खाना मगर ध्यान से

अभी ठीक से सुबह का उजाला भी नहीं हुआ था। महेश ने जोर से पुकारा,‘‘अरे रीता। सुनो तो।’’

तभी उसे अंदाज़ा हुआ कि अभी तो आस-पास के लोग सो रहे होंगे। महेश ने धीरे से रीता को आवाज लगाई-‘‘अरे! कहां हो? इधर आओ। अखबार में सुहानी की फोटो छपी है। सुहानी टाॅप थ्री की मेरिट में है। जगाओ उसे।’’


सुहानी अधखुली आंखों के साथ सामने आ गई-‘‘पापा। क्लासमेट्स व्हाट्स एप पर कल ही फोटो भेज चुके हैं। मैंने देख लीं। मैं फर्स्ट तो नहीं आई।’’
रीता ने रसोई से ही झांका। कहा-‘‘सुहानी। फस्र्ट आना बड़ी बात है। लेकिन उस पेंटिंग कंपीटिशन में सैकड़ों बच्चों ने हिस्सा लिया था।’’


महेश ने आगे जोड़ा-‘‘और उनके बारे में सोचो, जो शामिल ही नहीं हो सके।’’
रीता ने कहा-‘‘अब ये बताओ कि तुम क्या खाओगी? मैं फटाफट बनाती हूं। हलुवा या खीर?’’


सुहानी ने चहकते हुए कहा-‘‘नहीं ममा। रसीले चमचम!’’


महेश ने लंबी सांस लेते हुए कहा-‘‘इतनी सुबह! ताज़े चमचम तो किसी भी स्वीट्स शाॅप में नहीं मिलेंगे। दोपहर तक इंतजार करना पड़ेगा।’’


रीता तपाक से बोली-‘‘यह कहो न आपको मार्केट नहीं जाना है। अरे ! पैक्ड चमचम ले आना। किसी भी बड़ी दुकान में मिल जाएंगे। आप जाते हो कि मैं किसी को फोन करूं?’’ महेश झट से खड़ा हो गया-‘‘ओह ! मैं तो भूल ही गया। अचार क्या और मिठाई क्या। आजकल तो सब कुछ पैक्ड आता है। खरीदो,खोलो और खा लो। मैं यूं गया और यूं आया।’’ सुहानी जोर से बोली-‘‘पापा। एक दो डिब्बों से काम नहीं चलेगा। मेरे क्लासमेट भी आएंगे। मम्मी की सहेलिया भी।’’


महेश बाहर से ही बोला-‘‘और मेरे दोस्त भी। चिंता मत करों, मैं दस-बारह डिब्बे ले आऊंगा।’’ सुहानी वाॅशरूम में और रीता रसोई से आँगन की ओर चली गई।
रविवार था तो सुहानी को बधाई देने वाले आते ही रहे। सुहानी दिन भर फेसबुक और व्हाट्स ऐप पर स्टेटस पढ़ती रही। दोपहर से पहले उसके कई क्लासमेट घर पर बधाई देने आ चुके थे। महेश कुछ दोस्तों को छोड़ने चला गया था। दोपहर हुई तो रीता ने कहा-‘‘टाइम का पता ही नहीं चला। मैं कुछ बनाती हूं।’’
सुहानी बोली-‘‘ममा। मेरा तो मन नहीं कर रहा है। एक तो चमचम बहुत खा लिए। फिर बया, मिंटू, सफा बर्गर-पिज्जा-स्नेक्स ले आए। पेट में जगह ही कहां है? कुछ हलका-फुल्का ही बनाना।’’ रीता ने नूडल्स बनाए। दोनों ने खाए और टी॰वी॰ देखने लगे।
सोमवार की सुबह अपने नियत समय पर आ गई। सुहानी स्कूल चली गई। स्कूल से लौटी तो महेश और रीता को स्कूल में मिली बधाईयों के बारे में ही बताती रही। महेश ने कहा-‘‘सुहानी। ये तो शुरूआत है। अगर मन से किसी काम को करो तो सफलता जरूर मिलती है। वैसे किसी भी प्रतियोगिता में पीछे रहना बुरा नहीं है। इससे बुरा है आगे रहने के लिए दूसरों के बारे में बुरा सोचना।’’
सुहानी ने कहा-‘‘पापा। मैं समझी नहीं।’’
रीता ने कहा-‘‘सुहानी यही कि किसी भी कंपीटीशन में केवल आगे रहने के लिए हिस्सा नहीं लेना चाहिए। सीखने के लिए भाग लेना चाहिए।’’
सुहानी ने कहा-‘‘ओके। मैं समझ गई।’’
शाम के बाद रात हुई। सबने खाना खाया और सो गए।


सुबह हुई। सुहानी स्कूल चली गई। दोपहर होने से पहले ही सुहानी के स्कूल से फोन आया तो रीता ने महेश को फोन किया-‘‘सुहानी अस्पताल में एडमिट है। जल्दी आओ। मैं वहीं पहुंच रही हूं।’’ स्कूल के निकट गवर्नमेंट अस्पताल में रीता भर्ती थी। रीता और महेश आगे-पीछे ही अस्पताल पहुंचे। डाॅक्टर ने देखते ही कहा-‘‘परेशान होने की बात नहीं है। खुला हुआ खाने से बैक्टीरियां शरीर में पहुंच गए हैं। ट्रीटमेंट चल रहा है। देर शाम के बाद आप सुहानी को घर ले जा सकती हैं। फिलहाल पांच दिन हलका खाना। बाहर का तो बिल्कुल नहीं।’’
रीता बोल पड़ी-‘‘लेकिन डाॅक्टर। हम तो बाहर कभी कुछ खाना खाने जाते नहीं। खुला हुआ तो बिल्कुल भी नहीं खाते।’’
डाॅक्टर ने हंसते हुए कहा-‘‘अच्छी बात है। लेकिन सुहानी ने बताया कि वह पिछले तीन-चार दिनों से पैक्ड भोजन कर रही थी। पिज्जा और बर्गर भी खाया है।’’
महेश चैंका-‘‘डिब्बा बंद ! पैक्ड फूड? लेकिन बाजा़र में तो यह सब खुले आम बिक रहा है।’’ डाॅक्टर ने जवाब दिया-‘‘महेश जी। बाजार में डिब्बा बंद भोजन हो या खुला भोजन। देखिए, तबियत बाजार की नहीं,आपकी बेटी की खराब हुई है। परेशान कौन हुआ? स्कूल स्टाॅफ वक्त पर सुहानी को यहां ले आया। उल्टी और दस्त एक साथ होने से और लगातार होने से जान भी चली जाती है।’’
रीता ने कहा-‘‘पैक्ड भोजन तो सेफ होता है न सर? फिर सुहानी,,,।’’

डाॅक्टर बीच में ही बोल पड़ा-‘‘बैक्टीरिया के पनपने से ही कोई भोजन खराब होता है। डिब्बाबंद भोजन पैक करते समय सुरक्षित होता है। लेकिन खुलने के बाद सूक्ष्म जीवाणु उसमें चले आते हैं। यदि हम उसे दूसरे और तीसरे दिन भी खाते रहें तो वह सुरक्षित कहां रहा? एक बार डिब्बा खुला तो जीवाणुओं को पनपने का मौका मिल जाता है। यह तो सब जानते हैं। जाने-अनजाने में हम कई बार गीले हाथ और गीला चम्मच उपयोग करते हैं।’’


महेश ने कहा-‘‘ओह! ये बात तो सही है।’’ डाॅक्टर बोला-‘‘पैक्ड भोजन की पैकिंग हाई टैंप्रेचर पर सुरक्षित की जाती है। लेकिन कई बार न्यूनतम तापमान या अधिकतम तापमान पर पैकिंग के कारण इनका स्वाद, रंग-रूप और पोषक तत्व ताज़ा व मौसमी भोजन जैसा नहीं रह जाता। बेहतर तो यही है कि हम पका-पकाया और ताज़ा खाना खाएं। और हां, मौसमी चीजें खाएं। यदि पैक्ड भोजन ही करना है तो उसे खोलने के बाद जितना जल्दी हो खा लें। पैकिंग से हटाने के बाद सुबह का दोपहर और दोपहर का शाम के लिए कतई न रखें। फास्ट फूड से बचें। तभी मैंने पहले कहा था बाहर का खाना खाने से बचंे।’’
रीता बोली-‘‘थैंक्यू डाॅक्टर। आप सही कह रहे हैं। हमें जोश के साथ होश भी बनाये रखना चाहिए। खुशी को एकदम शेयर करना अच्छा लगता है। लेकिन सेहत को ताक पर रखकर तो कतई नहीं। मैं तो हलुवा और खीर ही बनाना चाहती थी लेकिन सुहानी ने इच्छा….।’’


तभी सुहानी बीच में बोल पड़ी-‘‘साॅरी मम्मी। मैंने पापा को बिना बताये एक डिब्बा स्कूल बैग में रख लिया था। हम सुबह से शाम तक एक-एक चमचम खाते रहे। हम भूल गए कि यह खतरनाक हो सकता है। डाॅक्टर सर ने मुझे भी और हमारी बड़ी मैम को भी समझाया। हमारी स्कूल कैंटीन में तो फास्ट फूड और चिकनाई से बनी चीज़ें बनती ही नहीं। स्टूडेंटस बैग्स में चोरी-छिपे बाजार से ये सब लाते हैं।’’

डाॅक्टर ने टोकते हुए कहा-‘‘कोई बात नहीं। सुहानी अब ध्यान रखना। कई बार हमारी छोटी-छोटी लापरवाही बुरे हादसों में बदल जाती है। अभी तुम आराम करो। एक दो दिन लीव पर रहो। जिस दिन भी स्कूल ज्वाइन करोगी,क्लासमेटस से भी यह बातें शेयर करना।’’ यह कहकर डाॅक्टर दूसरे मरीजों को देखने चले गए। घर का भोजन सुरक्षित भोजन। रीता और महेश एक दूसरे को देखते हुए शायद यही कह रहे थे। ***

-मनोहर चमोली ‘मनु’

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