भारत की साक्षरता दर से अधिक साक्षरता होने पर भी उत्तराखण्डी अपनों से ही बार-बार छले जाते रहे हैं। आज भी एक बड़ा काकस सोशल मीडिया में प्रार्थनाओं की दुहाई दे रहा है। देवताओं को स्मरण करने की बात कर रहा है। पुरखों का दोष लगा है। जप-तप और भक्ति गीत का सहारा लो। ऐसे कुतर्कों की बात कौन कर रहा है? इन्हें पहचानिए। इनसे दूर रहिए।

आपको बुरा लग सकता है। लगेगा भी। लगना भी चाहिए। याद कीजिए। उत्तराखण्ड आंदोलन। याद कीजिए। 9 नवम्बर 2000! हमें थोपा हुआ नेतृत्व मिला। चलो कोई बात नहीं। याद कीजिए इन 22 सालों के सारे जन प्रतिनिधियों को। जिन्हें हमने चुना। क्या गिनतियों में कोई राज्य के भले का स्वप्नदृष्टा रहा? अलग राज्य का जश्न मनाने वाले ‘हौसिया उमर’ वाले रहे। अमूमन हर किसी ने अपनी आंखों से अपनों के लिए सपने सजाए। किसी ने हिमालयी सरोकारों के लिए सपने देखे?
इन 22 सालों में पलायन नहीं रोक पाए। बिजली उत्पादन नहीं बढ़ा पाए। कोई नया बस अड्डा तक नहीं बना। हाँ! सेठों के लिए हवाई यात्रा का इंतज़ाम ज़रूर हुआ। पूंजीपतियों को हगने-मूतने और जल्दी से वापसी हो जाए के लिए चार धाम लेन जरूर बनाई। चाहे हमारे घसियारिने अब सड़क पार करने में डरती हो।


आपको बुरा लगे न लगे। लेकिन नेतृत्व को क्यों कर बुरा लगेगा? वे ही बार-बार देव भूमि कह-कह कर आपके भीतर अवैज्ञानिकता ठूंस चुके हैं। अब तो लखनऊ के बाबू आपसे पान का बीड़ा मांगकर काम नहीं कर रहे? अब तो आपके ही इंजीनियर हैं न? आपके ही बाबू हैं न? आप ही घूस देने वाले ठैरे और आपके ही हैं जो घूस ले रहे हैं। कैसी घूस? अवैध निर्माण पर आंखें बंद कर लेना किसी घूस से कम नहीं है। दो मंजिला इमारत के बाद भूकंप क्षेत्र में तीन से पांच मंजिला इमारतें बदस्तूर बनते रहने देना किसी घूस से कम है क्या?


एक उदाहरण देकर बात खत्म करता हूँ। कभी देहरादून वाया हरिद्वार होते हुए चण्डीगढ़ जाइए। 12 टोल प्लाजा बने हैं। आप कह सकते हैं। राजस्व के लिए यह ठीक है। वापसी में वाया नाहन पोंटा आइए। मात्र 2 टोल प्लाजा पड़ते हैं। चंडीगढ़ से पंजाब-हिमाचल आते हुए 2 टोल प्लाजा? क्यों भाई? पंजाब के किसानों से तीन-एक टोल प्लाजा जनहित में उखाड़ फेंके। उनका तर्क है कि जनता जनार्दन है। वह 80 से 100 रुपए टोल क्यों दे? और आप? आप पड़ोसी के घर चोर-उचक्के उपद्रव मचाएंगे तो आप खिड़की से झांक कर तमाशबीन बने रहेंगे? ये है आपका देवत्व? आपके मंत्र,पूजा,इबादत,ग्रन्थ काम न आएंगे। आपकी मनुष्यता काम आएगी।


आप कुछ मत करें। इतना करें कि राज्य के लिए सपने देखें और दिखवाएं। नेतृत्व कहीं मिले तो सवाल करें। उनके सामने हाथ जोड़कर दीन-हीन मत बनें। उनसे पूछिए कि स्कूल बंद क्यों हो रहे हैं? निजी अस्पतालों-संस्थाओं को क्यों बढ़ावा दे रहे हो? उच्च शिक्षा में फीस क्यों बढ़ा रहे हो? जोशीमठ को उसके हाल पर मत छोड़ो। कम से कम जो गलत हो रहा है वो तो बोलो। चर्चा करो। या हाथ में रिमोट बटन सरकाते रहोगे। दांत फाड़कर फेसबुक में गाड़ी-घोड़े और मॉल शॉपिंग की फोटो ही चेपते रहोगे?


तीर्थाटन-पर्यटन पर ध्यान देना होगा लेकिन चार सितारा सुविधाएं देकर नहीं। सड़कों पर बाहरी बोझ कम करना होगा। रेलवे लाइन नहीं रज्जू मार्ग चाहिए। चौड़े मार्ग नहीं वैकल्पिक मार्ग चाहिए। टिहरी बांध जैसी परियोजना क़तई नहीं बननी चाहिए। डाइनामाइट के धमाके तो छोड़िए वायु मार्ग में जहाजों की गड़गड़ाहट भी हिमालयी पट्टी के अनुकूल कितनी है? वैज्ञानिकों से पूछिए। हर पट्टी की भार क्षमता से अधिक आवाजाही पीड़ा ही देगी।


जाइए। टीका लगाइए। चरणामृत बनाइए। घंटी-थाली बजाइए। इतना ध्यान रखिए कि कल आपकी-मेरी भी बारी जरूर आएगी। फिर न कहना,‘‘हौसिया उमर च मेरी, कुछ न बोल मैकू।”

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