‘कहानियाँ बालमन की ’

कुछ दिन पहले ही मुझे इन सुप्रसिद्ध साहित्यकार मनोहर चमोली की पुस्तक ‘कहानियाँ बालमन की ’पढ़ने का अवसर मिला। यह श्वेतवर्णा प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। मूल्य 225 रुपए है। प्रत्येक कहानी में चित्र भी है। इसका आवरण इतना शाही और नीला चमकदार है कि मैं इसकी ओर खींचती चली गई। आवरण पर दो नन्हे बच्चों को देखकर ही पता लग गया कि कहानियाँ जिज्ञासापूर्ण हैं और बाल संसार की रहस्य भरी परतें खोलकर नन्हें मुन्नों को आश्चर्य में डुबो देंगी। मुझे इस पुस्तक को खोलने की ऐसी ललक पैदा हुई कि तुरंत पढ़ने बैठ गई और मैंने देखा कि इसमें कुल मिलाकर 40 कहानियाँ हैं।

ये बहुमुखी कहानियाँ है। बच्चों के समुचित विकास की कहानियाँ हैं। ये समस्त वर्गों की कहानियाँ हैं। कहानियों में विषय की बाहुल्यता व विभिन्नता है। चाहे मानव मूल्यों व संस्कारों के बीजारोपण की बात हो, चाहे मार्ग दर्शन की। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो या आधुनिक जीवन शैली की बात। लेखक बहुत ख़ूबसूरती से कहानियाँ गढ़कर खेल-खेल में ही नादान व भोले बच्चों के कौतूहलपूर्ण संसार की परतें खोलते नजर आते हैं। लेखक ने शिक्षा व्यवस्था, शिक्षा नीति, परीक्षा व गृहकार्य जैसे विवादित विषयों पर भी लेखनी चलाई है क्योंकि इनका सम्बन्ध भी ख़ुशहाल बचपन से है। बाल मनोविज्ञान से है। ज़्यादातार कहानियों में शीर्षक से पता ही नहीं चलता कि कहानी क्या है और अंत क्या है। इससे पाठक की जिज्ञासा अंत तक बनी रहती है।

‘मज़ाक अब नहीं‘, ‘छोटी जो बड़ी वो‘,‘ऊंट का पावर हाउस‘ ऐसी ही कहानियाँ हैं। शब्दों का चयन बहुत सावधानी से किया गया है। ताकि बच्चों के पढ़ने व समझने में कोई व्यवधान न पैदा हो। छोटे-छोटे वाक्य हैं। जिससे कहानियाँ सहज ही दिल में उतरने वाली हैं। कुछ कहानियों में पात्र पशु-पक्षी, चींटी-तितलियाँ आदि हैं। बच्चों को ये बहुत अच्छे लगते हैं। इसीलिए वे कहानियाँ उनको अपने बहुत निकट लगेगी। बालमन की कहानियों में शरारत है, उछलकूद है। नादानी है, नोंक-झोंक है। कहानियाँ पढ़ते समय मीठी-सी हंसी होंठों पर थिरकने लगती है। कहानियाँ केवल मनोरंजक ही नहीं बल्कि उनकी सोच को एक तार्किक दृष्टि मिलती है। ’अनुभवों का स्कूल’ में परीक्षा की बात होते ही खुशियों की पाठशाला एक झटके से डर की पाठशाला बन गई। स्कूल छोड़ मधुमक्खी, तितली व अनेक जानवर प्रकृति से सीखने लगे या अपने अनुभवों से। प्रकृति सच्चे अर्थों में हमारी गुरू है। इसी कारण प्रकृति से सीखने पर ज़ोर दिया गया है।

’छोड़ दिया फुदकना ’कहानी ने इस कहावत को याद दिला दिया कि ‘करत-करत अभ्यास से जड़ मति होत सुजान।’ मेढक की तरह फुदकने वाली बिल्ली ने बार-बार अभ्यास करके पैरों को धीरे से उठाना और रखना सीख लिया। फिर तो उसके आने की किसी को खबर ही नहीं होती थी। ’ऊंची नहीं फेंकता ऊंट’ कहानी में शेख़ी बघारने वाले ऊंट को बंदर बड़े दिलचस्प तरीके से सबक सिखाता है। जरा देखिये तो-बंदर ऊंट से बोला-“तुम्हें मेरी तरह से इस तरबूज को अपनी पीठ पर ढोकर लाना होगा। उठाओ। बीस कदम सही, जरा चलकर तो दिखाओ। मगर ध्यान रहे ! तरबूज लुढ़कना नहीं चाहिए।’

ऊंट सकपका गया। भला वह पहाड़ जैसी पीठ पर गोलमटोल तरबूज कैसे रख पाता। इस विषय पर अनेक कहानियाँ पढ़ी हैं पर यह लीक से हटकर नयापन लिए हुए विनोद पूर्ण कहानी है। ’मुलाक़ात और बात’ कहानी में चीटीं और हाथी की नोकझोंक पढ़कर तो हँसी की फुलझड़ियाँ छूटने लगेंगी। संवादों का आनंद लीजिये-चींटी बोली -“मेरी पीठ खुजाओ ।“ हाथी हैरान ।अपनी बारी आने पर हाथी इतराता बोला-“मुझे गोदी में उठाओ। झूला झुलाओ।“चींटी हैरान । ‘ऊंट का पावर हाउस‘, ‘चख लिया शहद‘, ‘शेर है तो बिजली है‘, ऐसी कहानियाँ हैं जो बताती हैं कि पशु किस तरह हमारे मित्र है। इससे बच्चों में उनके प्रति दया, माया और उनके प्रति प्रेम की भावना विकसित होगी।

’छोटी जो बड़ी वो’ कहानी मुझे बहुत अच्छी लगी। इसमें एक छोटी पेंसिल को उसके सुनहरे अतीत के बारे में बताकर उसकी उदासी दूर की गई है। पर इस कहानी में बहुत गहराई है। वैसे तो बाल कहानियाँ बड़े भी पढ़ते हैं। पर यह कहानी जरूर पढ़ें और छोटी पेंसिल की जगह अपने बुजुर्गों को रखकर देखंे, जिससे नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच की खाई पटे। ‘कम कमाया अधिक गंवाया’, ‘आग का नाश्ता’, ‘खाना मगर ध्यान से’। यह कहानियाँ विज्ञान की किरणों से भरपूर हैं। कहानी ’सॉरी साजिया’ गरीब वर्ग को छूती है। कक्षा में लड़कपन की बहसाबहसी और नोंक-झोंक ने गम्भीर रूप ले लिया। जिससे गरीब साजिया को चोट पहुँची। गलती चाहे नादानी में हुई, पर इन पर शुरू से ही विराम देने की बात कहकर अमीरी-गरीबी की खाई को पाटने का अच्छा प्रयत्न किया गया है।

’मैं भी दाना दूँगा’ कहानी में दादा जी का एक वाक्य ‘इस धरती पर इंसान ही इंसान रह जाएं तो ! पशु पक्षी समाप्त हो जाए तो ! तब क्या होगा? सोचा है कभी।” कहानी का कथ्य पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि करता है। ‘गलती’ शब्द बच्चों के लिए डिक्शनरी में होना ही नहीं चाहिए। गलती क्या होती है? बच्चे तो जानते ही नहीं। वे तो कौतूहलवश या कल्पना में गोता लगाते हुए वह कर बैठते हैं, जो उनकी नहीं अपितु बड़ों की दृष्टि में ग़लत होता है। नतीजन बिना सोचे समझे, मन की बिना सुने नादानों को सजा सुना दी जाती है। इस नज़रिए से ‘कैसी गलती किसकी गलती‘ कहानी खरी उतरती है।

‘ऐसे लगाया ध्यान’ कहानी परीक्षा में नक़ल करने वालों और न पढ़ने वालों की मानसिक उथल-पुथल व ग़लत उठाए कदमों को दर्शाती है। साथ में उनकी आँखे भी खोलती है जब बयार कहता है,”आज प्रिन्सिपल सर ने क्या कहा था ! सुना नहीं तूने? नक़ल करने वाला और नक़ल कराने वाला जेल की हवा खाएगा।”’असली हीरो’ कहानी एक गरीब बच्चे की कहानी है जो अभावों की दुनिया में पला है। मूक रहकर मन की व्यथा मन में ही रहने देता है। लेकिन उसकी टीचर ने प्यार व मित्रवत् व्यवहार से उसका दिल जीत लिया।

सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए सजा न देकर उपहार दिया। जिसके कारण उसकी सोच ही बदल गई और वह कक्षा का हीरो हो गया। छात्र व शिक्षक से जुड़ी बहुत सफल कहानी है। अंत में यही कहूँगी ’बालमन की कहानियाँ’ मनोरंजक व आनंदपूर्ण होते हुए भी सोच, तर्क व कौतूहल का पिटारा हैं। इस कहानी संग्रह के लिए मनोहर चमोली जी को हार्दिक बधाई। -सुधा भार्गव,जे ब्लॉक 703 सिं्प्रगफील्ड अपार्टमेंट, सरजापुरा रोड, बैंगलोर 560102 भारत। मोबाइल-9731552847। ईमेल [email protected]***

वरिष्ठ साहित्यकार सुधा भार्गव जी का मन बाल कहानियाँ लिखने में खू़ब रमता हैं। वे सुदूर बंगलुरु में रहते हुए हिन्दी को आत्मीयता से अपनाए हुए है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से उनकी दो पुस्तकें ‘जब मैं छोटी थी और मिश्री मौसी का मटका खूब चर्चाओं में हैं। ‘बुलबुल की नगरी’ भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से आ रही है। वे बच्चों के साथ भी खूब सक्रिय रहती हैं। सुधा जी से अभी मुलाकात नहीं हुई है। लेकिन अक्सर फेसबुक में और लाइव कार्यक्रमों में मुलाकात हो जाती है। मोबाइल पर भी। सुधा जी ने पहले तो स्वयं प्रकाशक से किताब मँगवाई। पढ़ी। पढ़कर कहानियों की मीमांसा-सी की। यह मेरे लिए प्रसन्नता का विषय है। उन्होंने मेरी कहानियों के शीर्षकों पर जो दृष्टि डाली। कहानियों के शीर्षक के मंतव्य को जिस तरह से पकड़ा वह अनुभव में पका लेखक ही कर सकता है। सुधा जी को धन्यवाद कहना उनके मंतव्य और मेरी कहानियों के प्रति उनके नजरिए की ताप को ठंडा कर देगा।

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