ऐसे मिला सबक


एक दिन की बात है। चूहे की माँ बोली,‘‘हमें अपने दाँतों को पैना रखना पड़ता है। लगातार कुछ न कुछ कुतरना होता है। तुम हो कि आलस करते हो। माना कि भर-पेट खाना ज़रूरी है। लेकिन ठूँसकर खाना ठीक नहीं।’’


चूहा खाने में मस्त था। खाते-खाते बोला,‘‘अभी मेरा पेट भरा नहीं है। मुझे और चाहिए।’’
माँ ने फिर समझाया,‘‘मैंने अपने हिस्से का भी तुम्हें पहले दे दिया। आज से अपने लिए भोजन खुद खोजो। लेकिन एक बात याद रखना। ज़्यादा खाने के चक्कर में मुसीबत में मत पड़ जाना। जाओ।’’


चूहा जाना नहीं चाहता था। लेकिन उसे जाना ही पड़ा। चलते-चलते उसे गेहूँ का एक दाना मिला। वह बहुत खुश हुआ। उसने वह दाना उठा लिया।
बांयी ओर एक खरगोश था। वह हँसने लगा। चूहा बोला,‘‘क्यों हँस रहे हो?’’
खरगोश ने जवाब दिया,‘‘मैं तुम्हारी बेवकूफी पर हँस रहा हूँ। अभी-अभी एक बैलगाड़ी यहाँ से आगे गई है। दौड़ कर जाओ, तुम्हें गेहूँ की बाली मिल जाएगी। एक दाना पाकर खुश हो रहे हो। हद है!’’


चूहे को खरगोश का सुझाव अच्छा लगा। वह गेहूँ का दाना छोड़कर बाली की तलाश में चल पड़ा।


‘‘वाह ! खरगोश ने ठीक कहा था। गेहूँ की पूरी बाली जो मुझे मिल गई है।’’
चूहा खुश हो गया। एक गिलहरी पेड़ पर थी। चूहे से बोली,‘‘एक बाली पर इतरा रहे हो ! थोड़ी और मेहनत करो। आगे बढ़ो। गेहूँ का बालियों से लदा पूरा पौधा भी मिल सकता है।’’


चूहे को गिलहरी का सुझाव अच्छा लगा। वह गेहूँ की बाली छोड़कर पूरा पौधा खोजने चल पड़ा। वह चलता रहा। आगे चलकर उसे बालियों से लदा गेहूँ का पौधा मिल ही गया। वह खुशी से चिल्ला पड़ा,‘‘अहा ! भरपेट भोजन मिल ही गया।’’


तभी कोई ज़ोर से हँसा। चूहा डर गया! काॅपती आवाज़ में बोला,‘‘कौन है वहाँ?’’
वह बंदर था ! उसने चूहे से कहा,‘‘तुम भी यार फिसड्डी निकले। कुछ बड़ा करो। कुछ बड़ा सोचो। ज़रा सोचो। अगर तुम्हें कई दिनों का भोजन एक ही जगह पर मिल जाए तो? कैसा रहेगा?’’


चूहा चैंका। पूछने लगा,‘‘अच्छा रहेगा! लेकिन कहाँ?’’
बंदर ने बताया,‘‘बस कुछ सौ कदम। गेहूँ की फसल का बहुत बड़ा खेत है। जाओ। ऐश करो।’’
चूहे को बंदर का सुझाव अच्छा लगा। वह गेहूँ की बालियों से लदा पौधा छोड़कर आगे बढ़ चुका था।


खेत के पास पहुँचते ही वह चिल्लाया। बोला,‘‘अरे ! मज़ा आ गया! वाकई, कई दिनों का भोजन तो बैठे-बिठाए मिल गया।’’


उसने एक पल की भी देरी नहीं की। एक ऊँची छलाँग लगाकर वह खेत में जा पहुँचा। अभी उसने एक-दो दाने ही कुतरे थे कि फिस्स की आवाज़ आई। सामने देखा तो साँप फन फुलाए मुस्करा रहा था। चूहे ने आँखें बंद कर ली। मौत सामने जो खड़ी थी।


‘‘धमाक ! की आवाज आई। चूहा पेट के बल लेट गया। यह क्या ! आँख खोली तो बाज़ अपने पंजों में साँप को लेकर आसमान में उड़ चला था। चूहा घर की ओर दौड़ पड़ा। हांफते-हांफते बोला,‘‘खजाने की खोज में बटुआ भी खो दिया। चलो कोई बात नहीं। जान तो बची।’’ चूहा घर पहुंचकर थकान मिटाने लगा। ॰॰॰

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