बाल साहित्य: कैसी हों आज की बाल कहानियां


-मनोहर चमोली ‘मनु’
छह साल की रिमझिम पापा से कहानी सुन रही थी। ‘टीनू रात को बाहर घूम रहा है। अंधेरा है। एक पेड़ ने थप्पड़ मारते हुए टीनू से कहा-‘‘तुम रात को कहां जा रहे हो? घर में रहना चाहिए।’ रिमझिम ने बीच में ही टोक दिया-‘‘पापा। पेड़ थप्पड़ मार सकता है? पेड़ के कोई हाथ होते हैं?’’ टिया स्कूल में अंग्रेजी का जी (ळ) बनाना सीख रही है। झल्लाकर मैडम ने कहा-‘‘मेधा। तूने तो मेरा दिमाग ही चाट दिया।’’ मेधा उठती है और मैडम का माथा चाटते हुए पूछती है-‘‘दिमाग तो ऐसे चाटते हैं। मैंने पहले कब चाटा?’’ अहमद अपने चाचू के साथ पटरी के किनारे साईकिल पर घूम रहा था। धड़धड़ाती हुई रेल गुजरी तो चाचू ने भतीजे से कहा-‘‘रेल को टाटा करो।’’ छह साल का भतीजा जवाब देता है-‘‘क्यों करूं? रेल कौन सा मेरे टाटा का जवाब देगी।’’ मृगांक भोजन कर रहा है। वह जल्दी-जल्दी खा रहा है। मां कहती है-‘‘बेटा, आराम से। थाली कहीं नहीं भाग रही है।’’ बच्चा तपाक से जवाब देता है-‘‘थाली के कोई पैर होते हैं, जो वह भाग जाएगी।’’ अनुभव जंगल बुक देखकर खुश हो जाता है। दो-तीन बार देखने के बाद वह पूछता है-‘‘मोगली तो इंसान का बच्चा है, वह तो बोल सकता है लेकिन बघिरा, शेरखान, तबाकी तो जानवर हैं,वो कैसे बोल सकते हैं?


व ये कुछ उदाहरण हैं। बच्चों की वाकपटुता और समझदारी के हैं। यह आभास कराते हैं कि आज के बच्चों की समझ संदर्भ से और अपने अनुभव से तेजी से बदल रही है। ऐसे कई उदाहरण दुनिया के तमाम अभिभावकों के पास हैं। उन सभी के पास हैं, जो बच्चों की वास्तविक दुनिया के आस-पास रहते हैं। उनके पास हैं जो बच्चों की छोटी-छोटी बातों पर ध्यान भी देते हैं। तसवीर का दूसरा हिस्सा भी है। यह हिस्सा तो और भी चौंकाने वाला है। यह इस बात का भयावह संकेत है कि आज की पीढ़ी नया तो जानती है पर पुराने से अनजान है। होश संभालने से ही नेहादा ने डिब्बाबंद व पाउच थैली का दूध ही घर में आता हुआ देखा है। एक दिन नेहादा ने सैर-सपाटे के दौरान तालाब किनारे मैली-कुचैली काली भैंस देख ली। वह तभी से हैरान है। अम्मी ने बताया कि इसे भैंस कहते हैं और इसके चार थन हैं। इन थनों से ही दूध निकलता है। बस तभी से नेहादा एक ही बात कह रही है-‘‘मैं अब दूध नहीं पिऊंगी। छिः, गंदी, काली और मैली कुचैली भैंस का दूध होता है, आज पता चला। छिः! छिः!’’


व सिया के घर में पैकिंग किया हुआ आटा आता है। एक दिन उसने बाजार में गेंहू की बालियों का चित्र एक बिस्किट के पैकेट में देखा। दूकानदार से पूछा तो दूकानदार ने बताया कि बिस्किट गेंहू से बना है। गेहूं की बाली में गेंहू को न देख दुकानदार ने सिया से कहा-‘‘ये तो बालियां हैं। गेंहू इन बालियों के अंदर होता है। अरे ! ये आटा है न ! गेंहू को पीसकर ही आटा बनाया जाता है।’’ सिया के लिए यह नई जानकारी थी।


व प्रांजल के घर में अत्याधुनिक डिजीटल घडि़यां लगी हैं। उसके हाथ में भी डिजीटल घड़ी है। किचन में इंडक्शन, ट्रेफिक लाईट्स के साथ-साथ उसका कैलकूलेटर भी डिजीटल है। एक दिन वह अपने क्लासमेट अफरोज के घर में गया। उनके घर में पारंपरिक दीवार घड़ी थी। मैनुअल अंकों की साधारण घड़ी में प्रांजल टाइम नहीं देख सका।


व जैसमाइन और मेगोलिया जुड़वा बहनें हैं। वह एक बारात में सुदूर किसी कस्बे में गईं। रात की बात थी। दोनों लालटेन देखकर हैरान हो गईं। शहर में बिजली गुल नहीं होती। उनके घर में तो इनवर्टर है। लेकिन लालटेन। कांच की चिमनी। चिमनी के अंदर बाती। केरोसीन तेल के साथ-साथ हवा में भी लालटेन का न बुझना उनके लिए हैरानी से भरा था।


हर नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से बहुत आगे की सोचती है। सब ऐसा कहते हैं। यह भी कहते हैं कि आज जो पूरा है, कल अधूरा लगेगा। आज जो अधूरा है कल पूरा होगा। अक्सर बड़े-बूढ़े कहते हैं कि आज जो हो रहा है,हमारे जमाने में तो ऐसा नहीं होता था। बड़े हमेशा एक ही बात कहते हैं-‘‘उफ! आजकल के बच्चे। तौबा-तौबा। पूरे हाईटेक हैं।’’ समय के साथ-साथ चीज़ें बदलती हैं। आज के बच्चे बस्ते के बोझ तले दब गए हैं। वह अंकों की दौड़ में तो आगे हैं, लेकिन जीवन के अनुभव से बेहद दूर होते जा रहे हैं। वह भले ही सौ में से नब्बे अंक ला रहे हैं। लेकिन जीवन की पढ़ाई में वह लगातार पिछड़ रहे हैं। आज के बच्चे प्रकृति से दूर हो रहे हैं। खेल-खिलौने बदल गए हैं। हाईटैक की दुनिया में अधिकतर समय देने से उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता भी कम हो गई है। फास्ट फूड ने बच्चों की नज़रें भी क्षीण कर दी हैं। एकाग्रता भी कम हो रही है। सुनने, समझने, पढ़ने और लिखने के प्रति लगाव भी कम होता जा रहा है। माता पिता के पास समय नहीं हैं। एकाकी परिवार के चलते दादा-दादी और नाना-नानी का अनुभव बच्चों से कोसों दूर हो गया है। जंगल दूर चले गए हैं। आस-पड़ोस और नाते-रिश्तेदारी सिमट गई है। यह सब बातें बहुत हद तक सही हैं। लेकिन कोसने भर से काम नहीं चलने वाला है। हर नई पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी सूचना, ज्ञान और अनुभव का हस्तांतरण तो करे। इस मामले में बाल कहानियां बहुत कुछ करती आई हैं। आज भी कर सकती हैं। बशर्ते कहानियां भी समय के साथ बदले।


अब तक का बाल साहित्य बाल साहित्य ही है जो बहुत हद तक नई सूचना तकनीक के चलते बच्चों की सृजनशीलता और काल्पनिकता को बचाए और बनाए रख सकता है। लेकिन बाल साहित्य उस तरह से नहीं बदल रहा, जिस तरह बच्चों की दुनिया बदल रही है। आज भी बच्चों के लिखी गई कहानियों में वह सब है, जो अब नहीं होना चाहिए। कुछ उदाहरण यह हैं।


व कहानियों में बड़े बच्चों के साथ मारपीट करते हैं। उन्हें अपमानित करते हैं। उन्हें नादान और नामसझ मानते हैं। बच्चे तो ऐसे ही बड़े हो जाते हैं। उन पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। उनकी जरूरतों पर खास ध्यान देने की जरूरत ही क्या है। बच्चे तो कोरी स्लेट होते हैं। कहानियों में उपदेश,सीख और संदेश इसलिए दिये जाते हैं, ताकि वे आदर्श नागरिक बनें। अच्छा बच्चा बनें। अच्छा विद्यार्थी बनें।

व बच्चे प्यार से नहीं फटकार से समझते हैं। अच्छी आदतों के लिए उनकी पिटाई भी जरूरी है। घर के अन्य सदस्यों की बातें, समस्यायें महत्वपूर्ण हैं।घर परिवार और समाज में बच्चों को भी गिनना चाहिए। यह कहानियों में एक सिरे से गायब है। ऐसी कहानियों का अभाव है, जिसमें शिक्षक बच्चों को आजादी देते हों। अधिकतर कहानियों में शिक्षक ऐसा पात्र बनकर उभरता है मानों बच्चों को ठोक-पीठ कर संस्कारित करने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी उसी की है।


व ऐसी कहानियों की भरमार है जिसमें स्कूल का काम अक्षर ज्ञान देना है। बच्चों का काम पढ़ाई करना है। कक्षा में प्रथम आना ही सबसे बड़ा लक्ष्य है। ऐसी कहानियां खूब हैं जिसमें यह स्थापित किया जाता है कि अच्छे बच्चे वहीं हैं जो पढ़ाई में होशियार होते हैं। ऐसी कहानियांे का अभाव है जो यह स्थापित करती हों कि पास-फेल होना महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है साल भर में क्या सीखा? क्या जाना और क्या समझा? यह महत्वपूर्ण है।


व अधिकतर कहानियां बच्चों में यह भावना भरने की कोशिश में दिखती हैं कि पढ़ोगे तो नौकरी मिलेगी, नहीं तो फिसड्डी रहोगे। ऐसी कहानियां कम ही हैं जो पढ़ाई को जीवन का हिस्सा मानती है। वे तो पढ़ाई को रोजगार और पैसा कमाने, डॉक्टर, इंजीनियर बनाने का औजार है। बच्चों में उत्साह, साहस और मानवीय गुणों का संचार करने वाली कहानियों से अधिक अधिकतर कहानियां बच्चों को आज्ञाकारी, शांत स्वभाव, रोज सुबह उठना, रोज स्कूल जाना जैसी आदतों पर केंद्रित हैं।


व आज भी कई कहानियां लड़कों और लड़कियों के काम गिनाने लगती हैं। बच्चों को बच्चा मानना से अधिक बच्चों में लड़का और लड़की को अलग-अलग रेखांकित करने वाली कहानियां ही ज्यादा पढ़ने को मिलती हैं। एक था मोटू एक था छोटू। एक पढने में होशियार तो दूसरा बुद्धू। आरंभ ही तुलनात्मक। भाईयों में। बहिनों में। मज़ा चखाने वाली कहानियां। उसने ईंट का जवाब पत्थर से दिया, साबित करने वाली कहानी। धोखा देने वाले को चतुराई से धोखा देने वाला पात्र हीरों बनकर उभरता है।


व पुरुषवादी सोच, मुखिया, जो बड़ों ने कह दिया, वही अच्छा है। वही सही है। इन्हें पुष्ट करने वाली कहानियां खूब प्रकाशित हो रही हैं। जो बच्चे मेहनत करते हैं, सफलता उन्हें ही हाथ लगती है। जो बच्चे आलसी होते हैं, उनका नाश होना तय है। असल में स्थिति कुछ ओर है। मेहनत तो मजदूर करते हैं। वे भी ताउम्र अभाव में ही रहते हैं। शहर वाले होशियार और गांव वाले अनपढ़,अज्ञानी और बेवकूफ। शहर से आने वाला एक ही दिन में गांव वालों का जीवन बदल देता है। इस सोच की कहानियों का अंबार है। जो बच्चे घर में भी और स्कूल में भी काम करते हैं। बड़ों का कहना मानते हैं, वह बच्चे अच्छे होते हैं। बचपन में कष्ट सहने वाले ही कामयाब होते हैं। बच्चों में छोटों के प्रति प्यार और बड़ों के प्रति आदर का भाव महत्वपूर्ण है। सही-गलत का अंतर करना इतना महत्वपूर्ण नहीं है।
व कई कहानियां बच्चों की मासूमियत को खूबी के तौर पर नहीं बल्कि मखौल उड़ाने की शैली में छपती हैं। यह कहानियां बड़ों के चेहरे पर मुस्कान तो ला सकती है। लेकिन बच्चों को कैसा लगता होगा? इस पर रचनाकार नहीं सोचते। यह ठीक उसी प्रकार से है कि किसी बच्चे के बचपन में उसके नग्न फोटो बार-बार उसके बड़े होने के बाद भी दिखाई जाए। अधिकतर कहानियां आदर्शवादी समाज बच्चों के सामने परोसने की कोशिश करती नज़र आती है। यथार्थ में ऐसा है नहीं। फिर ऐसी कहानियां बच्चे क्यों कर पसंद करेंगें?


बाल साहित्य से उम्मीदें बाल साहित्य के प्रति संवेदशीलता का प्रायः अभाव ही दीखता है। प्रकाशक क्या और संपादक क्या। पत्र क्या और पत्रिकाएं क्या। रचनाकार भी इससे अछूते नहीं हैं। बालसाहित्य की आज जो स्थिति है, उसके लिए यह सब जिम्मेदार हैं। खुद को बालसाहित्य के पुरोधा कहलवाने वालों ने इसे सम्मानजनक स्थिति में पहुंचाने के लिए ठोस काम नहीं किए। आज स्थिति और भी बदतर है। जहां साहित्य में किसी भी अखबार में दो कालम में प्रकाशित रचना का पारिश्रमिक एक हजार रुपए से कम नहीं है। वहां बाल साहित्य को छापने वाले पत्र और पत्रिकाएं रचनाकारों को मानदेय क्या मानद प्रति भी नहीं भिजवातीं।

रचनाकारों की स्थिति यह है कि वह प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में न छप पाने से इतने कुंठित हो जाते हैं कि मिशनरी भाव के नाम पर खड़े पत्र-पत्रिकाओं की सदस्यता भी लेते हैं और उन्हें थोक में रचनाएं भेजते रहते हैं। इससे पाठकों के मध्य भी श्रमसाध्य होकर लिखी रचनाएं नहीं पहुंचती और बालमन की कसौटी पर खरी उतरने वाली रचनाओं के अभाव में बालमन भी बालसाहित्य से दूर होता जा रहा है। कई कारणों में एक बड़ा कारण यह भी है। व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं की पहुंच भी एक बडा कारण है। फिलहाल यहां विषय अत्याधुनिक समय में कहानियों की प्रकृति पर है। चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा है, ऐसा भी नहीं है। बालमन को छूती भावपूर्ण, मनोरंजनात्मक और आधुनिक समय के लिए जरूरी भाव बोध वाली कहानियां भी पढ़ने को मिलती हैं।
व ’अपना दर्द’ कहानी शशि श्रीवास्तव की है। कुट्टू कक्षा चार में पढ़ता है। एक दिन उसके स्कूल में पढ़ाने वाले अध्यापक की मां का देहांत हो गया। छुट्टी हो गई। वह बड़ा खुश हुआ। अब वह अक्सर सोचता कि कोई न कोई मर जाए तो छुट्टी हो जाए। जब उसकी दादी का देहांत हुआ और उसे सपरिवार गांव जाना पड़ा तो उसे अपनी प्रिय दादी की मृत्यु से बहुत बुरा लगा। उसने मां को बताया तो मां ने उसे समझाया। कुट्टू समझ गया था कि मरने वाले के परिवार का भी यही बुरा हाल होता होगा, जैसा उसका और उसके परिवार का हुआ है।


व ‘मेरी डायरी के कुछ पन्ने’ कहानी रवि कुमार की है। एक बच्चा जो चौथी कक्षा में पढ़ता है, उसे नई क्लास टीचर ने सबसे अलग बिठा दिया गया। एक छोटा सा टेबिल और एक छोटी सी कुर्सी दी गई। वह बहुत खुश हुआ। कक्षा आठ में पहुंचा तो टीचर ने कह दिया कि सबसे पीछे बैठना है। अब बच्चे को पता चला कि वह हरिजन का बेटा है इसलिए उसके साथ कक्षा चार से भेदभाव होता आया है। यह भेदभाव यहीं समाप्त नहीं हुआ। बारहवीं पास करने के बाद शहर में जब नया अस्पताल खुला तो वहां कम्प्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर का काम जानने और स्टैनो-अंग्रेजी टाइपिंग करने के बाद भी स्वीपन की नौकरी मिली। एक अन्य मेडिकल कॉलेज में हर जाति के लोगों को स्वीपर का काम तो मिला लेकिन उस बच्चे को कठिनाई वाला काम करने को कहा जाता। कटी लाश उठाना,सीवर में उतरना। बाद में वह बच्चा यूनिवर्सिटी में काम करने लग जाता है। वहां भी वह स्वीपर है। 95 और स्वीपन हैं। लेकिन मैला साफ करना, लैट्रीन की टॅकी साफ करना उसकी जिम्मेदारी है। कहानी का अंत सवाल उठाता है कि बाज़ार में बिकने वाल चीज़ें कीमती हैं। लोग घर के टॉयलेट के लिए मंहगा सामान खरीदते हैं लेकिन स्वीपर सस्ता चाहिए। क्या स्वीपर एक इंसान नहीं। क्या उसकी कोई कीमत नहीं।


व ‘आज़ादी का जश्न’ कहानी हरीश निगम की कहानी है। नेहा के दादा जी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं। पंद्रह अगस्त को उन्हें सम्मानित किया जा रहा है। जब वे आते हैं तो नेहा घर में दो साल से पिंजरे में बंद तोते के बारे में बताती है। तोता पिजरे के तारों को चोंच से घिसता रहता है लेकिन कुछ बोलता नहीं। नेहा के दादा बातों ही बातों मंे कहते हैं कि हम भी तो गुलाम थे और आजादी पाने के लिए संघर्ष करते रहे। ये तोता भी खुली हवा में सांस लेने के लिए बेताब है। ये भी आजादी का दीवाना है। कहानी कुछ इस तरह से आगे बढ़ती है कि नेहा भी तोते को पिंजरे से आजाद करने के लिए तैयार हो जाती है।
व ‘गायब चोर’ कहानी अनुराग शर्मा की है। शहर में चोरियां बढ़ रही हैं। सी॰सी॰कैमरे में चोरी होती दिखाई तो देती थी, लेकिन चोर नहीं दिखाई देता था। गायब चोर को पकड़ने में कुछ बच्चे पुलिस की मदद करते हैं। प्रकाश आधारित विज्ञान के सिद्वांत से यह समझ में बात आ जाती है कि से प्रसिद्ध वैज्ञानिक चोर को पकड़ लेते हैं। वैज्ञानिक एक ऐसी चादर का निर्माण कर लेता है, जिसे ओढ़ने पर वह गायब-सा दिखाई देता है। यही कारण है कि वह सी॰सी॰ कैमरे में नहीं आ पाता। लेकिन बच्चों से दो महीने से आए इस वैज्ञानिक ने अपने आविष्कार के बारे में चर्चा कर ली थी। यही चर्चा और बच्चों से संवाद के कारण वह पकड़ा गया।
व ‘जाम में फंसा जन्मदिन’ कहानी पंकज चतुर्वेदी की है। महानगरों में यातायात व्यवस्था एक छोटी सी लापरवाही के चलते घंटों सड़क पर गुजारने को बाध्य कर देती है। कहानी एक मकसद के साथ आगे बढ़ती है। रमन का व्यवहार चालक और परिचालक के साथ असामान्य था। कई बच्चे थे जो बस में बिना टिकट यात्रा करते रहते थे। बस की चाबी निकालकर रमन का भागना इस कहानी का केंद्रबिंदु है। उसका जन्मदिन प्रभावित होता है। कारण बिना चाबी के बस कैसे चले। आगे कैसे बढ़े। दिलचस्प है कि रमन और उसके सहपाठी मान लेते हैं कि बहुत कुछ गलत हुआ है और भी बहुत कुछ गलत हो सकता था।

ऐसी कहानी प्रायः बहुत कम ही पढ़ने को मिलती है। सरल, सहज और स्वाभाविक ही नहीं। मन-मस्तिष्क में देर तक कौंधती कथावस्तु ही सफल कहानी है।


व ‘लौटी खुशी’ कहानी डॉ॰दर्शन सिंह आशट की है। यह कहानी गप्पू और उसके दो खिलौने टैडी बीयर और बार्बी गुडि़या के आस-पास घूमती है। गप्पू दोनों खिलौने से खेलता है। लेकिन बार्बी गुडि़या टैडी बीयर को भला-बुरा कहती है और खुद को बेहद सुंदर बताती है। नाराज होकर वह नाचना छोड़ देती है। गप्पू भी उसे जूतों के साथ एक कोने में फेंक देता है। बार्बी को अहसास होता है कि यह तो उसने गलत कर दिया। वह सोचती है कि उसने टैडी बीयर का दिल दुखाया है और नाराज होकर मैंने अपना ही नुकसान कर लिया है। क्यों न मैं अपना व्यवहार बदलूं। यदि मैंने नाचना शुरू नहीं किया तो गप्पू मुझे कबाड़ में दे देगा। कोई संदेश नहीं। बेजान चीजों का इस्तेमाल कर भी मानव व्यवहार क्या हो, पर आधारित ये सफल कहानी है।


व ‘बोली पतंग’ कहानी इंद्रजीत कौशिक की है। पतंग और पक्षियों के संवादों से भरी कहानी है। एक ओर पक्षी एक-दूसरे को पतंग से सावधान रहने की बात करते हैं तो वहीं पतंग पक्षियों को निश्चिंत होकर आसमान में उड़ने की सलाह देती है। तभी आसमान में उड़ रही चील जमीन में खरगोश पर घात लगाने की तैयारी ही कर रही थी कि पतंग ने चील को अपनी डोर में उलझा दिया। वहीं खरगोश सतर्क होकर झाड़ी में छिप जाता है। अब सब पक्षी पतंग के साथ आसमान की सैर करने लगते हैं।


व ‘मैथ्स से डरना क्या’ कहानी आलोक पुराणिक की है। कक्षा 9 की इरा मैथ्स में 60 मार्क्स लाई है। घर में तूफान मच गया है। मम्मी है कि इरा को इंजीनियर बनाना चाहती है। पापा सपोर्ट कर इरा को इतना तो समझा ही लेते हैं कि दसवीं तक तो मैथ्स मन लगाकर पढ़ लो। आगे भले ही मैथ्स मत लेना। इरा ने जमकर मैथ्स में ध्यान लगाया। अभ्यास किया। इरा को जल्दी ही पता चल गया कि वह बेकार मंे ही मैथ्स को लेकर टेंशन में थी। दबाव से उसे मैथ्स से चिढ़ हो गई थी, लेकिन अब उसे आनंद आने लगा। दसवी का रिजल्ट आया तो इरा 100 में से 100 अंक ले आई। सब खुश थे।

इरा भी हैरान थी कि जो सब्जेक्ट उसे नापसंद था, वह उसी में विजयी हो गई। इरा जब इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर आई तो पापा ने हंसते हुए कहा-‘‘मैथ्स से परे भी जिंदगी में बहुत कुछ है, पर जो दिल से मैथ्स का डर निकाल देता है, उसे मैथ्स से आसान कुछ भी नहीं लगता।’’


व ‘अजगर हुआ पंक्चर’ कहानी विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी की है। इस कहानी में अजगर के स्वभाव को बताया गया है। अजगर विषैला होता ही नहीं है। वह तो अपने शिकार को दबोचता है और फिर उस पर फंदे की तरह उस पर लिपट जाता है। उसकी पकड़ कसती चली जाती है,परिणामस्वरूप दम घुटने से शिकार मर जाता है। लेकिन जंगल के छोटे जानवर सेही के कांटों से अजगर जो हवा भरकर अपने शरीर को फुलाता चला जाता है, इस बात के जानकार पशु उसमें सेही के कांटे चुभा-चुभाकर उसे पंक्चर करते चले जाते हैं। परिणाम यह होता है कि वह कछुआ पर अजगर अपनी पकड़ ही नहीं बना पाता। यह कहानी भले ही पशु-पक्षियों को पात्र बनाकर बुनी गई है लेकिन बच्चे इस कहानी को पढ़ते हुए आनंद भी लेंगे और अजगर के बारे में रोचक ढंग से जानकारी भी जुटा लेंगे।


व ‘दोस्त एलबोट्स’ कहानी पद्मा चौगांवकर की है। यह कहानी एलियर एलबोट्स की है। यह दूसरे ग्रह से आया है और जंगली जानवरों से बात कर रहा है। वह केवल 13 घंटे के लिए धरती पर आया है। उसके ग्रह वालों ने उसे पृथ्वी का अध्ययन करने के लिए भेजा है। जंगल में बेहद गर्मी है। पानी की किल्लत है। वह बताता है कि आखिर पानी कम क्यों हो रहा है। गरमी लगातार बढ़ती क्यों जा रही है। भले ही इसे सूचनात्मक कहानी कहा जा सकता है लेकिन यह बच्चों को नए पात्र के रूप में पसंद आएगी। बच्चों में नए ग्रह के प्राणी के बारे में जानने की उत्सुकता बनी रहती है। भले ही इस कहानी के माध्यम से पेड़,बारिश,जल की महत्ता को फोकस किया गया है। परंपरागत रचनाकार इसे उपदेशात्कम कहानी बना देता।


व ‘अनूठी दोस्ती’ कहानी आरती आस्था की है। अग्रिम क्रिकेट का अच्छा खिलाड़ी है। वह अच्छा गायक भी है। लेकिन उसे किताबों से बेहद चिढ़ है। वहीं उसकी बहिन किताबों में ही डूबी रहती है। अग्रिम को आश्चर्य होता है कि कोई कैसे इन बेजान और नीरस किताबों में अपना सिर खपाता है। कहानी में दो घटनाएं ऐसी घटती हैं कि अग्रिम को खुद ही अहसास हो जाता है कि किताबें तो बेहद अनमोल हैं। उसे अपने पर बीती दो घटनाओं से यह सबक मिल गया कि किताबें तो अनोखी दोस्त होती हैं। यह कहानी किसी संदेश और सीख देने वाली कहानी है। न ही कोई बड़ा अग्रिम के सामने ज्ञान बघारता है। कोई भी अग्रिम का अपमान नहीं करता। ऐसी कहानियां आज के बच्चे पसंद करते हैं।


व ‘घमंडी बुलबुल’ कहानी रचना सिद्धा की है। जंगल के पशु-पक्षी पात्र हैं। लेकिन इसका कहन और केंद्रीय भाव बेहतरीन है। बुलबुल अच्छी गायिका है। उसका शो सुनने के लिए अपार भीड़ जुटती है। उसे गलफहमी हो जाती है कि वही सब कुछ है। कुछ ऐसा घटता है कि वह अकेले शो करने की बात पर अड़ जाती है। शो की मंडली अपना अलग ग्रुप बना लेते हैं। उधर बुलबुल को शोर करने के लिए बुलाया जाता है। लेकिन अकेले शो करते हुए उसे लगता है कि दर्शक ऊबने लगे हैं। तीन चार शो में ऐसा ही होता है। जल्दी ही उसे अहसास हो जाता है कि केवल अच्छी आवाज़ ही शो के लिए काफी नहीं है। संगीत देने वाली पूरी टीम का भी महत्व है। वह क्षमा मांगती है और फिर से पुरानी टीम में वापिस लौट आती है।


व ‘सबक’ कहानी चित्रलेखा अग्रवाल की है। यह कहानी भले ही जंगल के जानवरों को पात्र बनाकर लिखी गई है। लेकिन कहानी के पात्रों में और आज के बच्चों की स्कूली दुनिया में बेहद समानता है। यही कारण है कि बच्चे इस कहानी को पसंद करेंगे।

प्रिंसिपल शेर सिंह के पास हंटर है, गलती करने पर वह स्टूडेंटस को मारते हैं। डर के मारे स्कूल की बहुत सारी चीज़ें सुधर रही हैं। लेकिन हंटर का डर बेहद घातक है। एक बार कुछ ऐसा होता है कि एक स्टूडेंटस को पीटने के लिए हंटर उठाते हैं,तभी उनका अपना बच्चा वहां आ जाता है और आंख बंद कर हंटर मारने की आदत से वह अपने बच्चे को पीट देते हैं। आंख खोलने पर प्रिंसिपल शेरसिंह जब अपने बच्चे की पीठ देखते हैं तो उनकी आंखों से आंसू निकल जाते हैं। अंत। यही कि प्रिंसिपल ठान लेते हैं कि स्कूल अब प्यार से सुधारा जाएगा मार से नहीं।


बाल साहित्यकारों से सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए तो हर कहानी मनोरंजन के साथ कुछ निहित उद्देश्यों की पूर्ति करती है। लेकिन आज भी तमाम कहानीकार हर कहानी में बच्चों को अच्छा बनाने की फिक्र में लगे हैं। आज भी बादल, परी, जादू, पशु-पक्षी के आस-पास घूमती कहानियों की भरमार है। आदर्शवादी समाज उनकी कहानियों में दिखाई देता है। यदि आदर्शवादी कहानियों से बच्चों का भला होना होता तो पिछले 100 सालों में सैकड़ों कहानियों का असर दिखाई देता। फिर? सीख,संदेश और मानवीय गुणों की घुट्टी अप्रत्यक्ष तौर पर आए, न कि स्थापित करते हुए, पात्रों के माध्यम से ठूंसा जाए।


आज बच्चों के पास मनोरंजन के कई साधन हैं। कार्टून फिल्में हैं। मोबाइल है, चैनलों की भरमार है। इंटरनेट है। वीडीयों गेम्स हैं। कलरफूल एक्सरसाइजेस किताबें हैं। ऐसे समाज में बाल कहानियां क्यों नहीं अपना ट्रेंड बदलें?


क्या आज भी बाल कहानियां सूचना और ज्ञान देने को आतुर हैं? आज भी क्यों हमारी बाल कहानियां बच्चों से हर अच्छी बातों की उम्मीद करते हैं? आज भी हमारी बाल कहानियां ये क्यों कहती नज़र आती है कि एक था गंदा बच्चा। एक था शरारती। शैतान। एक बच्चा था जो देर से उठता था। एक बच्चा था जिसकी राईटिंग बहुत अच्छी थी। सब उसे अच्छा मानते थे। कुछ खास लक्षणों वाले बच्चों को अच्छा बताना और अधिकतर बच्चों को नाकारा मानना बच्चों के साथ एक तरह की मानसिक हिंसा है।


आज भी बच्चे जंगल बुक को पसंद करते हैं। गुलिवर की कहानियां भी और पंचतंत्र की भी। लेकिन यह एक खास वर्ग के बच्चों तक ही सीमित है। पांच साल के बाद आज का बच्चा धीरे-धीरे यथार्थपरक सामग्री चाहता है। वह कहानियों पर सवाल उठाता है। हम बच्चों के हर सवाल का जवाब देने से यह कहकर नहीं बच सकते कि कहानी है। कहानी में सब कुछ हो सकता है। कुछ हद तक यथार्थ, काल्पनिकता, अतिकाल्पनिकता और अकल्पनीयता में हमें अंतर करना होगा।


आज की कहानियों में मनोरंजन को हाशिए पर रखना ठीक न होगा। बेसिर-पैर की कथावस्तु भी नहीं चलेगी। कहानी में उद्देश्य निहित हो, इससे इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन वह कहानी को पढ़ते-पढ़ते दिखाई दे, इससे अच्छा है कि वह कहानी को पढ़ लेने के बाद विचार करने पर उभरे। कल और आज के देशकाल से इतर बच्चों को भविष्य की कहानियां ज्यादा पसंद आएगी। यह चुनौतीपूर्ण है। समर्थ रचनाकारों को भविष्य की कहानियां अब लिखनी ही हांेगी।
सन्दर्भ:
 एन॰सी॰ई॰आर॰टी॰ की प्राथमिक विद्यालयों की पाठ्य पुस्तकें, उत्तराखण्ड और उ॰प्र॰ की पाठ्य पुस्तकें आदि।
 आजकल,नया ज्ञानोदय,साक्षात्कार,मधुमती,साहित्य अमृत आदि पत्रिकाओं के बाल साहित्य विशेषांक।
 जनसत्ता,दैनिक ट्रिब्यून,नेशनल दुनिया आदि दैनिक पत्रों के साप्ताहिक परिशिष्ट।
 अंतरजाल के बाल साहित्य केंद्रित ब्लॉग्स,गद्य कोश एवं हिन्दी समय आदि।
 चकमक, नंदन, रीडर्स क्लब बुलेटिन, बालहंस, लल्लू जगधर, देवपुत्र, अक्कड़-बक्कड़, बाल वाणी, बाल वाटिका, बाल भारती, बाल भास्कर, बाल बिगुल, नन्हे सम्राट, बच्चों का देश, हंसती दुनिया, बाल लेखनी, चंदामामा, चंपक आदि पत्रिकाएं।

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