रिमझिम से बरसती हैं बच्चों की आवाज़ें


-मनोहर चमोली ‘मनु’
रिमझिम-1 पहली कक्षा के लिए हिंदी की पाठ्यपुस्तक है। पूरे पाँच बरस का पक्के बच्चों के लिए यह बेहतरीन किताब है। आवरण में बारिश हो रही है। हाथी,बन्दर,चूज़े,बत्तख,बिल्ली मस्ती में हैं। एक बुढ़िया छाता लिए हुए खड़ी है। आवरण का यह चित्र बाहर के अंतिम पेज को फैलाकर और भी शानदार अहसास देता है। बारिश से एक अस्थाई नदी बन जाती है। गिलहरी,चेहे भी हैं तो पीछे भालू भी है। बत्तख के पीछे कागज की नाव भी हैं। जीवंत चित्र है। बालमन की पकड़ इस चित्र में साफ दिखाई देती है। आवरण का यह चित्र उन बच्चों के लिए वह आनंद देता है जिन्होंने अभी-अभी स्कूल आना शुरू किया है। उनकी आँखों को बहुत देर तक जमाए रखने में यह बेहद सफल है। सही भी है। पढ़ना तभी कारगर होगा, जब पढ़ने वाली सामग्री ललक बढ़ाए। पन्ने उलटते हुए रहस्य, रोमांच और आनन्द की अनुभूति होनी चाहिए।


रिमझिम पुस्तक बेमन से खोलने को विवश नहीं करती। भाषा की पुस्तक तो ऐसी ही होनी चाहिए। अमूमन अधिकतर पाठ्यपुस्तक शिक्षक को ध्यान में रखकर बनी होती हैं। लेकिन रिमझिम के मामले में ऐसा नहीं है। भीतर के आवरण में और अन्तिम आवरण का भीतरी हिस्सा शानदार चित्र से भरा है। हर बालमन की ज़बान में चढ़ी कविता की दो-दो पँक्तियाँ हम सभी को याद है-‘हरा समंदर गोपी चंदर,बोल मेरी मछली कितना पानी। कमर कमर तक गहरा पानी, बोल मेरी मछली कितना पानी।’ किताब का पहला पन्ना स्वागत करता है। एक बिल्ली और एक चूहा मुस्करा रहा है। ‘कहाँ क्या है’ को तीन पेज पर फैलाया है। यहाँ भी एक चूहा और एक बिल्ली बच्चों से बातचीत करती हुई नज़र आते हैं। दस चित्र पाठों तक पहुँचाने में मदद करते हैं। साफ है कि बोझिल और आँखों को थकाने वाला संयोजन नीरसता बढ़ाता है। किताब में एक सौ अट्ठाइस पन्ने हैं। हर पेज बालमन की छवियाँ बिखेरता है। रंग संयोजन तल में पेजों की संख्या दर्शाने के लिए विविधता से भरा हुआ रखा गया है। वह एक रंगीन फूल के भीतर अंकित है।


पहला पाठ झूला है। लेकिन बच्चों को यहाँ पहुँचाने की कोई जल्दी नहीं है। इससे पहले भरपूर बातचीत के अवसर दिए गए हैं। बाएँ और दाएँ पेज का इस्तेमाल करते हुए एक विहंगम चित्र शामिल है। यह चित्र एक कक्षा का है। श्यामपट्ट पर लिखा है-‘स्कूल का पहला दिन’। अध्यापिका के साथ बच्चे जमीन पर बैठे हैं। सहज हैं। दरवाजा खुला है। खिड़की खुली है। यह एक खुला चित्र है। इस चित्र पर बच्चों से भरपूर बात की जा सकती है। यह चित्र अर्थपूर्ण सामग्री की ओर बढ़ाता है। इस चित्र को देखकर और बातचीत कर बच्चे सार्थक बातें सुनेंगे और सुनाएँगे। चित्र सीधा संकेत दे रहा है कि बच्चे दुनिया के बारे में अपनी समझ और ज्ञान का निर्माण स्वयं कर सकते हैं। चित्र बताता है कि ज़ोर-ज़बरदस्ती सा अनुशासन का कड़ा पहरा सीखने की गति मंद ही करता है।


रिमझिम-1 साबित करती है कि साल भर छात्र बस्ते में जिन पुस्तकों को रखते हैं, उनसे प्रेम नहीं कर पाते। खिलौनों की तरह लगाव नहीं रख पाते। कहीं ऐसा तो नहीं कि वे नीतियों-उपदेशों और आदर्शों से अटी पड़ी होती हैं? पाठ्यपुस्तक छात्र के लिए है तो वह छात्रकेंद्रित हो। शिक्षक के लिए संदर्शिका हो। पाठ्यपुस्तकों में ही शिक्षक निर्देश क्यों ठूँसे जाएं? पहले पाठ से भी पहले कक्षा आधारित गतिविधियाँ रिमझिम में हैं। बच्चे खुद को, सहपाठियों को, अपने अध्यापक को जान लें। टोलियाँ बना लें। मिल-जुल कर बतियायें। यही पुस्तक का पहला मक़सद दिखाई देता है। पहली कक्षा से ही बच्चों को ऐसा वातावरण मिलना चाहिए जहाँ वे बिना रोक-टोक के अपनी जिज्ञासाओं की पड़ताल करें। खोजें और पूछें। मज़ेदार बात यह है कि बच्चे नाम बताने-पूछने और लिखने की ओर बढ़ते-बढते न और म से पहचान करते चले जाते हैं। इसके साथ ही इन चार पेजों की गतिविधियों में अँगूठे की छाप वाली गतिविधियाँ भी हैं। अ, ठ और ए से बच्चे सहजता के साथ परिचय पाते हैं।


रिमझिम-1 पहले ही दिन से लिखने की प्रक्रिया पर जोर नहीं देती। पुस्तक में सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना साथ-साथ चलता हुआ दिखाई भी देता है। वहीं अधिकतर पाठ्य पुस्तकों में अर्थविहीन, तुकबंदी और काल्पनिकता का आनंद प्रायः नहीं दिखाई देता। जबकि यही बच्चों की दुनिया है। गिजुभाई का मानना था कि बालक तो अपने चारों ओर की दुनिया को नई आँखों से देखने लगता है, अतः उसे इस तरह की कहानियों में बहुत मज़ा आता है। आकाश, पृथ्वी, पवन, सूर्य, चन्द्र, पक्षी,पशु और फूलों को देखकर बालक के मन में नया अचरज होता है।


रिमझिम-1 में पाठ एक से पहले एक और चित्रात्मक गतिविधि के लिए दो पेज उपयोग में लाए हैं। यह बेहद उपयोगी हैं। यह एक स्कूल के प्रांगण का दृश्य है। बहुत ही शानदार। अनुमान और कल्पना के कई द्वारा खोलने वाला चित्र है। असीमित और कई कालांश तक अनवरत् की जाने वाली बातचीत इस चित्र में है। यह चित्र सोचने को बाध्य करता है। स्कूल में हुए मध्यांतर का दृश्य है। आप स्वयं ही सोचिए कि किसी स्कूल में मध्यांतर के समय क्या-क्या हो सकता है? यह चित्र न केवल बातचीत कराने में समर्थ है बल्कि श्यामपट्ट की सहायता से कई अलग तरह की सूची बनाई जा सकती है। कई छोटे-छोटे वाक्य बनाए जा सकते हैं। भाषाई कौशल के साथ गणित की छोटी-छोटी अवधारणाओं पर पुख़्ता काम किया जा सकता है।


इस चित्र को देखकर शिक्षाविद् जाॅन होल्ट का एक पत्र याद आता है। जो उन्होंने सन् 1968 में डाॅ. ब्लिस को लिखा था। वे लिखते हैं-‘मुझे लगता है कि अगर हम आज के बोझिल पाठ्यक्रम को आंशिक तौर पर या पूरी तरह से हटा देंगे तो उससे सीखने की प्रक्रिया बहुत बेहतर हो जाएगी। मुझे सीखने की प्रक्रिया में परीक्षाओं, टेस्टों ओर अंकों आदि की कोई भी उपयोगी भूमिका नज़र नहीं आती है। उल्टा ये सब चीज़ें सीखने की प्रक्रिया में बाधक हैं।’ इन पँक्तियों से हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि बच्चों के लिए भाषा की पुस्तक में क्या नहीं होना चाहिए।


साल दो हजार छःह में निर्मित रिमझिम-1 को बाल केन्द्रित पाठ्यपुस्तक की परिधि में रखा जा सकता है। इसे एन.सी.ई.आर.टी. नई दिल्ली ने तैयार किया है। इस में कुल 23 पाठ हैं। बाल सुलभ सत्रह तो कविताएं ही हैं। 1966 में ही जाॅन होल्ट लिखते हैं-‘यह दुनिया जटिल है और तेज़ी से बदल रही है। स्कूल में किसी निश्चित ‘‘ज्ञान के भण्डार’’ को सीखकर सारी ज़िन्दगी उसका उपयोग कर पाना एक निरर्थक कल्पना है। सच्चाई तो यह है कि दुनिया के सबसे ज्वलन्त प्रश्नों और समस्याओं का स्कूल और विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में समावेश होता ही नहीं। आप किसी भी विश्वविद्यालय के परिचय पत्र को उठा कर पढ़ें और देखें कि आपको शान्ति, गरीबी, नस्लवाद, पर्यावरण प्रदूषण जैसे प्रश्नों पर कितने पाठ्यक्रम मिलते हैं।


रिमझिम-1 को देखकर,उलट-पलटकर हमें सभी आम बच्चों की ध्वनि पन्नों में दिखाई पड़ती है। पेड़ पर टँगा रस्सी का झूला आम बच्चों के आनंद का प्रतिनिधित्व करता है। पहला ही पाठ झूला कविता पर आधारित है। झ, ल और ड वर्णों से परिचित कराता यह पाठ और उसकी गतिविधियाँ भी शानदार है। आम बच्चों के परिवेश का बयान इस पाठ में मिलता है। इस पाठ के तुरंत बाद फिर दो पेज का एक शानदार चित्र है। यह चित्र आम जन जीवन की आवाज़ है। लगभग बीस से अधिक बच्चे उन्मुक्त होकर खेलों में मस्त हैं। यह चित्र बच्चों की मनःस्थिति के साथ-साथ आनंद और मस्ती का भी अहसास करा रहा है। चित्र के बाद पेज गतिविधियों के साथ बच्चों के परिवेश से जोड़ती है। यहाँ चित्रों से पहले वर्ण की ओर बढ़ना भी शानदार गतिविधि है। वह भी बिना बोझ के। इस संबंध में शैक्षिक विमर्श के विशेषज्ञ प्रेमपाल शर्मा एक सवाल के जवाब में कहते हैं-‘माँ-बाप बच्चों को कोर्स की किताबों में पेले रहते हैं, उन्हें पत्र-पत्रिकाएँ तथा अन्य किताबें नहीं पढ़ने देते। मैं कहना चाहता हूँ कि बच्चे यदि सबसे ज़्यादा नफ़रत करते हैं, किसी चीज़ से डरते हैं, तो इसी अनुशासन से। यह अनुशासन उन्हें ज़िद्दी, झूठा, कामचोर बनाता है और अनेक बुरइयों की ओर प्रवृत्त करता है। पाठ्यक्रम के साथ-साथ अपनी भाषा में बच्चों की अभिरुचियों की दूसरी किताबों-कहानी, कविता, यात्रावृतांत, रोमांच, विज्ञान, कला आदि से ही उन्हें किताबों की दुनिया में वापस लाया जा सकता है।’


एक अन्य सवाल के जवाब में वे कहते हैं,‘अफसोस होता है कि हमने शिक्षा को इतना कम महत्व दिया है! एक स्कूल धर्म-शिक्षा पढ़ा रहा है, तो दूसरे का सारा ध्यान नकली नैतिकताओं पर केंद्रित है, तो अधिकांश निजी स्कूल अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाओं और उनके साहित्य को ही अध्ययन-योग्य मानते हैं, देशी भाषाओं का उनकी दृष्टि में कोई अस्तित्व नहीं है। यह आजादी का कितना बड़ा अपमान है कि कुछ स्कूल अभिभावकों को लिखित में यह निर्देश देने की जुर्रत करते हैं कि घर पर बच्चे के साथ सिर्फ अंग्रेजी में ही बोलें और स्कूल में बच्चा हिंदी या अपनी मातृभाषा नहीं बोले, अगर बोलेगा, तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा।‘


रिमझिम-1 उन सब चीज़ों और प्रतीकों को भी शामिल करती है जिनसे या तो परहेज किया जाता है या जिनके बारे में बच्चों के बिगड़ जाने की भ्रांतियां चली आ रही हैं। आम की कहानी पाठ दो है। यह एक चित्रकथा है। बच्चे के हाथ में गुलेल है। वह गुलेल से एक आम पर निशाना साधता है। चार पेज में पन्द्रह चित्रों की सजीव चित्रकथा बच्चों के अनुकूल है। गतिविधियां भी ऐसी कि बच्चे चित्रकथा के क्रम के साथ-साथ समझ का विकास भी करते हैं। पाठ्यपुस्तकों के बहाने यह सवाल भी उठता है कि अब छात्र अपने लिए तो पुस्तक नहीं बना सकते। पाठ्यक्रम तो शिक्षक और शिक्षाविद् ही बनाएंगे। पर पढ़ना तो छात्रों को है। क्या पुस्तक बनाते समय छात्रों की कक्षा, वयवर्ग और उनकी ध्वनि पुस्तक में शामिल नहीं होनी चाहिए? स्कूली पुस्तकें देखकर लगता है कि वे शिक्षकों को पढ़ाने का निर्देश दे रही हैं। छात्र उसे अनिवार्य तौर पर पढ़ें। यह आग्रह दिखाई देता है। ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षकों ने पुस्तकें तैयार की है और छात्रों को उन्हें पढ़ना है।


रिमझिम-1 लीक से हटकर तैयार की गई है। शिक्षकों के लिए बहुत ही कम निर्देश पुस्तक में दिए गए हैं। वह भी पन्ने के अंत में और उसका आकार बेहद छोटा रखा गया है। पुस्तक में फोंट काफी बड़ा रखा गया है। पहली के बच्चों की उम्र का ध्यान रखा गया है। अधिकतर पाठ्यपुस्तकें पाठ आधारित गतिविधिया और प्रश्न अभ्यास के आस-पास घूमती हैं। वहीं शिक्षाविद् प्रो॰कृष्ण कुमार कहते हैं-‘कई अध्यापक बच्चों की व्यक्तिगत ज़िंदगी और स्कूल में उनकी पढ़ाई के बीच कोई संबंध नहीं देख पाते। वे इस बात पर जोर देते हैं कि कक्षा में सिर्फ पाठ्यपुस्तकों में दी गई सामग्री पर ही चर्चा हो। अध्यापक की इस मान्यता के कारण कई बच्चे कक्षा में किसी भी किस्म की हिस्सेदारी नहीं निभा पाते।’


प्रायः पुस्तकों में ऐसे प्रश्न-अभ्यास और अवसर नहीं होते जो बच्चों को स्कूली और समाज के अनुभवों पर बात करने के अवसर देते हों। इसका अर्थ यह हुआ कि पुस्तक ऐसी हो जो बात करने के अवसर दे। कुछ भी पढ़ा जाए उसके बाद ख़ूब सारी बातें की जा सकें। क्या हमारी पुस्तकों से ऐसी बातें निकलती हैं? अपनी भाषा में अपनी बात कहने और बातचीत करने की भरपूर आज़ादी यह किताब देती है। ऐसे कई मौक़े किताब में हैं जहाँ शब्द भंडार और अभिव्यक्तियों का भी विकास करने का अवसर प्राप्त हो रहा है। रिमझिम-1 ने पढ़ने का चस्का लगाने के लिए शानदार चित्रात्मक पाठ रखे हैं। मज़ेदार बात यह है कि इसमें अप्रत्यक्ष तौर पर लिखने के लिए कुछ नहीं है। लेकिन बातचीत और चर्चा के सवाल इतने रोचक हैं कि श्यामपट्ट और नोटबुक की सहायता से लिखने की शुरुआत शानदार तरीके से कराए जाने की भरपूर संभावनाएं हैं।


इन चित्रात्मक पाठों में बच्चों की आवाज़ें हैं। ‘स्कूल का पहला दिन’, ‘मध्यांतर का समय’, ‘बच्चों के खेल’, ‘आम की कहानी’, ‘आम की कहानी’, ‘स्कूल की छुट्टी’, ‘खेती-किसानी का चित्र’, ‘हाट का खेल’, ‘बस का चित्र’, ‘रेलवे स्टेशन का चित्र’ और ‘रसोईघर का चित्र’ है। यह सारे चित्र पढ़ने की शुरुआत के लिए बेहद कारगर सूत्र हैं। पढ़ने की शुरुआत करने वाली पुस्तक के लिए प्रो॰कृष्ण कुमार प्रभावी बात कहते हैं-‘फ्लैश कार्ड,चार्ट या लकड़ी के अक्षरों जैसी प्रचलित सामग्री की तुलना में पढ़ने की शुरुआत किताबों से करना कहीं अच्छा और जरूरी है। हमारा उद्देश्य तो आखिर यही है न कि बच्चे आगे चलककर किताबें पढ़ सकें। चार्टाें और कार्डो जैसी चीज़ें कभी-कभी काम हा सकती हैं पर वे पढ़ना सीखने की वैसी तेज़ और स्थाीय इच्छा पैदा नहीं कर सकतीं जैसी किताबें कर सकती हैं। न ही उन्हें पढ़कर बच्चे को अपनी उपलब्धि का वैसे आभास मिल सकता है जैसा कोई किताब दे सकती है।’


रिमझिम में कहानियों और कविताओं के चित्र भी अनुमान लगाकर पढ़ने के साथ-साथ समझ का विस्तार करने के अवसर देते हैं। चित्रों का अनुपात बेहद प्रभावी है। ‘झूला’ मात्र बारह पँक्तियों की कविता है। लेकिन चित्र पूरे दो पेजों पर विस्तार लिए हुए है। ‘आम की टोकरी’ दस पँक्तियों की कविता है। लेकिन संबंधित चित्र को पेज के चालीस फीसदी हिस्से पर दिया गया है। अगले पेज पर पाठ से आगे ले जाने वाली कल्पना का चित्र है। पूरे पेज पर एक बालिका है जिसके हाथ हवा में है। सवाल है-यह लड़की सिर पर क्या लेकर जा रही होगी? चित्र बनाओ। लेकिन चित्र बनाने से पहले हर किसी को यह आजादी है कि वह अपने अनुमान से उसके हाथों पर कुछ भी रख सकता है।


पत्ते ही पत्ते डेढ़ सौ से भी कम शब्दों का पाठ है। पाँच पेज का यह पाठ अस्सी फीसदी चित्रों से सजा है। रंगीन चित्रों से सजी रिमझिम-1 पढ़ने के विभिन्न आयामों को कक्षा में उचित स्थान देने के अवसर भी देती है। सुनने, बोलने और पढ़ने के साथ-साथ रिमझिम लिखने की ओर भी बढ़ती है। ऐसा लेखन जिसमें बच्चों की सुनी, देखी बातें उनके अपने तरीक़े से उतारने की ओर बढ़ती है।

रिमझिम-1 बच्चों को उनके अपने अनुभवों से जवाब तैयार करने के भरपूर अवसर देती है। रिमझिम में बातचीत के लिए शामिल कुछ सवाल हैं-‘क्या तुम किसी ऐसे बच्चे को जानते हो जो बाज़ार में कोई सामान बेचता है। पता लगाओ कि वह स्कूल जाता है या नही।’‘झूले कहाँ-कहाँ लगे होते हैं?’ ‘बगीचे में जाओ। पत्ते देखो। उन्हें हल्के से हाथ लगाओ। कैसा लगा? आपस में बातें करो।’ ‘यदि तुम किसी खेत से गुज़रो तो रास्ते में तुम्हें क्या-क्या देखने को मिलेगा?’ ‘बस में कौन-कौन बैठा है? डाªइवर क्या कर रहा है आदि।’ ‘तुम अपनी माँ के साथ रसोई में क्या-क्या काम करवाते हो?’ ‘चूहा तो पूँछकटा चूहा हो गया। बिना पूँछ के वह क्या नहीं कर पाएगा?’ ‘तुम्हारे चार हाथ होते तो तुम क्या-क्या कर लेते?’ ‘हलीम चाँद पर जाना चाहता था। तुम कहाँ जाना चाहती हो? कैसे जाओगी?’ ऐसे कई सवाल हैं जो बच्चों को नया और अलग से सोचने का अवसर देते हैं। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में रिमझिम एक शानदार प्रयास करती है। गतिविधियाँ और पाठ इस तरह से तैयार किए हुए हैं कि प्रश्न पूछने और अपनी बात जोड़ने के अवसर यहाँ मौजूद हैं।


रिमझिम सीखने के प्रतिफलों पर भी विशेष ध्यान देती नज़र आती है। बच्चों के निजी अनुभवों को साझा करने पर जोर देती है। बातचीत करने और अपनी राय देने के मौके देती है। भाषा में निहित ध्वनियों और शब्दों के साथ खेलने का आनंद देती है। सरसरी तौर पर ही देंखे तो रिमझिम-1 में जीव-जगत, प्रकृति, समुद्र, नदी, मछली, चूहा, बिल्ली, बच्चे, खेल, कीट-पतंगे, पालतू पशु-जंगली जानवर, बंदर,मुर्गी, घर, स्कूल, खेल, फल, पेड़-पौधे, खेती-किसानी, बाज़ार, वाहन, रसोई, उपकरण, मानव निर्मित सामान, आविष्कार, फसलें, सब्जियाँ, खनिज संपदा, पकवान, मिठाईयाँ, मानव समाज की विविधताएँ, चित्रकलाएँ, पहनावा, अंतरिक्ष,सौर परिवार,लोकरंग के चित्रों के साथ कथ्य भी शामिल हैं।


कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह किताब हर बच्चे को अभिव्यक्त करने के अवसर देती है। यह उन सवालों से बचती है जिसका एक ही उत्तर हो। यह कोशिश करती है कि हर बच्चे की समझ का सम्मान हो और उसके जवाब को ध्यान से सुना जाए। यह ऐसा माहौल देने में सक्षम है जिससे बच्चे खुलकर सहजता के साथ अपनी राय रख सकें। अपने जवाब को देने से पहले सोचें और विस्तार से व्यक्त कर सकें। बावजूद इसके कि यह पहली कक्षा के लिए शानदार किताब है। विडम्बना देखिए कि 14 साल से यही किताब चली आ रही है। उत्तराखण्ड में तो यह किताब 2018 में ही शामिल की गई है। 2006 से 2019 तक आते-आते तो बच्चों की दुनिया भी बहुत बदल गई है। भाषा की ये एक अकेली किताब साल भर बस्ते में रहती है। जो बच्चे तेजी से पढ़ लेते हैं वे तो इसी किताब से भी ऊब जाते होंगे ! ऐसे बच्चों के लिए हमारे स्कूलों में दूसरी-तीसरी किताबें हैं? इस बहाने हमें इन सवालों के जवाब भी खोजने होंगे।

***

सन्दर्भ: 1.जाॅन होल्ट कृत असफल स्कूल अनुवाद अरविन्द गुप्ता, एकलव्य प्रकाशन,प्रकाशन वर्ष 2006
2.गिजुभाई कृत कथा-कहानी का शास्त्र,वाग्देवी प्रकाशन,प्रकाशन वर्ष 2006
3.राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005,एन.सी.ई.आर.टी.नई दिल्ली,प्रकाशन वर्ष 2006
4.रिमझिम-1 पहली कक्षा,पाठ्यपुस्तक, एन.सी.ई.आर.टी.नई दिल्ली,प्रकाशन वर्ष 2006
5.शिक्षा,भाषा और प्रशासन,प्रेमपाल शर्मा,लेखक मंच प्रकाशन,गाजियाबाद वर्ष 2014

  1. कृष्ण कुमार कृत ‘बच्चे की भाषा और अध्यापक‘, भारतीय पुस्तक न्यास,नई दिल्ली वर्ष 1996
    7.सीखने के प्रतिफल, एन.सी.ई.आर.टी.नई दिल्ली,प्रकाशन वर्ष 2017

शैक्षिक दख़ल, जुलाई 2019

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!