कविता एक: स्वाद अनेक


-मनोहर चमोली ‘मनु’
शैक्षिक दख़ल के इस अंक के लिए बाल- साहित्य का चयन चुनौतीपूर्ण रहा। तीव्रता के साथ समाज ऐसा बन रहा है जहाँ शारीरिक श्रम के प्रति संकीर्ण नज़रिया बढ़ रहा है। मेहनत की परिभाषा बदल गई है। घर के काम, खेती-किसानी और हाथ के कौशलों के प्रति सम्मान का नज़रिया खत्म होता जा रहा है। मजदूर, बढ़ई, लुहार, कुम्हार, दर्ज़ी, मोची, स्वच्छक के कामों में जो सौंदर्यबोध कभी दिखाई देता था, वह धीरे-धीरे उपेक्षित होने लगा। उनके लिए और उनके कामों के प्रति गहरी संवेदनाएं मरती जा रही हैं।


शिक्षा के दस्तावेज श्रम को पाठ्यचर्या का हिस्सा बनाने की बात कहते हैं। लेकिन दुःख इस बात का है कि आज भी श्रम को जाति या लिंग के आधार पर बाँटने वाली सोच बरकरार है। बालमन की समझ रखने वाले जानते हैं कि दो साल के बच्चे भी श्रम की अवधारणा को समझने लगते हैं। घर में वे बड़ों का अनुकरण भी करने लगते हैं। श्रम हमें अर्थवान बनाता है। स्वाभिमानी बनाता है। बावजूद इसके अभी भी हम श्रम को उपयुक्त मान-सम्मान नहीं देते। कारीगरी का कौशल चाहने वाले श्रम को भी हम उतनी अहमियत नहीं देते। जबकि हम सभी जानते हैं कि ऐसे काम हमें आत्मानुशासित करते हैं।


पूरी दुनिया के वह काम जो समाज या किसी समूह-समुदाय के अन्य लोगों के प्रति ज़िम्मेदारी का निर्वाह करते हैं, श्रम है। हम सब अपने लिए और अपनी पूरी ताकत का योगदान दूसरों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए लगाते हैं। यही श्रम है। फिर हम क्यों दूसरों के काम को मेहनत से भरा नहीं मानते? यह भी कि दूसरों की मेहनत में हमें कोई श्रम नहीं दिखाई देता?

प्रस्तुत कविताओं का चयन करते समय ‘माँ ने की हड़ताल’ कविता याद आती है। वह कुछ इस तरह से है-

माँ ने की हड़ताल /घर में आया एक भूचाल /न ढंग का नहाना-धोना /न ढंग का खाना-पीना /अँगीठी जली नहीं/ दाल गली नहीं / रोटी पकी नहीं / पापा करते बड़बड़ / मुन्ने ने की गड़बड़ /स्कूल दफ्तर को हुई देरी /हर कोई कहे /‘आई आफत मेरी’/आकर माँ को खूब मनाया /तब कहीं जाकर चैन आया।

सरसरी तौर पर ऐसा लगता है कि यह तो माँ पर केन्द्रित है। हड़ताल पर है। लेकिन,समझकर पढ़ने से यह कविता घर के कामों में खटती एक माँ के श्रम को महसूसने वाली कविता भी है।
ऐसी ही एक कविता है किसी राजा की। जो दही-बड़े खाने की इच्छा व्यक्त करता है। ‘टेसू राजा अड़े खड़े, माँग रहे हैं दही बड़े।’ कवि निरंकारदेव सेवक ने दही बड़े बनने तलक की पूरी यात्रा पाठकों के समक्ष रख दी। अब पाठक पर निर्भर है कि वह खेत के खोदने,जोते जाने,उड़द की दाल बोने,फसल पकने,काटने,छान-पटक कर दाल की पिसाई,टिकिया,बेलन,चूल्हा फूँक,तलना, उबालना, फुलाना,मिर्च,नमक छिड़कना और परोसना तक में लगी मेहनत का अहसास करें न करें।

इस अंक में शारीरिक श्रम और उसके प्रति सम्मान और गरिमा का भाव जगाती रचनाओं का चयन किया जाना था। बाल-साहित्य की पड़ताल की तो हैरानी हुई। लाॅकडाउन की अवधि में लगभग एक हजार सात सौ कविताओं को पढ़ने के लिए लगभग दो हजार पन्ने उलटे गए। मात्र बत्तीस कविताएँ ही मुझे ऐसी लगीं जो श्रम की महत्ता को किसी तरह से व्यक्त कर रही हों। जो कहीं न कहीं मेहनत और मेहनत करने वालों को रेखांकित करती हैं। यह कविताएँ सन् 1901 से लेकर 2019 की प्रतिनिधि कविताओं से चयनित की गई हैं। बाल-साहित्य के सैकड़ों प्रतिनिधि कवियों ने बादल, परी, स्कूल, बचपन, सूरज, चाँद, तारे, पँख, पषु-पक्षियों, खेल, मस्ती, पढ़ाई आदि पर कलम चलाई है। लेकिन, ऐसी कविताओं तक पहुँचना मुश्किल भरा काम रहा, जो शारीरिक श्रम के प्रति गरिमा का बोध कराती हों। ऐसी कविताएं, जो श्रम के प्रति सम्मान करना जगाती हो।


संभव है कि चयन और संकलन की सीमा के चलते उत्कृष्ट और संबंधित कविताओं तक पहुँचा ही न गया हो। वैसे, कवि जब रचनाकर्म करता है तो यह सोचकर कहाँ लिखता होगा कि आज मैं शारीरिक श्रम के प्रति सम्मान जगाने वाली कविता लिखूंगा?

क्या मुंशी प्रेमचन्द ने ‘ईदगाह‘ इसलिए लिखी होगी कि वह पाठ्य पुस्तकों में शामिल हो जाए? इन कविताओं के साथ भी ऐसा है। यह प्रत्यक्ष तौर पर बच्चों में श्रम के प्रति सम्मान करने की सीख नहीं देती। पढ़ते समय न ही शारीरिक श्रम के प्रति गरिमा का भाव जगाने का केन्द्रिय भाव दिखाती है। संभवतः ऐसा ज़रूरी है भी नहीं। शायद,कोई भी कविता एक अर्थ और एक भाव दे ही नहीं सकती। यह तो पाठक का अधिकार है कि वह कविता पढ़कर क्या और कैसा महसूस करे। किसी कविता को पढ़ते समय पाठकों को एक समान अनुभूति हो भी कैसे सकती है? किसी भी कविता का एक भावार्थ और अर्थ ग्रहण संभव है? th ughaA कविता किसी कारखाना में तैयार बिस्किट का पैकेट कैसे हो सकता है? जिसका हर बिस्किट मात्रा,भार, रूप,रंग,आकार में एक समान हो!

इस अंक में बाल-साहित्य अप्रत्यक्ष तौर पर हाथ के कामों, मेहनतकशो की आवाज़ें हैं। बच्चे इन कामगारों को और इनके कामों को कैसे देखते हैं? यह खुशबूएँ कविताओं में हैं। चयनित कविताओं में कुछ कविताएँ यहाँ दी जा रही हैं-

टेसू राजा
टेसू राजा अड़े खड़े,
माँग रहे हैं दही-बड़े !
बड़े कहाँ से लाऊँ मैं,
पहले खेत खुदाऊँ मैं,
उसमें उर्द उगाऊँ मैं,
फसल काट घर लाऊँ मैं।
छान-फटक रखवाऊँ मैं,
फिर पिट्ठी पिसवाऊँ मैं,
टिकियाँ गोल बनाऊँ मैं,
बेलन से बिलवाऊँ मैं।
चूल्हा फूँक जलाऊँ मैं,
तलवाकर सिंकवाऊँ मैं,
फिर पानी में डाल उन्हें,
मैं लूँ खूब उबाल उन्हें।
फूल जाएँ वे सबके सब,
उन्हें दही में डालूँ तब,
मिर्च नमक छिड़काऊँ मैं,
तब वह उन्हें खिलाऊँ मैं,
चम्मच एक मँगाऊँ मैं,
तब वह उन्हें खिलाऊँ मैं,
टेसू राजा अड़े खड़े,
माँग रहे हैं दही बड़े !
निरकांरदेव सेवक


मछुआरा
बड़े सवेरे उठ मछुआरा
सागर तीरे आता है,
जाल डाल कर गहरे पानी
मछली रोज फँसाता है।
धरे टोकरी सिर के ऊपर
साथ मछेरिन आती है,
सोने-चाँदी की मछली रख
उसमें घर ले जाती है।
-हरिवंशराय बच्चन

बढ़ई
बढ़ई हमारे यह कहलाते,
जंगल से लकड़ी मँगवाते !
फिर उस पर हथियार चलाते,
चतुराई अपनी दिखलाते !
लकड़ी आरे से चिरवाते,
रंदा रगड़-रगड़ चिकनाते !
कुर्सी-टेबिल यही बनाते,
बाबू जिनसे काम चलाते !
खाट, पलँग यह हमको देते,
बदले में कुछ पैसे लेते !
-जहूर बख़्श


मदारी
जल्दी चलो, मदारी आया,
संग बहुत सी चीज़ें लाया।
डमरू अब है लगा बजाने,
भीड़ जोड़कर खेल जमाने।
देखो साँप नेवला कैसे
लड़ते, बड़े मल्ल हों जैसे।
बिच्छू जैसे काले काले,
लिए हाथ में डंकों वाले।
देखो, रुपए लगा बनाने,
जादू अपना अजब दिखाने।
देखो, उड़ा रहा है अंडा,
लिए हाथ में केवल डंडा।
बड़े-बड़े लोहे के गोले,
जो हैं नहीं जरा भी पोले।
उसने मुँह से अभी निकाले,
काँटों के संग काले-काले।
खेल किए हैं उसने जैसे,
पैसे भी पाए हैं वैसे।
उसका काम हमें बतलाता,
पापी पेट न क्या करवाता?
-बाबूलाल भार्गव ‘कीर्ति’


हुआ सवेरा
बीती रात, प्रात मुसकाया
बोलीं चिड़ियाँ-चूँ-चूँ !
प्यारा कुत्ता करता फिरता
पूँछ हिलाकर-कूँ-कूँ !
देने लगीं सुनाई, सड़कों पर
मोटर की पों-पों !
जोर-जोर से लगे बोलने
कुत्तों के दल-भों-भों !
द्वार-द्वार दे रहे दिखाई
दूध बाँटते ग्वाले !
खन खन खन खन लगे बोलने
गरम चाय के प्याले !
सूरज की किरणों की छिटकी
सभी ओर है लाली !
फुलवारी में फूल बीनने
पहुँच गए हैं माली !
-भीष्मसिंह चैहान


रसोई
माँ गुस्सा थीं सारे घर से
पागल हुई रसोई।
पापा ने जब गैस जलाई,
खुद ही पानी डाल बुझाई।
डिब्बा-डिब्बा ढूँढ़ थके हम
चीज मिली न कोई !
सब कुछ उलट-पुलट कर डाला
गिरा दूध में गरम मसाला
मुन्नी ने जो घूँट भरा तो
चीख-चीखकर रोई !
मैंने गरम तवा खिसकाया,
पापा ने भी हाथ जलाया।
चीख-पुकार मची थी घर में
काम हुआ न कोई !
मम्मी जी फिर उठकर आई,
हम बाहर को भागे भाई।
पापा मम्मी से कुछ बोले,
हँसने लगी रसोई !
-देवेंद्र कुमार


छुट्टी
सूरज जी, तुम इतनी
जल्दी क्यों आ जाते हो !
लगता तुमको नींद न आती
और न कोई काम तुम्हें,
ज़रा नहीं भाता क्या मेरा
बिस्तर पर आराम तुम्हें।
खुद तो जल्दी उठते ही हो,
मुझे उठाते हो !
कब सोते हो,
कब उठते हो
कहाँ नहाते-धोते हो,
तुम तैयार बताओ हमको
कैसे झटपट होते हो।
लाते नहीं टिफिन,
क्या खाना खाकर आते हो?
रविवार आफिस बंद रहता
मंगल को बाज़ार भी,
कभी-कभी छुट्टी कर लेता
पापा का अख़बार भी!
ये क्या बात,तुम्ही
बस छुट्टी नहीं मनाते हो !
-कृष्ण शलभ


चक्की चले
चक-चक,चकर चकर चक्की चले !
हो रामा! हो रामा ! हो रामा!
भोर से उठ माँ राम धुन गाए,
इस हाथ, उस हाथ पाट घुमाए।
पाट जो घूमें तो, धरती ‘हले’
हो रामा! हो रामा ! हो रामा!
चक चक,चकर-चकर चक्की चले !
पंछी को दाना, ढोरों को सानी,
चिंता जगत की माँ समानी ।
माँ तेरे बल से ‘गिरस्थी’ चले
हो रामा! हो रामा ! हो रामा!
चक चक,चकर-चकर चक्की चले !
-रमेश तैलंग


गुलमोहर का पेड़
गुलमोहर का पेड़ लगाया
है मैंने जो आँगन में !
नन्हा-सा लाए थे पापा
इसको मेरे जन्म-दिवस पर,
पाला-पोसा मैंने इसको
पानी-खाद दिया था जमकर।
अब मुझसे भी बड़ा हो गया
देखो यह आनन-फानन में!
बड़े मजे से अब मैं इसकी
शाखाओं पर चढ़ सकता हूँ,
घंटों-घंटों इसकी शीतल
छाया में मैं पढ़ सकता हूँ।
चाहूँ तो बाँहों में इसकी
झूला झूलूँ मैं सावन में !
-सुरेश विमल


पंचों की सलाह
पंचों में यह हुई सलाह,
गाँव सुधारें इस सप्ताह।
सोमवार को ले गोबर,
लीपे सबने अपने घर।
खेत निराए मंगलवार,
कुआँ साफ किया बुधवार।
सब जुट पड़े बृहस्पतिवार,
पक्की सड़क हुई तैयार।
शुक्रवार को हिल-मिलकर,
साफ़ किया पंचायतघर।
टूटा पुल जोड़ा शनिवार,
जिससे सब हो जाएँ पार।
पंचायत बैठी रविवार,
सबको भाया गाँव-सुधार।
-भारतभूषण अग्रवाल
याद
नाना खेतों में देते थे,
कितना पानी कितना खाद।
अम्मा को अब भी है याद।
उन्हें याद है बूढ़ी काकी,
सिर पर तेल रखे आती थीं।
दीवाली पर दीये कुम्हारिन,
चाची घर पर रख जाती थीं।
मालिन काकी लिये फुलहरा,
तीजा पर करती संवाद।
अम्मा को अब भी है याद।
चना-चबेना नानी कैसे,
खेतों पर उनसे भिजवातीं
उछल-कूद करते-करते वे,
रस्ते में मस्ताती जातीं।

खुशी-खुशी देकर कुछ पैसे,
नानाजी देते थे दाद।
अम्मा को अब भी है याद।
खलिहानों में कभी बरोनी,
मौसी भुने सिंगाड़े लातीं।
उसी तौल के गेहूँ लेकर,
भरी टोकरी घर ले जातीं।
वहीं सिंगाड़े घर ले जाने,
अम्मा सिर पर लेतीं लाद।
अम्मा को अब भी है याद।
छिवा छिवौअल गोली कंचे,
अम्मा ने बचपन में खेले,
नाना के संग चाट पकौड़ी,
खाने वे जाती थीं ठेले।
छोटे मामा से होता था,
अक्सर उनका वाद-विवाद।
-प्रभुदयाल श्रीवास्तव


बाल-वर्ष
बाल-वर्ष में बिट्टू-बिटिया
बोले-हम हैं राजा-रानी।
पापा-मम्मी , नाना-नानी
तुमसे सुननी नहीं कहानी।
क्या तुमने गबरू को देखा
पाॅलिश करते फुटपाथों पर?
छोटू जूठन धोला देखा
क्या तुमने होटल-ढाबों पर?
सात साल की भोली सरला
लगा रही झाड़ू घर-घर में,
कितने ही पप्पू और डब्बू
बिना दूध सोते छप्पर में।
खड़ी चढ़ाई पार कर रहा
चार साल का चरवाहा है,
दस बरसों में बूढ़ा लगता
वह गंगू नौकर आया है
जब तक भीख माँगता बच्चा
कैसे बाल-वर्ष तब अच्छा
पापा-मम्मी ,नाना-नानी
इन बच्चों की यही कहानी।
-श्यामसिंह शशि


छोटू
मैं ढाबे का छोटू हूँ।
मैं ढाबे का छोटू हूँ।
रोज सुबह उठ जाता हूँ।
ड्यूटी पर लग जाता हूँ।
सबका हुकम बजाता हूँ।
मैं ढाबे का छोटू हूँ।
दिनभर खटकर मरता हूँ।
मेहनत पूरी करता हूँ।
पर मालिक से डरता हूँ।
मैं ढाबे का छोटू हूँ।
देर रात में सोता हूँ।
कप और प्याली धोता हूँ।
रोते-रोते हँसता हूँ।
हँसते -हँसते रोता हूँ।
मैं ढाबे का छोटू हूँ।
-रमेश तैलंग


मेरी अम्मा
मेरी अम्मा सबसे अच्छी,
हम सबको वह करती प्यार।
डूबी रहती सदा काम में।
खुश रखती सारा परिवार।
बड़े-सवेरे उठ जाती है,
निपटाती सब घर के काम।
कपड़े-लत्ते झाड़ू पोंछा,
लेती कब थकने का नाम।
पूजा करके हमें जगाती,
सो जाते हम बारंबार।
हम सब हँसते कैसी अम्मा,
याद न रहता क्यों इतवार।
माँ क्या जाने छुट्टी होती,
क्यों भाता हमको इतवार।
सूरज जैसी मेरी अम्मा,
काम करे वह सातों वार।
झोली भर-भर प्यार बाँटती,
जी भर करती लाड-दुलार।
नन्हें मन को खूब समझती,
माँ प्रभु का सुंदर उपहार।
-शकुंतला कालरा


बापू
रोज सुबह उठकर खेतों में
हल बैलों के संग जाते हो।
दिन भर कठिन परिश्रम करके
साँझ ढले घर में आते हो।
नहीं डाँटते कभी हमें तुम
ईश्वर से सच्चे हो बापू।
मुझसे कहते खूब पढ़ो तुम,

लेकिन खेलो भी मन भरके।
खुले नयन में स्वप्न सँजोकर,
पूरा करना तुम प्रण करके।
खेला करते संग हमारे,
सच,बिल्कुल बच्चे हो बापू।
तुम कितने अच्छे हो बापू।
जब भी नई फसल आती तब,
तुम मेरे कपड़े सिलवाते।
साल,महीने मगर तुम्हारे,
धोती,कुर्ते में कट जाते।
ठान लिया जो, करना है वो,

निश्चय के पक्के हो बापू।
तुम कितने अच्छे हो बापू।
-देशबंधु शाहजहाँपुरी


रिक्शा वाले
रिक्शा वाले,रिक्षा वाले
कहाँ-कहाँ तुम जाते हो
पापा को दफ्तर पहुँचाते
मम्मी को घर लाते हो।
सर्दी,गर्मी या बरसात
सुबह,दोपहर या हो रात
हरदम दौड़ लगाते हो
चक्का खूब घुमाते हो।
दुबले-पतले,नाटे,छोटे
भारी-भरकम,मोटे-मोटे
सबका भार उठाते हो
रिक्शा तेज चलाते हो।
कोई प्रेम से बतियाता है
पर कोई गुस्साता है
सुन लेते हो सबकी बातें
आगे बढ़ते जाते हो।
-संजीव ठाकुर


मम्मी
मम्मी मुझको काम सिखा दो
अपने सा तुम मुझे बना दो
मदद तुम्हारी खूब करूँगा
करते-करते नहीं थकूँगा
तुम माँजोगी, मैं धोऊँगा
झाड़ू तुम दो मैं पोंछगा
कपड़े धो कर तुम्हीं सुखा दो
मम्मी मुझको काम सिखा दो
लाओ,मैं सब्जी को काटूँ
लाओ, तेरा हाथ बँटा दूँ
सेवा की मुझे राह दिखा दो
-उर्मिल सत्यभूषण


आँगन और माँ
आँगन में बैठी माँ
घर डाल रही है!
धूप नर्म गिलहरी-सी
उसके साथ-साथ
आगे-पीछे फुदकती है
माँ घर बुन रही हैं . . .
साथ-साथ हवाएँ भी
घोंसला बनाएँगी,यहीं
यहीं चहचहाएँगी ऋतुएँ !
माँ घर बुन रही हैं
आकार ले रहा है घर
यह एक दो तरफा स्वेटर है
एक तरफ माँ,
एक तरफ घर!
घर माँ में समा गया है,
माँ घर में . . .।
माँ ने जीवन पूँजी देकर
बुना है ये घर !
जीवन भर घर की गर्माहट
वैसी ही रही, वैसी ही रही!
-विकि आर्य


सफाई वाला
दादाजी ! वह सफाई वाला !
है वह कितना भोला-भाला!
सुबह-सुबह वह मुँह अँधेरे,
गली का कचरा कितना बुहारे।
दादाजी, कभी उसे बुलाओ,
पास बैठा के कुछ बतलाओ,
चाय उसे क्या पिला न सकते?
धन्यवाद क्या दे नहीं सकते,
कितना अच्छा काम वह करता,
स्वच्छ गली को सदा है रखता।
दादीजी! वह सफाई वाला !
है वह कितना मस्त-निराला!
क्यों तुम उससे आँख चुराते?
दादाजी ! वह सफाई वाला !
हमारा अंकल है मतवाला!
-शैलेंद्र सरस्वती


एक शहर
एक शहर मैंने देखा है
रहता है जो जगरमगर
कभी नहीं बिजली जाती है
ऐसा है वह बना शहर
ऐसे लोग वहाँ रहते हैं
लड़ना आता नहीं जिन्हें
लड़ना-भिड़ना ठीक नहीं है
यह सब भाता नहीं जिन्हें
पुलिस नहीं है,नहीं मुकदमे
न्यायालय का नाम नहीं
दिनभर सब मेहनत करते हैं
पलभर भी आराम नहीं
खेती करते हैं किसान सब
लड़के सारे पढ़ते हैं
अफसर,नेता या व्यापारी
मेहनत करके बढ़ते हैं
दिन में काम,रात में मिलकर
गाते और बजाते हैं
नाटक करते,किस्से कहते
ऐसे मन बहलाते हैं
इसी शहर में चलो चलें हम
खुशियाँ हैं दिन-रात यहाँ
मन को बुरी लगे, ऐसी है
नहीं एक भी बात जहाँ।
-श्रीप्रसाद


गाँव की हाट
देखो लगी गाँव की हाट,
बड़े अनोखे इसके ठाट !
लड्डू, सेब, जलेबी, चक्की
सज धज कर बैठे थालों में
लाल गुलाबी पान बोलते-
हमको भी रख लो गालों में,
मूँछ मरोड़े घूमें जाट !
फरर फरर फर थान फट रहे
नमक मिर्च के ढेर घट रहे,
कच्च-कच्च तरबूज कट रहे,
दुकानों पर लोग डट रहे
बड़े मज़े से खाते चाट !
गब्बा,सब्बा, रिद्दू, सिद्दू
पहली बार हाट में आए
लाए तेल चमेली का फिर-
हलवाई को वचन सुनाए,
चार किलो दो बरफी काट !
खरर खरर सिल रहे घाघरे,
चटपट चढ़ती जाए चूढ़ी,
शाम हो गई,गाड़ी जोतो
रख दो अब बैलों पर जूड़ी,
पानी पीना गंगा घाट !
देखो बढ़ी गाँव की हाट !
-अब्दुल मलिक खान


मुनिया
सबकी छुट्टी हुई,
नहीं पर छुट्टी मुनिया की।
खेल रहा है कोई लोडू
कोई कैरम संग,
पिक्चर-टीवी,सैर-सपाटा
तरह-तरह के रंग
जीवन-भर की लेकिन,
इनसे कुट्टी मुनिया की।
है गरीब वह पिता नहीं हैं
घर-घर करती काम,
दिन-भर ही तो खटती रहती
नहीं तनिक आराम।
नहीं देखता कोई,
घुटती साँसे मुनिया की।
कई रोज़ से माँ लेटी है
हुई बहुत बीमार,
नहीं खा कुछ खाने को ना
कैसा यह संसार!
सुनता कोई नहीं,
सिसकियाँ नन्हीं मुनिया की।
उम्र यही पढ़ सकती लेकिन
उसे पढ़ाए कौन?
आस-पास जो हम हैं,तुम हो
हुए सभी चुप मौन!
रह-रहकर भर आती,
अक्सर आँखें मुनिया की।
-रमेश चंद पन्त

July 2020

शैक्षिक दख़ल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!