीं? ध्यान दिया? मूड भी कोई चीज़ है न? क्या पता मूड खराब हो। मन ठीक न हो। ये मूड का खराब होना या मन का ठीक न होना कहीं न कहीं गुस्से को बढ़ाता है।


गुस्से में कोई बच्ची हो तो? कैसे उस बच्ची का गुस्सा शांत किया जाए। गुस्से के कारण की तह में जाना आसान नहीं। बस इस किताब की कहानी में यही केन्द्रिय भाव है। अक्कू बहुत गुस्से में है। स्कूल की छुट्टी हो गई है। उसके पापा उसे साइकिल में पीछे बिठाकर घर लौट रहे हैं। अक्कू के अप्पा उसका दिल बहलाते हैं। रास्ते में फूल, घर की छत पर बंदर फिर घर में छाछ पीने की बात हो, अक्कू तब भी गुस्से में है। वडा खाने की बात पर भी वह पहले-पहल गुस्से में ही रहती है।

फिर अप्पा पूछ रहे हैं कि क्या हुआ? कई सारे सवाल पूछे जाते हैं लेकिन गुस्से के कारण का पता नहीं चलता। बातों ही बातों में धीरे-धीरे कारण खुलता है कि क्या हुआ होगा?

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अक्कू को अप्पा चित्र बनाने का अवसर देते हैं। यह क्या! तब अक्कू सारा घटनाक्रम चित्र में उकेरती है।


कहानी कुछ परम्परागत धारणाओं से मुक्त नहीं हो पाई। अक्कू एक लड़के का चित्र बनाती है। लिखती है कि ‘‘यह बिक्कू है. . .बहुत बुरा लड़का है! जब मैं गिरी तब यह मुझ पर हँसा था!’’
अक्कू के अप्पा भी इस बात का समर्थन करते है कि अरे, बहुत बुरा लड़का है। किसी के गिरने पर हँसना अच्छी बात नहीं है। यह कहकर भी कहानी में अक्कू के भाव आ सकते थे। मात्र हँसने से किसी को बहुत बुरा लड़का कहना उचित है?


अक्कू के हवाले से कहानी कहती है कि कोई बड़ा बदमाश कौआ अक्कू की इडली लेकर उड़ गया। यह क्या बात हुई भला। यह बात यदि ऐसे भी कही जाती कि कौआ अक्कू की इडली लेकर उड़ गया।


विनायक वर्मा कृत ‘अक्कू हुई गुस्सा’ बाल सुलभ कहानी की किताब है। हालांकि यह किताब उन बच्चों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है जो सरल शब्द पहचानते हैं और मदद से नये शब्दों को पढ़ते हैं। लेकिन यह किताब उन सभी बाल पाठको को भी पसंद आएगी जो पढ़ने में माहिर हो चुके हैं।

यह कहा जाए कि यह किताब उन अभिभावकों को भी पसंद आएगी जिनके घर में बच्चे खेलते-कूदते हैं। एक कदम आगे की बात कही जाए तो यह उन सभी पाठको को पसंद आएगी जिनके भीतर अभी भी एक बाल स्वभाव बचा-बना हुआ है।


किताब का आवरण इसे भीतर के पन्नों से अलग करता है और किताब की उम्र बढ़ाता है। भीतर के पन्ने भी काफी मजबूत स्थिति में है।

बच्चों के उलटने-पलटने के स्वभाव को देखते हुए किताब की क्वालिटी को उम्दा रखा गया है। यह अच्छी बात है। चित्रों में भी विनायक वर्मा जी ने कमाल किया है। अलग से चित्र हैं। लुभाते हैं।

अक्कू और उसके पिता सामान्य पात्र हैं। पिता को भी एक आम आदमी चित्रित किया है। जो अक्कू को साइकिल से लेने के लिए स्कूल पहुँचते हैं। कई बार कस्बाई,महानगरों और पार्कों की कहानियों में आम जीवन के बच्चों की कहानियां खो जाती हैं।

कहानी में दो ही पात्र हैं। अक्कू और उसके पिता। इस पूरी कहानी में कहीं भी मां का जिक्र नहीं है। यह कहानी यह भी सोचने पर बाध्य करती है कि अक्कू की मां का क्या हुआ होगा? यह जरूरी नहीं कि लालन-पालन में सिर्फ और सिर्फ मां की परवरिश ही दिखाई जाए। यह कहानी अलग ढंग से अपने भाव व्यक्त करती है।
किताब: अक्कू हुई गुस्सा
लेखक: विनायक वर्मा
चित्र: विनायक वर्मा
मूल्य: 50 रुपए
पेज: 16
प्रकाशक: प्रथम बुक्स
प्रस्तुति: मनोहर चमोली मनु

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