बंद हुआ स्कूल



जंगल की रौनक ही अलग थी। भोर होने से देर रात तलक चारों ओर हलचल मची रहती। सूरज की रोशनी में तो कई जानवर और पक्षी इधर-उधर घूमते पाए जाते। लेकिन कई जीव-जन्तु तो रात में ही बाहर निकलते हैं। हँसी-खुशी और धमा-चैकड़ी का माहौल बना ही रहता। उल्लास और आनन्द की गूँज चारों और सुनाई देती।
जंगल की मस्ती और बढ़ने वाली थी। खुशियों का एक स्कूल जो खुल गया था। हर कोई अपने बच्चों को स्कूल भेजने लगा था। स्कूल जाने वालों की आदतों में भी तेजी से बदलाव दिखाई दे रहा था। अचानक ही भालू का मान-सम्मान बढ़ गया था। भालू के इस स्कूल में अब सबसे अधिक चहल-पहल दिखाई देती। वहाँ पढ़ने वालों का तांता लगा रहता।
क्या छोटा और क्या बड़ा! क्या पशु और क्या पक्षी! क्या मांसाहारी और क्या शाकाहारी! मेढ़क, साँप, चूहा, बिल्ली, शेर, बकरी, हाथी, बंदर, तितली, लोमड़ी, सियार, खरगोश, कुत्ता, गिलहरी और हिरन भी एक ही मैदान में सुबह-सवेरे प्रातःकालीन सभा के लिए जुटने लगे थे।
भालू खूब मन लगाकर पढ़ाता। पढ़ने वाले भी मन लगाकर पढ़ाई कर रहे थे। जंगल का कानून भी बदला हुआ दिखाई दे रहा था। स्कूल का घण्टा लगने और छुट्टी का घंटा बजने से पहले स्कूल आने वालों में प्रेम,भाईचारा और एकजुटता देखते ही बनती थी। आस-पास के जंगलों के जीव भी हैरान थे। स्कूल पढ़ने आने वाले एक-दूसरे की मदद करते। समूह में सीखते। अपनी बातें साझा करते। स्कूल की गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते। सुनने की ललक बढ़ने लगी थी। बोलने की क्षमता में लगातार सुधार हो रहा था। सब अपनी क्षमता के अनुसार भांति-भांति की आवाज़ें निकाल रहे थे। सभी के दिन आनंद, मस्ती, उछल-कूद और भाग-दौड़ में गुजर रहे थे।
एक दिन अचानक भालू ने कहा-‘‘साल भर हो गया है। अब तुम्हारी परीक्षा होगी। तैयार रहिए।’’
कक्षा में सन्नाटा छा गया।
‘‘साल! ये कौन था जो भर गया है?’’ चिम्पैजी ने सिर खुजलाया।
‘‘परीक्षा ! ये क्या है?’’ मेढक ने सिर खुजलाते हुए पूछा।
भालू को हँसी आ गई। चेहरे पर घबराहट लाते हुए बोला-‘‘परीक्षा ही तुम्हें पास-फेल करेगी। मतलब ये कि तुमने साल भर क्या सीखा! कितना सीखा!’’
अब खरगोश बोला-‘‘हम तो हर रोज कुछ न कुछ सीखते ही रहते हैं। सीखा हुआ भूला थोड़ न जाता है! पास-फेल भी सीख लेंगे।’’
भालू ने डाँटते हुए कहा-‘‘चुप रहो। मैं पढ़ाता हूं और तुम पढ़ते हो। मैं सीखाता हूं और तुम सीखते हो। अब समय आ गया है कि सब जान लें कि तुम में से अव्वल कौन है? यह भी पता चले कि पिछड़े कौन हैं?’’
‘‘अव्वल ! ये अव्वल कौन है?’’ छिपकली ने पूछा।
भालू ने बताया-‘‘परीक्षा ही तय करेगी कि तुम सभी में कौन सबसे अधिक होशियार है। साल भर स्कूल में पढ़ाया गया है। सिखाया गया है। समझाया गया है। परीक्षा से तय होगा कि तुम कितने बुद्धिमान बन सके हो। अब घर जाओ और परीक्षा की तैयारी करो। कल तुम्हारी परीक्षा होगी।’’
स्कूल से लौटते हुए सब सोच में पड़ गए।
चूहा सोच रहा था,‘‘ऐसा कौन होगा जिसमें बुद्धि न होगी!’’
स्कूल से लौटने वालों के चेहरे चिंता से भर गए। तनाव और भय के कारण वे हँसना-गाना भूल गए। वे एक-दूसरे से बेवजह तुलना करने लगे। निराशा और हताशा से भरा हर कोई एक-दूसरे से दूर-दूर चलने लगा।
आज सुबह तक जो नाचते-कूदते स्कूल जा रहे थे, वे स्कूल से लौटते हुए एक-दूसरे को देखकर घबरा रहे थे। परीक्षा ने जैसे उनकी आजादी छीन ली हो। खुशियों की पाठशाला एक झटके में डर की पाठशाला बन गई। हर कोई रात भर सो नहीं सका।
सुबह हुई। सब बुझे मन से स्कूल पहुँच गए।
भालू ने मुस्कराते हुए कहा-‘‘परीक्षा यहीं मैदान में होगी। सब तैयार रहें।’’
हर कोई सिर झुकाए बैठा हुआ था। भालू ने स्कूल की ऊँची दीवार की ओर देखते हुए कहा-‘‘इस दीवार पर जो चढ़ेगा। वही अव्वल माना जाएगा। सब दीवार की ओर दौड़े। बंदर, गधा और सियार उछलते ही रह गए। छिपकली झट से दीवार पर चढ़ गई।’’
चूहा उदास हो गया। धीरे से बोला-‘‘मेरे जैसे इतनी ऊँची दीवार पर कभी नहीं चढ़ पाएंगे।़’’
भालू ने पीपल के पेड़ की ओर देखते हुए कहा-‘‘इस पेड़ पर चढ़ो।’’ उड़ने वाले पक्षी पलक झपकते ही पेड़ की शाखाओं पर पँख पसारकर बैठ गए। हिरन, मेढक,गाय और बकरी अपना-सा मुंह लेकर खड़े रह गए। वे दूर खड़े पेड़ को देखते ही रह गए।
भालू ने फिर कहा-‘‘मैदान के चार चक्कर लगाओ। मैं सौ तक गिनती बोलूंगा। गिनती पूरी होने से पहले चार चक्कर जो लगाएगा वही अव्वल माना जाएगा। दौड़ो।’’
सब दौड़ने लगे। घोड़ा, खरगोश, कुत्ता सबसे आगे थे। कछुआ,घोंघा सबसे पीछे रह गए।
भालू ने एक नई घोषणा करते हुए कहा-‘‘मैदान के किनारे बड़ा सा पत्थर पड़ा है। उसे हटाना है।’’
सबकी बारी आई। हर किसी ने कोशिश की। पत्थर टस से मस न हुआ। हाथी झूमता हुआ आया। उसने पत्थर को सूण्ड से एक ओर धकेल दिया।
एक के बाद एक नई परीक्षा से सब तंग आ गए। हर परीक्षा में गिने-चुने अव्वल आते और बाकी सब मायूस हो जाते।
मधुमक्खी के सब्र का बांध टूट गया। वह बोली-‘‘मैं इस परीक्षा को नहीं मानती। ऐसी पढ़ाई से तो अच्छा है कि मैं अनपढ़ ही रह जाऊँ। मुझे नहीं चाहिए ऐसी पढ़ाई। न मुझे ऐसा स्कूल और शिक्षक चाहिए जो मेल-जोल की बजाय चिढ़ना,कुढ़ना और पछाड़ना सिखाए। ऐसी शिक्षा से क्या हासिल होगा जो गैर बराबरी की भावना को बढ़ाए।’’
मधुमक्खी की बात सबने सुनी। मैदान में सन्नाटा छा गया।
तितली ने मधुमक्खी की बात को आगे बढ़ाया। वह बोली,‘‘मैं भी इस तरह की परीक्षा नहीं दूँगी।’’
फिर किसी ओर ने भी कहा-‘‘मैं भी।’’
दूर से कोई चिल्लाया-‘‘मैं भी।’’
अब कुछ एक साथ बोले-‘‘हम भी।’’
फिर क्या था। सब एक साथ चिल्लाए-‘‘हम सब भी।’’
सब भालू की ओर दौड़े। भालू घबरा गया। वह भागकर जंगल में जा छिपा। जंगल का स्कूल बंद हो गया। अब सब प्रकृति से सीखने लगे। अपने अनुभवों से सीखने लगे।

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-मनोहर चमोली ‘मनु’

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