मजाक अब नहीं


गर्मी बहुत थी। इतनी गर्मी कि पेड़ों के पत्ते भी झुलस गए थे। गिद्ध ने अपने डैने फैलाये तो साँप बोल पड़ा,‘‘बारिश नहीं हुई। पानी के बिना जीवन नहीं। कई हैं जो मर ही जाएंगे। अब तुम्हारे मज़े ही मज़े हैं।’’
सियार ने चैंकते हुए पूछा,‘‘वो कैसे?’’
साँप ने बताया,‘‘अरे ! तुमने गिद्ध भोज के बारे में नहीं सुना? ये गिद्ध कोसों दूर मरे हुए जानवरों की गंध सूंघ लेते हैं। पलक झपकते ही बड़े से बड़ा जानवर चट कर जाते हैं।’’
हाथी को भी मजाक सूझा। बोला,‘‘कितनी अजीब बात है न ! ये गिद्ध झुण्ड में आ धमकते हैं। सड़ा-गला खा जाते हैं। हवा ही बता देती है कि आस-पास गिद्धों का झुण्ड है।’’
बंदर भी कम न था। कहने लगा,‘‘गिद्धों के शरीर से मुझे तो बदबू आती है। मैं यहां एक पल और भी नहीं रुक सकता। मैं यहां से जा रहा हूँ।’’
बूढ़ा गिद्ध बोला,‘‘हम ही यह जंगल छोड़कर जा रहे हैं। जब देखो, आप सब गिद्धों का अपमान करते रहते हो।’’
बूढ़े गिद्ध के हवा में उड़ते ही गिद्धों का झुण्ड भी पीपल के पेड़ से उड़ चुका था। धूप तेज हुई तो जीव-जंतुओं ने अपनी-अपनी राह ली। वहीं गर्मी बढ़ती ही जा रही थी। बारिश का नाम तक न था। जल के अभाव में जीव-जंतु बेहद कमजोर हो गए थे। उनकी भागने, दौड़ने और छिपने की ताकत कम हो गई।
एक दिन की बात है। अचानक जंगल में जंगली कुत्ते आ गए। कुत्तों के झुण्ड ने जानवरों पर हमला बोल दिया। छोटे-बड़े जानवरों को मारते हुए वे आगे बढ़ रहे थे। हर तरफ मरे हुए जानवरों का ढेर लगा हुआ था। कुछ देर बाद जंगली कुत्ते नदी पार कर दूर निकल गए। खुद को छिपाकर जान बचाने वाले जीव बाहर निकलने लगे। उन्होंने एक बैठक बुलाई।
जानवरों को परेशान देख शेर बोला,‘‘जंगली कुत्तों का झुंड बहुत बड़ा था। वह किसी नियम-कानून को नहीं मानते। हम कुछ सोच-समझ पाते, उससे पहले उन्होंने हमारे कई साथियों को मार गिराया। वे बेवजह हमला करते हैं। चाहे वे भूखें न भी हांे।’’
हाथी ने कहा,‘‘पीने का पानी लगातार कम होता जा रहा है। वहीं यह हमला हो गया है। सब सावधान रहें।’’
दो दिन बीत गए। अब जानवर बीमार होने लगे। जीव मरने लगे। कीट-पतंगों की आबादी बढ़ गई थी। मक्खियों और मच्छरों ने तंग करना शुरू कर दिया था। गर्मी के कारण यह सब हो रहा है। इस बात से सब सहमत नहीं थे। लेकिन, बीमारी का कारण जल्दी ही समझ में आ गया।
बिल्ली ने कहा,‘‘गिद्धों के न रहने से जंगल में सब कुछ गड़बड़ हो गया है।’’
हाथी चैंका। बोला,‘‘गिद्धों के न रहने से! भला उनके रहने, न रहने से क्या फर्क पड़ता है?’’
अब बंदर ने कहा,‘‘फर्क तो पड़ता है। हमारे आस-पास हर दिन कई जीव मरते हैं। हम जानते हैं कि जानवरों के शवों को वही गिद्ध कुछ ही घ्ंाटों में खा जाते है। बचती हैं तो केवल हड्डियां। गिद्धों के यहां न रहने से शव कई दिनों तक सड़ते रहे। बदबू से हमारा जीना मुश्किल हो गया। मक्ख्यिों और मच्छरों ने कितना परेशान कर दिया है। यह हम सब जानते हैं। बीमारियां ऐसे ही तो फैली हैं।’’
गिलहरी ने कहा,‘‘ओह ! ये समझना भी जरूरी है कि इस धरती पर हम सब एक-दूसरे का भोजन हैं। भोजन की एक कड़ी भी टूटी तो परेशानी बढ़ेगी ही। ज़रा सोचिए, जंगल में आग लगने से कितना घास-पात जल जाता है। जो जीव केवल घास ही खाते हैं उनकों दिक्कत होती है। यह तो हम सब जानते ही हैं। वैसे भी अब गिद्ध बहुत कम हो गए हैं।’’
अब चैंकने की बारी सियार की थी। वह बोला,‘‘कम हो गए हैं! कैसे?’’
बिल्ली ने बताया,‘‘गिद्ध, कौआ और सूअर जैसे कुछ ही जानवर तो हैं जो जंगल को बचाए और बनाए रखने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं।’’ बिल्ली की बात सुनकर सब चैंक रहे थे। वे बिल्ली को ऐसे देख रहे थे जैसे वह कुछ नई बात बता रही है।
बिल्ली बोली,‘‘हर रोज़ कई जानवर मरते हैं। बदबू चारों ओर फैल जाती है। तब क्या होता है? देखते ही देखते गिद्ध, कौआ और सूअर जैसे पशु-पक्षी मरे हुए जानवरों को चट कर जाते हैं। छोटे जानवरों के लिए तो कौआ, सूअर काफी हैं। लेकिन गाय, भैंस, हाथी, गधा, घोड़ा, गैंडा, दरियाई घोड़ा जैसे बहुत बड़े जानवरों के शवों के लिए ये गिद्ध ही उपाय है।’’
सियार ने झुंझलाते हुए पूछा,‘‘यह सब तो ठीक है लेकिन गिद्ध कम कैसे हो गए? यह बात समझ नहीं आ रही है।’’
बिल्ली ने जवाब दिया,‘‘वही तो बता रही हूँ। बड़े जानवरों के सड़े-गले शवों को खाकर गिद्ध कम हो रहे हैं।’’
हाथी ने भी पूछा,‘‘कमाल है! यह तो जंगल का नियम है। मरे हुए जानवरों को कुछ मांसाहारी जानवर हमेशा से खाते आए हैं। अब ऐसा क्या हो गया है जिससे वे कम हो रहे हैं?’’
बिल्ली ने सोचते हुए जवाब दिया,‘‘जंगल कटते जा रहे हैं। इंसानों की आबादी बढ़ती ही जा रही है। अपने खाने-पीने के लिए वह खेती करता है। फसलें उगाता है। फसलों में रसायन छिड़कता है। ताकि अधिक उपज हो। वे रसायन हमारे लिए खतरनाक होते हैं।’’
लोमड़ी भी समझ नहीं पा रही थी। बिल्ली से बोली,‘‘तुम भी कमाल करती हो। गाय, भैस, बकरी, हाथी जैसे जानवर तो हरी घास और फसलें चबाते हैं। लेकिन गिद्ध चबाते नहीं, नोचते हैं। क्या तुम्हें नहीं पता कि गिद्ध फसल नहीं खाते? गिद्धों को इंसानों की फसल से क्या लेना-देना है?’’
बिल्ली तपाक से बोली,‘‘लेना-देना है तभी तो बोल रही हूँ। इंसानों की बोई फसले शाकाहारी जानवर खा रहे हैं। इंसान उन फसलों में जहरीली दवाएं छिड़कता है। फल-फूल और पत्तियों से वही जहर पशु खाते हैं। पशुओं के शरीर में वह जहर खून में मिल जाता है। पशुओं के मरने के बाद गिद्धों के शरीर में भी वह पहुँचता है। इस तरह गिद्ध समय से पहले मर रहे हैं। समझ में आया?’’
हाथी ने हाँ में सिर हिलाया। कहने लगा,‘‘अरे! इस ओर तो मैंने कभी ध्यान नहीं दिया। गलती इंसान कर रहा है! भुगत हम रहे हैं।’’
चूहा बोला,‘‘हम चूहे तो इंसानों के खेत क्या उनके घरों में भी चले जाते हैं। इंसान अपने फायदे के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। मैं खुद कई बार इंसानों के मुंह से कीटनाशक वाली बात सुन चुका हूँ। आज समझ में आया कि यह कीटनाशनक क्या बला है?’’
लोमड़ी ने बिल्ली से कहा,‘‘तुम सही कहती हो। अब इंसानों को तो हम सुधार नहीं सकते। लेकिन हम इंसानों की गलतियों से खुद को तो बचा ही सकते हैं।’’
बिल्ली ने आगे बताया,‘‘हमारे लिए जहरीली दवाईयां और रसायन पानी में भी मिल चुकी हैं। खतरा बढ़ता ही जा रहा है।’’
शेर ने कहा,‘‘अब इंसानों पर तो हमारा वश नहीं है। हम पहले अपना जंगल बचाएं और खुद को भी। हमें गिद्धों को बुलाना होगा। वैसे, हमें मज़ाक में भी किसी का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। हमें अपने गिद्धों की तलाश करनी होगी।’’
लोमड़ी बोली,‘‘तलाश के बाद उन्हें वापिस भी लाना होगा।’’
शेर ने हाँ में सिर हिलाया। फिर कहा,‘‘हमें याद रखना चाहिए कि धरती में हर जीव की खास भूमिका है। हम सब एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। यह सच है कि हम एक-दूसरे का भोजन हैं। लेकिन,हम एक दूसरे के लिए जरूरी भी हैं।’’
तभी एक चींटी उछलते हुए बोली,‘‘अब बारिश आने वाली है।’’ सबने आसमान की ओर देखा। आसमान बादलों से भर गया था।’’ सब खुशी से उछल पड़े। वहीं कई छोटे-बड़े पक्षी गिद्धों को खोजने के लिए आसमान में उड़ चुके थे। ॰॰॰

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